बिहार के इस मंदिर में बकरे की बलि देने पर नहीं होती बकरे की मौत, वजह जान दंग रह जाएंगे

लाइव सिटीज डेस्क : मान्यताओं और परम्पराओं के देश, भारत में बलि देने की भी एक परम्परा है. यहां कई सारे मंदिरों और देवस्थल पर लोग भगवान को प्रसन्न करने के लिए बलि देते हैं. वैसे अक्सर मंदिरों में बलि देने के नाम पर जीव-जंतु की हत्या के सवाल उठते रहते हैं, लेकिन आज हम जिस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं वहां बलि तो दी जाती है पर उस बलि में किसी जी की मौत नही होती है. जी हां, बिहार के कैमूर जिले में स्थित इस मंदिर का नाम मुंडेश्वरी माता मंदिर है, जहां माता को प्रसन्न करने के लिए बकरे की बलि तो दी जाती हैं, लेकिन बकरे की मौत नहीं होती वो उसके बाद भी जिन्दा ही रहता है. चलिए जानते हैं कि आखिर कैसे बलि देने के बावजूद ये बकरे जिंदा रहते हैं..

आपको बता दें कि माता मुंडेश्वरी का मंदिर बिहार के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. ये मंदिर बिहार के कैमूर ज़िले में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. वैसे इस मंदिर को कब, किसने बनाया, ये कहना मुश्किल है, लेकिन यहां से प्राप्त शिलालेख के आधार पर पुरातत्व विभाग ने ये अनुमान लगाया है कि इसका निर्माण उदय सेन नामक क्षत्रप के शासन काल में हुआ. साथ ही मुंडेश्वरी माता के इस मंदिर की प्राचीनता का महत्व इस दृष्टि से भी है कि यहां पर पूजा की परंपरा पिछले 1900 सालों से चली आ रही है और आज भी बड़ी संख्या में भक्त यहाँ अपनी प्रार्थना लेकर आते हैं. मान्यता है कि माता के इस मंदिर में बलि देने से सभी मनोकामना पूरी हो जाती है.

दरअसल इस मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता ये है कि चंड-मुंड के नाश के लिए जब देवी जागृत हुई थीं, तब युद्ध में उनके हाथों चंड का वध होने के बाद मुंड इसी पहाड़ी में आकर छिप गया था और फिर माता ने मुंड का इसी पहाड़ी पर वध किया था. ऐसे में ये मंदिर मुंडेश्वरी माता के नाम से स्थानीय लोगों में जानी जाती हैं. वैसे मुंडेश्वरी माता के मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि यहां पशु बलि की सात्विक परंपरा है.

असल मे यहां माता को प्रसन्न करने के लिए बलि में बकरा तो चढ़ाया जाता है, पर उसका जीवन नहीं लिया जाता. मान्यता है कि माता रक्त की बलि नहीं लेतीं, बल्कि बलि के समय माता का चमत्कार देखने को मिलता. लोग बताते हैं कि जब बकरे को बलि के लिए माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तो पुजारी ‘अक्षत’ यानी पूजा के चावल को मां की मूर्ति को स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं और बकरा उसी क्षण अचेत, मृतप्राय सा हो जाता है. ये अक्षत फेंकने की प्रक्रिया दुबारा होती है तो बकरा उठ खड़ा होता है और उसे मुक्त कर दिया जाता है. इस तरह बकरे के बेहोश होने को ही उसकी बलि मान लिया जाता है.

माता के चमत्कार और जागृत शक्ति का ही परिणाम है यहां हर रोज भक्तों का तांता लगा रहता है, विशेषकर शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यहां एकत्र होती है.

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