नवादा: नर्सिंग होम की आड़ में चल रहा था खून की खरीद-बिक्री का खेल, पुलिस ने 7 लोगों को किया गिरफ्तार

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क: जेल रोड स्थित अपोलो सर्जिकल एवं यूरोलॉजी सेंटर में अधिकारियों ने छापेमारी कर खून की खरीद-बिक्री का भंडाफोड़ किया है, इस मामले में पुलिस ने सात लोगों को हिरासत में ले लिया है. फिलहाल पुलिस इन लोगों से पूछताछ कर रही है.

हिरासत में लिए गए लोगों में यूपी के कानपुर का दिनेश सिंह, मुंगेर का धीरज कुमार, नवादा के नारदीगंज थाना क्षेत्र के ननौरा गांव का जितेंद्र कुमार, पार नवादा का ललन कुमार, प्रसाद बिगहा का भोला साव, कमालपुर का मो. शाहिद और पकरीबरावां थाना क्षेत्र के धेवधा का संजय सिंह शामिल है.



बताया जाता है कि प्रशासन को सूचना मिली थी कि निजी क्लीनिक में खून की खरीद-बिक्री का गोरखधंधा चल रहा है. जिसके बाद डीडीसी वैभव चौधरी के निर्देश पर टीम गठित कर छापेमारी की गई. इस दौरान क्लीनिक में रहे सात लोगों को हिरासत में लिया गया. उन लोगों के बांह में सूई लगाए जाने के कई निशान भी मिले हैं. क्लीनिक के चौथी मंजिल पर खून के ग्रुप को जांच करने में इस्तेमाल होने वाली दवा के तीन बोतल, ताकत की दवा को भी जब्त किया गया है. क्लीनिक में छापेमारी के दौरान चौथी मंजिल पर सातों लोग एक कमरे के अंदर से बंद थे. बाहर से भी ताला लगा हुआ था. ताकि किसी को यह भनक नहीं लग सके कि अंदर क्या खेल चल रहा है.

सदर एसडीएम ने क्लीनिक वाले से चाबी मांगी तो सिकंदर नामक शख्स के पास चाबी होने की बात कही गई और कहा कि वह रजौली में है. लेकिन कुछ मिनटों के बाद कमरे के अंदर से आवाज आने लगी. जब एसडीएम ने वहां पर रह रहे लोगों को हड़काया तो कमरे को खोला गया. जिसके बाद अंदर रह रहे सातों लोगों को मुक्त कराया गया.

हिरासत में लिए गए युवकों ने बताया कि उन्हें खून बेचने के एवज में 700 से 1000 रुपये मिलते हैं, कानपुर के दिनेश ने बताया कि वह 11 बार खून दे चुका है और इसके एवज में सात सौ रुपये मिलते थे, मुंगेर के 17 साल धीरज कुमार ने बताया कि काम दिलाने के नाम पर नवादा बुलाया गया था. प्रसाद बिगहा के भोला साव ने बताया कि वह खून बेचकर अपने परिवार का परवरिश किया करते थे. वे रिक्शा चलाने और मजदूरी का काम किया करते हैं. फिलहाल अब खून देना बंद कर दिया है. लेकिन अगर कभी जरुरत पड़ती है तो किसी अन्य से संपर्क कर खून दिलवा देते हैं. पहले खून देने पर पांच सौ रुपये मिलते थे, छापेमारी के बाद ड्रग इंस्पेक्टर की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं.