बिहार में घूस कलेक्‍शन के लिए दुकानें सबसे पहले जगन्‍नाथ मिश्र ने ही खोली थी

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– निहारिका सिंह –

लाइव सिटीज, पटना : चारा घोटाले में लालू प्रसाद 23 दिसंबर से जेल में हैं. डा. जगन्‍नाथ मिश्र बरी हो गए. विवाद पैदा हुआ तो डा. मिश्र के इंटरव्‍यू न्‍यूज चैनलों पर चलने लगे. इतना फुटेज डा. मिश्र को लंबे अर्से के बाद मीडिया में मिल रहा था. बहरहाल, आज मैं इतिहास के पन्‍नों को पलटकर जगन्‍नाथ मिश्र के मुख्‍य मंत्री काल के दिनों की चर्चा करती हूं. 1990 के पहले डा. मिश्र बिहार में कांग्रेस सरकार के मुख्‍य मंत्री हुआ करते थे.



बिहार पर आधारित देश के बड़े पत्रकार संकर्षण ठाकुर की प्रकाशित पुस्‍तक ‘बंधु बिहारी’ के पेज 75 से 77 में डा. जगन्‍नाथ मिश्र के दिनों की कहानी लिखी हुई है. आपको तब का हाल सुनने को ट्रेवर फिशलॉक को जान लेना चाहिए. ट्रेवर फिशलॉक ‘टाइम्‍स आफ इंडिया’ के नेशनल रिपोर्टर थे. वे बिहार आए थे. मुख्‍य मंत्री जगन्‍नाथ मिश्र ही थे. लौटकर लिखा – ‘बिहार भारत का सीवर है.’ पटना में वे तब के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन नेशन’ के फ्रेजर रोड स्थित कार्यालय में गए थे. स्‍थानीय संपादक ने फिशलॉक का अभिवादन इन शब्‍दों में किया – ‘नरक में आपका स्‍वागत है.’

भ्रष्‍टाचार को संस्‍थागत किया जगन्‍नाथ मिश्र ने

अभी सबसे अधिक शोर तो लालू प्रसाद का ही है, लेकिन संकर्षण ठाकुर किताब ‘बंधु बिहारी’ में जगन्‍नाथ मिश्रा के राजपाट की चर्चा करते हुए यह बताते हैं कि भ्रष्‍टाचार को संस्‍थागत कर दिया गया था. तय कीमत के बदले सब कुछ हासिल किया जा सकता था.

जगन्‍नाथ मिश्रा के कार्यकाल के दिनों में सरकारी नौकरियों में तबादलों की कीमत 20 हजार रूपये थी. नियुक्तियों के 25 हजार रुपये लगते थे. प्रोमोशन में 50 हजार रुपये का रेट था. हर ठेके का एक हिस्‍सा होता था. हर छोटे-बड़े काम की, जिसे करना आवश्‍यक होता था, एक कीमत होती थी.इस बात की पुष्टि कि जगन्‍नाथ मिश्र के शासन में भ्रष्‍टाचार ने एक लंबी छलांग लगाई थी.

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कांग्रेस के समय भी बिहार में ‘जंगल राज’ ही था

संकर्षण ठाकुर लिखते हैं – जगन्‍नाथ मिश्र या कांग्रेस का समय भी बिहार में ‘जंगल राज’ से कुछ कम नहीं था. हां, तब के जंगल में शक्ति ऊंची जाति के लोग ब्राहम्ण, भूमिहार, राजपूत के पास थी. बिहार देश का एकमात्र ऐसा राज्‍य था, जहां सिर्फ जमींदार नहीं, बल्कि पानीदार भी थे. ये पानीदार भी ऊंची जाति के परिवार वाले थे, जो नदियों के वर्गों पर क्षेत्रीय विशेषाधिकार का आनंद उठाते थे.

अपराध अनियंत्रित था. जगन्‍नाथ मिश्रा के शासन के पहले वर्ष में 2100 हत्‍याएं हुईं थीं. मतलब प्रत्‍येक तीन घंटे में कोई मारा जाता था. राज्‍य के प्रत्‍येक बारहवें व्‍यक्ति के पास बिना लाइसेंस की बंदूक थी.

जगन्‍नाथ मिश्र की पीएचडी थीसिस किसने लिखी थी?

जब मैं जगन्‍नाथ मिश्र के राजपाट को समझने का प्रयास कर रही हूं, तब मुझे इंडिया टुडे के 15 सितंबर 1982 के अंक में सीनियर जर्नलिस्‍ट सुनील शेट्टी की आर्टिकल ‘Jagannath Mishra always had the mentality of a feudal overload ‘ भी पढ़ने को मिलती है. इसे तब शेट्टी ने पटना में इंडिया टुडे के पत्रकार फरजंद अहमद के साथ मिलकर लिखा था.

इस आर्टिकल में जगन्‍नाथ मिश्र के पीएचडी की थीसिस पर भी सवाल है. बताया गया है कि इसे जगन्‍नाथ मिश्र ने खुद नहीं किसी डा. हरगोविंद सिंह ने लिखा था. हरगोविंद सिंह तब डा. मिश्र के एकेडमिक गाइड माने जाते थे. प्रतिफल में जगन्‍नाथ मिश्र ने हरगोविंद सिंह को पहले सोशल साइंस इंस्‍टीच्‍यूट का डायरेक्‍टर और बाद में बिहार विधान परिषद का सदस्‍य बना दिया था.

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