शिवानंद तिवारी ने प्रज्ञा ठाकुर पर कसा तंज, कहा- दिल की बात जुबा पर आ गई

नाथूराम गोडसे . प्रज्ञा ठाकुर व शिवानंद तिवारी

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क: नाथूराम आतंकी नहीं, शहिद हैं. प्रज्ञा ठाकुर सच बोल रही हैं. इस मामले में वो ईमानदार हैं. नाथूराम गोडसे के बारे में उनकी और हिंदुत्ववादी विचारधारा की जो सोच है उसको उन्होंने प्रकट किया है. यह सोच अकेले प्रज्ञा ठाकुर की नहीं है. बल्कि उस विचार धारा में यक़ीन रखने वाले तमाम लोग नाथूराम को हत्यारा नहीं, शहीद मानते हैं.

गांधी जी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वंय सेवक को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. गोलवलकर जी गिरफ़्तार कर लिए गए थे. जेल से उन्होंने भारत सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को ख़त लिखा था. उस ख़त में उन्होंने संघ को लेकर सफ़ाई दी थी. गांधी जी की हत्या में संघ का हाथ होने से इंकार किया था. सरदार ने जवाब में लिखा था कि संघ ने देश में जो सांप्रदायिक घृणा और नफ़रत की ज़हर फैलाई है, बापू की हत्या उसी का नतीजा है.

संघ की मान्यता है कि मुसलमान और ईसाइ भारत वर्ष के दुश्मन है. इस मान्यता के मुताबिक़ मुसलमानों और ईसाइयों के विरुद्ध हिंदू समाज में नफ़रत और घृणा फैलाने के काम में संघ अनवरत सक्रिय रहता है. 2014 में दिल्ली में मोदी सरकार बन जाने के बाद संघ की विचारधारा को अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी मान्यता मिल गई है.

दूसरे की बात छोड़ दीजिए, हमारे प्रधानमंत्री जी की भाषणों की ध्वनि में सांप्रदायिक नफ़रत घुलामिला रहता है. गोमांस का अफ़वाह या गायों की तस्करी के नाम पर उन्मादी भीड़ द्वारा लोगों की हत्या की जा रही है. लव जेहाद, एक मियाँ चार बीबी, चालीस बच्चे और न जाने क्या- क्या कहकर समाज में घृणा और नफ़रत फैलाया जा रहा है.

इस अभियान को मनुवादियों का भरपूर समर्थन मिल रहा है. सामाजिक न्याय आंदोलन की लड़ाई से कमज़ोर पड़े मनुवादियों को अपना पुराना वर्चस्व प्राप्त करने में सांप्रदायिकता के अलावा राष्ट्रवाद का एक नया उपकरण भी प्राप्त हो गया है. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नफ़रत का एक धार मुसलमानों के विरुद्ध भी उतना ही कारगर हो रहा है.

कुलमिलाकर हम यही देख रहे हैं कि देश में उसी तरह का माहौल तैयार हो रहा है जिस माहौल में गांधी जी की हत्या हुई थी. अन्यथा प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा का उम्मीदवार बनाने का साहस भाजपा में कहाँ से पैदा हो जाता ! प्रज्ञा  ठाकुर से नाथूराम को लेकर दिए गए बयान को वापस कराया गया है. जैसे हेमंत करकरे वाले बयान को वापस कराया गया था. लेकिन कहावत है कि मुँह निकली बात और कमान से छूटा तीर वापस नहीं होता ! इसलिए मनुवाद समर्थित और नफ़रत तथा घृणा पर आधारित अंध राष्ट्रवाद की राजनीति को परास्त करना ही आज का आपद धर्म है.

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