पटना : कोशी आपदा के ख़तरे से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय विमर्श कार्यक्रम का हुआ आयोजन

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : पटना के ज्ञान भवन में कोशी आपदा के ख़तरे से बचाव की जानकारी और कोशी इलाक़े को बचाने के विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विमर्श आयोजित किया गया है. आज पहले दिन चार सत्र का आयोजन किया गया. पहला सत्र आरंभ होने से पहले एक औपचारिक उद्घाटन हुआ. जिसमें पटना विश्वविद्यालय के कुलपति रासबिहारी प्रसाद सिंह, नेपाल के काठमाण्डू से आये ICIMOD के संजीव भुचर, प्लान इण्डिया के तुषार कांति दास, नदियों के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय जानकार दिनेश मिश्रा, ब्रिटेन से आयी फ़्रैंक वाटर की प्रवीना श्रीधर, वेटलैण्ड के दक्षिण एशिया के प्रमुख दुष्यंत मोहिल शामिल ने संयुक्त रूप से द्वीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्धघाटन किया. तमाम अतिथियों का स्वागत संजय पाण्डेय ने किया.

उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो डॉ रास बिहारी प्रसाद सिंह ने कहा कि कोशी को पहले समझना होगा. उसका ठीक से अध्ययन करना होगा. उसके बाद यह जानना होगा कि आज की यह स्थिति कैसे बने. इसके पीछे के कौन कारक है जो ऐसा हो जाने पर विवश हुआ. क्या कोशी समेत देश के तमाम नदियों से कोई खिलवाड़ तो नहीं न हुआ. उसके बाद उसके सामाधान पर धयान दिया जायेगा. बाढ़ निवारण के लिए एक बहुत बेहतर ढंग से रोड मैप बनाने की आवश्यकता है. उन्होंने आगे कहा कि इसका समुचित समाधान क्यों नहीं हो रहा है. इस विमर्श के पहले दिन का पहला तकनीकी सत्र आरंभ हुआ.



इस सत्र में विषय था- कोशी नदी से उपजी चुनौतियाँ और सावधानी. इसके अंतर्गत काठमांडू से आये संतोष नेपाल ने पर्यावरण में बदलाव, बाढ़ और कोशी प्रबधन पर कहा कि व्यक्तिगत निवेश, सरकारों की उदासीनता और पर्यावरण के प्रति सामाजिक चेतना का न होना नुक़सानदायक है. लोगों की बढ़ती आर्थिक और सामजिक महत्वकांक्षा ने पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने का अपूर्व मौका मिल जाता ही. जिसके कारण स्थिति बदतर हो जाती है. संतोष नेपाल ने आकड़ों, ग्राफ़ और मानचित्र को स्क्रीन पर दिखाते हुए कहा कि कोशी नदी के उदगम के बहने की दिशा में परिवर्तन का ध्यान पूर्वक अध्ययन करना होगा.

उन्होंने बताया कि समय के साथ स्थिति भयानक तौर पर बिगड़ी है. इसके कई कारण है. जिसमें जनसंख्या का बोझ प्रमुख है. आबादी का दवाब ने पर्यावरण की स्थिति को न सिर्फ भयानक रूप से बिगाड़ दिया है बल्कि भयावह बना दिया है. आज कोई किसी तरह सुरक्षित नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरण में कई किस्म के परिवर्तन हुआ है. जिसमें कुछ चीजें सामने दिखाई देती है. जैसे गरमी का समय बढ़ गया. जाड़ा ने कम समय में जानलेवा ठंड करती है. बारिश होने के समय में प्राकृतिक स्थिति और भयानक हो गया है.

ब्रिटेन से आयी पर्यावरण विशेषय फ़्रैंक वाटर के प्रवीना श्रीधर ने कहा कि सरकारों के रवैये पर जोरदार हमला किया. इसके साथ ही उन्होंने सभी सरकारी आंकड़े रखते हुए बताया कि किस वर्ष कितने लोग बाढ़ से घिर जातें हैं. स्थिति वहीं बनी रहती हैं. उन्होंने बताया कि लगभग चालीस करोड़ लोग बाढ़ से छः महीने तक जूझना पड़ता है. जिससे उनके दैनिक जीवन में बहुत सारी कठिनाई आती रहती है.

कोशी नदी में बाढ़; पूर्व और वर्तमान की स्थिति पर नदी मामलों के जानकार दिनेश मिश्र ने विस्तार से बात की. श्री मिश्रा ने आजादी के बाद से अबतक के स्थिति को आंकड़े के साथ सारी बातें रखी. उन्होंने कहा कि 1947 में बारिश की सामान्य स्थिति रही. लेकिन 1948 में भयानक बाढ़ आ गयी. आकाल नहीं आया. 1949 में हथिया नहीं बरसी जिसके कारण आकाल आ गया. दुनिया के अलग अलग मुल्कों से आनाज़ मांगना पड़ा. सोवियत रूस से लेकर अमेरिका के साथ श्रीलंका और थाईलैंड से भी आनाज़ मंगाए गए. मगर उस समय आकाल घोषित नहीं किया गया. 1966 में पहली बार बिहार में बाढ़ के चलते आकाल घोषित किया गया. उस समय महामाया प्रसाद मुख्यमंत्री थे. मिश्रा ने कहा कि नीतियां तो हर सरकार में बनी लेकिन जमीन पर कब उतरेगी यह सबसे महत्वपूर्ण है.

इस अवसर पर सामजिक कार्यकर्त्ता रंजीव कुमार, आरती वर्मा, फ़ैयाज़ इक़बाल आदि मौजूद थे. दो दिवसीय इस अन्तराष्ट्रीय विमर्श का आयोजन आईसी आई एम ओ डी, प्लान इंडिया, कैरिटस इंडिया के द्वारा किया गया. कार्यक्रम का संचालन संजय पांडेय ने किया.