आरा का खुरमा पहुंचा अमेरिका, स्पेशल ऑर्डर देकर मंगाते हैं विदेशी

लाइव सिटीज डेस्क :(आदित्य नारायण) आरा में गोला पर एक जगह है जहां आपको खुरमा की चार-पांच दुकानें दिख जाएंगी. यहां से गुजरने पर आपको  बड़े-बड़े परात में सजे खुरमा की खुशबू व मिठास अपनी ओर एक बार जरूर खींच लेगी. क्योंकि जो एक बार मीठे और रसीले खुरमा का स्वाद चख ले वो इसका मुरीद बन जाता है. खुरमा मिठाई के मिठास की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बिहार की पारंपरिक मिठाई खुरमा विदेशियों को भी खूब भाती है.

भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से लगभग 12 किलोमीटर दूर बसे गांव उदवंतनगर का खुरमा जो एक बार खा लेता वो इसके स्वाद को कभी नहीं भूलता. यही कारण है कि जो भी लोग उदवंतनगर से होकर गुजरते हैं वो इस मिठाई को खाना नहीं भूलते.

आपको बता दें कि, केवल छेना और चीनी से बनने वाली ये मिठाई शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर, रोहतास और बक्सर जिले अलावे बिहार में भी कहीं और नहीं मिलती. देखने में खुरमा बिल्कुल अनगढ़ की तरह दिखता है लेकिन अंदर से मिठास के साथ-साथ इतना रसीला होता है कि स्वाद जीभ से सीधा दिल में पहुंच जाता है. इस क्षेत्र के लोग अगर रिश्तेदार के घर जाते हैं तो इस मिठाई की डिमांड और बढ़ जाती है.

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उदवंतनर के हलवाई संतोष पिछले दिनो पटना में आयोजित व्यंजन मेला में अपनी क्षेत्र की इस बेहतरीन मिठाई के साथ आए थे. उन्होंने इस मिठाई के बारे में बताते हुए कहा कि यह मिठाई दिखने में जितनी सुंदर लगती है. उतना ही स्वादिष्ट है इसका स्वाद. एक बार जिस भी व्यक्ति ने इस खुरमा चख लिए. वो इसका स्वाद लेने दोबारा लौटकर जरूर आता है.

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संतोष बताते हैं कि यह मिठाई आरा, रोहतास और बक्सर के अलावा और कही नहीं मिलती. हालांकि इसके दिवाने पूरी दुनिया में है. और इसका प्रमाण है विदेशों से आने वाले ऑर्डर. जी हां, खुरमा मिठाई के दीवाने न सिर्फ बिहरा बल्कि दुनिया के कई देशों में है. संतोष के उदवंतनगर के शॉप पर अमेरिका से खुरमा के लिए स्पेशल ऑर्डर आते हैं.

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हालांकि खुरमा का बाज़ार अन्य भारतीय मिठाइयों के मुकाबले थोड़ा सीमित है और इसमें मिलावट की गुंजाइश बहुत कम होती है, जिसके चलते खुरमा बनाने वालों को बहुत फायदा नहीं होता है. लेकिन कम मुनाफे के बावजूद कुछ मिठाईवाले अपनी इस पारंपरिक मिठाई को पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं.

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हम हैं आदित्य. फैन हैं. किसी आम इंसान के नहीं. भगवान के. वो भी ऐसे-वैसे भगवान नहीं. देवों के देव महादेव के. उनके जो इस सृष्टि के संचालक हैं. हां हम धार्मिक आदमी हैं. भगवान को मानते हैं. बम भोले-बम भोले का जाप करते हैं. कर्मठ व्यक्ति हैं. श्रम का महत्व समझते हैं. इसलिए उसे बचाकर खर्च करते हैं. देखने में ठीक-ठाक है. पर फिर भी खराब दिखते है. ये सखी कहती है. बाकी हमारी जिंदगी का एक्कै मकसद है. उस चीज को पाना, जिसे पाना मुश्किल हो. कहने को लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट है. फेसबुक पर प्रेम और फूड पर बहुत लिखते हैं. मगर जब कोई इनबॉक्स में आकर कहता है, आप अच्छा लिखते हैं. तो शर्माकर नीले हो जाते हैं. क्योंकि शिव का रंग भी, तो नीला ही है. बाकी की जानकारी मुझसे मिलकर ही पता की जा सकती है. हां मुझे समझने में आपको परेशानी हो सकती है. लेकिन ये मेरी नहीं आपकी दिक्कत है.

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