सेक्सजनित बेहद गंभीर रोग है सिफलिस, लक्षण-कारण जानकर आयुर्वेद में कराएं रामबाण इलाज

सिफलिस एक ऐसा रोग है ,जिसकी उत्पत्ति दूषित मैथून से होती है. यूनानी में इसे आतशक व सामान्य बोलचाल की भासा में इसे गर्मी रोग कहते है. सेक्सजनित यह रोग अधिकतर उन पुरुषों में मुख्य रूप से पाया जाता है, जो समलिंगी होते है. रोग प्रायः सिफलिस (उपदंश) से पीड़ित स्त्री या पुरुष से शारीरिक संबंध बनाने से होता है. यह रोग चूमने से,जख्म को चूसने से या जख्म के और किसी अंग से स्पर्श होने पर जंहा खराश हो सकता है. चुम्बन से या होंठो पर प्राथमिक व्रण वाले रोगी के गिलास या कप या प्याले , जिसे साफ धोया न गया हो , कोई चीज खाने या पीने पर सिफलिस का प्राथमिक व्रण होठों पर हो जाता है.

रोग कारण- संभोग इसका मुख्य कारण है. दूषित योनि वाली रमणी एवं ब्रह्मचारिणी के साथ सहवास करने से, अधिक मैथुन करने से, मैथुन के बाद लिंग को न धोने से अथवा क्षार मिश्रित उष्ण जल में धोने से तथा और भी अनेक कारणों से लिंग में क्षत हो जाता है. जिस प्रकार प्रबल कामवासना होने पर लिंग में नाखून और दांत का घाव हो जाता है अथवा हांथ से लिंग में किसी प्रकार का अभिघात होकर उपदंश (गर्मी) रोग उत्पन्न हो जाता है. उसी प्रकार दूषित पुरूष के साथ सहवास प्रभृति कारणों से स्रियों को भी रोग उत्पन्न हो जाता है. ऐसा आयुर्वेदीय सिद्धान्त है.

यह एक विशेष संक्रामक रोग जो ट्रेपोनिमा पेलिडम नामक जीवाणु से होता है. यह जीवाणु शरीर की त्वचा व उत्तकों में इंजेक्शन द्वारा या गर्भस्थ शिशु में माँ के खून के द्वारा भी फैल सकता है. जीवाणु त्वचा या श्लेष्मिक झिल्ली में किसी भी कटी-फटी जगह से प्रवेश कर सकता है. इसका संक्रमण काल 10 से 90 दिन का होता है

रोग लक्षण–

प्राथमिक सिफलिस – संभोग करते समय यदि एक सहयोगी इस रोग से ग्रस्त है, तो दूसरे व्यक्ति में भी इस रोग के जीवाणु पहुंच जाते है. शरीर मे प्रवेश स्थल पर अल्सर हो जाता है. जिसे प्राथमिक सिफलिस कहते है. यह अल्सर संख्या में एक या दो हो  सकते हैं. पुरुष में यह अल्सर शिशन (लिंग) पर और महिलाओं में लेबिया,क्लाइटोरिस व ग्रीवा पर होते हैं.

प्रतीकात्मक फोटो

द्वितीय सिफलिस – एक से तीन महीने बाद यह अवस्था प्रारम्भ होती है. इसमें रोग दानों के रूप में त्वचा तथा श्लेष्मिक झिल्ली पर उभरता है. दाने लक्षनरहित होता है. तथा लाल रंग के एक समान भुजाओं के बाहरी हिस्सों पर होते है, पर इसमें पानी नहीं होता है. इसमें लिम्फ नोड्स बढ़ जाते है और बाल झड़ने लगते हैं. सम्पूर्ण जोड़ों व दोनों तरफ की हड्डियों में सूजन आये बिना दर्द होने लगता है. यह दर्द रात के समय बढ़ जाता है. इस प्रकार के लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाते हैं. पर रोग बना रहता है. रक्त की कमी भी हो सकती है.

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दूसरी और तीसरी अवस्था के बीच-  इस समय तो कुछ समय तक कोई विशेष लक्षण नहीं रहते. कभी कभी तो 2 से लेकर 15 बर्षों तक निकल जाते हैं. बहुधा तीसरी अवस्था मे रोग 6 माह बाद पहुंचता है. इस अवस्था में जीवाणु शरीर के किसी भी अवयव पर आक्रमण कर सकते हैं. हृदय, रक्तवाहिनियों, यकृत, हड्डी, मस्तिष्क, त्वचा आदि किसी भी अंग पर वे अपना नाशक चिन्ह दिखा सकते हैं. इस प्रकार उपदंश व्यक्ति  को होनेवाले भयंकर रोगों में से एक है. यह सारे शरीर में फैलने वाले एक संक्रामक रोग है. यदि इस रोग की भली भांति चिकित्सा न कि जाय ,तो यह संतान में भी प्रविष्ट हो सकता है

माता पिता का उपदंश संतान में भी जाता है. यह या तो माता के रक्त से या पिता के वीर्य से संतान में जाता है. इसके प्रकोप से या तो गर्भ नष्ट हो जाता है या संतान जन्म से ही इस रोग से पीड़ित रहती है एवं कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो जाती है. यदि संतान जीवित बच भी जाय , तो भी आगे चलकर नाक, कान आदि शरीर के विभिन्न अवयवों में विकार उत्पन्न हो जाते हैं. इसलिये 12 -15 बर्ष की आयु तक ही बच्चा जी पाता है.

चिकित्सा – इस रोग की स्थायी व सफल इलाज आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में संभव है. चिकित्सा प्रारंभ करने के पूर्व चिकित्सीय परामर्श अवश्य लें. इस बीमारी का इलाज शीघ्रताशीघ्र करा लेना चाहिए.

इससे जुड़ी किसी भी तरह की समस्या के समाधान के लिए पटना के जाने-माने सेक्स रोग विशेषज्ञ डॉ. मधुरेन्दु पाण्डेय (बी.ए. एम.एस) से संपर्क किया जा सकता है. उनका कांटेक्ट नंबर है : 9431072749/9835081818. उनके क्लिनिक का पता है : मनोरमा मार्केट, बंगाली अखाड़ा, डी एन दास लेन, लंगर टोली, पटना-4, बिहार. आप इनकी ऑफिसियल वेबसाइट www.sexologistinpatna.com पर भी जाकर अपनी अप्वाइंटमेंट फिक्स करा सकते हैं.

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