एक उपन्यास के लिए 175 लाख रूपये ! Oh My GOD!!

#बिहार के लोकप्रिय लेखक #रत्नेश्वर जी का #उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ अभी पाठकों के हाथों में नहीं आयी है. हालांकि इसकी प्री-बुकिंग हो रही है और जबरदस्त हो रही है. 4 सितंबर को इसके लोकार्पण की तारीख निर्धारित है. लेकिन इससे पूर्व ही यह उपन्यास देशव्यापी चर्चा में है. चर्चा इसलिए कि इसमें लव स्टोरी तो है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा इसका सेंट्रल थीम है. और इसलिए भी कि इसके प्रकाशक नॉवेल्टी ऐंड कंपनी ने इस उपन्यास के लिए लेखक के साथ पौने दो करोड़ रुपये (अगे मइया गे!!) का एग्रीमेंट किया है. किसी भारतीय लेखक के लिए हिंदी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में यह चौंका देने वाला करार है. समझ रहे हैं न? पौने दो करोड़ रुपये!! यानी 175 लाख रूपये. बाप रे बाप !!

(यह बातचीत दो पार्ट में पोस्ट है. यह फर्स्ट पार्ट है. सेेकंड पार्ट के लिए इस साक्षात्कार के अंत में दिए गए लिंक पर क्लिक करना होगा.)

 

 

#LiveCities की और से विमलेन्दु सिंह ने ‘रेखना मेरी जान’ उपन्यास  के  उपन्यासकार  रत्नेश्वर जी से लंबी बातचीत की. यहां प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश-

‘रेखना मेरी जान’ उपन्यास की विषय वस्तु के बारे में कुछ जानकारी दीजिए. इसमें हमें क्या नया पढ़ने को मिलने जा रहा है?

यह ऐसा पहला उपन्यास है जो ग्लोबल वार्मिंग पर केंद्रित है. भारतीय परिवेश में फिक्शन के लिए यह बिल्कुल नया विषय है. दरअसल हिंदी उपन्यास अभी भी जमीन-जायदाद, स्त्री विमर्श, रिलेशनशिप, ग्राम्य कथा, प्यार मुहब्बत आदि विषयों से आगे की सोच नहीं पाया है. बल्कि यह कहिए कि लेखक इन सोचों से अबतक उबर नहीं पाए हैं. हम अभी तक वहीं फंसे हुए हैं. ग्लोबल वार्मिंग हिंदी कथा जगत के लिए बिल्कुल नया और अनछुआ विषय है. लोग जानते हैं कि प्रकृति का स्वरूप बदल रहा है. मौसम चक्र बदल रहा है. जलवायु परिवर्तन का दौर है. आने वाले दिनों फसल चक्र में गड़बड़ियां देखने को मिलेंगी. खाद्यान्न का संकट गहराने की आशंका है. पूरी दुनिया में पानी का संकट सबसे बड़ी समस्या के रूप में प्रकट होने वाला है. आने वाले समय में कुछ ऐसी बीमारियां पैदा होंगी जो पहले कभी नहीं हुई थीं. इसी को ध्यान में रखकर 8-10 साल पहले ख्याल आया कि इस विषय पर हमें कुछ करना चाहिए. क्या रिलेशनशिप और क्या संपत्ति जायदाद! यहां तो अस्तित्व पर खतरा है. मानव तो बचा रहे. जिंदगी तो बची रहे. सभ्यता तो कायम रहे. वैसे मैं आपको बता दूं कि इसमें एक सुंदर-सी प्रेम कथा भी है.

आप इसमें प्रेम कथा भी होने की बात कह रहे हैं. प्रेम कथा या प्यार पूरी तरह से फिक्शन का मामला है. जबकि ग्लोबल वार्मिग को देखा जाय तो यह नॉन-फिक्शन का विषय है. आपने दोनों को एक साथ कैसे गूंथा?

मैंने उपन्यास की रचना की है. अब देखिए जैसे अभी बिहार के ज्यादातर हिस्सों में बाढ़ की स्थिति है. पूरी धरती जल प्लावित है. तो आप एक बात बताइए कि बाढ़ और तूफान से जान बचाकर भागने वाले लोगों के बीच क्यों प्रेम नहीं होगा? संकट की स्थिति में मानवीय संवेदनाएं खत्म तो नहीं हो जाएंगी? मुश्किलें अपनी जगह हैं और प्रेम अपनी जगह. इन मुश्किलों में प्रेम कैसे पनपता है या कैसे चलता है, और कैसे आगे बढ़ता है, यह देखने वाली बात होगी. सामाजिक द्वंद्व के बीच प्रेम पर जो खतरे हैं उस पर तो खूब लेखन हुआ है लेकिन प्राकृतिक विपदाओं के बीच प्रेम पर जो खतरे हैं इस पर कभी नहीं लिखा गया है. यह बिल्कुल नई चीज है जिसे आप मेरे उपन्यास में पाएंगे. और आपको बता दूं कि आप जब इस उपन्यास को पढ़ेंगे तो चौंक जाएंगे कि अच्छा यह है प्रेम!

‘रेखना मेरी जान’ की चर्चा करें और पब्लिशर के साथ राइटर के कांट्रेक्ट की चर्चा न करें तो बात अधूरी ही रह जाएगी. पौने दो करोड़ या 175 लाख रूपये का करार हुआ है आपका. जब इतना धन मिले तो प्रकाशक चाहता है कि सबकुछ उसके मनोनुकूल हो ताकि बाजार से मुनाफे के साथ पूंजी की वसूली की जा सके. ऐसे में तो लेखक भी बाजार के दबाव में आ जाता होगा. इस दबाव की स्थिति में लेखक की अभिव्यक्ति कितनी सहज, स्वतंत्र और स्वाभाविक रह पाती है?

देखिए, यह उपन्यास काफी पहले लिखा जा चुका था, इसलिए ‘रेखना मेरी जान’ के मामले में तो मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा. आपको बता दूं कि कई प्रकाशकों के यहां से इसकी पांडुलिपि लौटाई जा चुकी थी. कई जगहों से यह लौटकर मेरे पास आ गई. कई जगहों पर उन्हें इसका विषय बिकने वाला नहीं लगा तो कई प्रकाशकों ने इसमें ‘जरूरी बदलाव’ करने के सुझाव दिए. कई प्रकाशक इसे अपनी शर्तों पर प्रकाशित करने को राजी थे, इसलिए मैंने कोई जल्दबाजी न दिखाते हुए थोड़ा इंतजार करना बेहतर समझा. मैंने ऐसे किसी भी सुझावों को स्वीेकार नहीं किया. दरअसल कोई भी रचना या कृति किसी लेखक या कथाकार की मौलिक अभिव्यक्ति होती है. इंतजार फलदायी रहा. नोवेल्टी एंड कंपनी प्रकाशन की दुनिया में जाना—पहचाना नाम है और 72 वर्षों से पब्लिशिंग की फील्ड में है. नोवेल्टी फिक्शन में बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं रही है लेकिन अब सक्रिय होने के मौके की तलाश में थी. प्रकाशक को ‘रेखना मेरी जान’ इसके लिए माकूल लगा और इसके बाद सबकुछ सामने है.

भारत में फिक्शन राइटिंग की दुनिया में आपने कांट्रेक्ट की एक ऐसी लकीर खींच दी है जिसके समानांतर या इसके करीब भी दूसरी कोई लकीर निकट भविष्य में भी नजर नहीं आ रही है. इससे एक तो प्रकाशक से दूसरे लेखकों की अपेक्षाएं बढ़ गई होंगी; दूसरी बात यह कि प्रकाशक पर दबाव भी बढ़ गया है. आप क्या कहेंगे…

प्रकाशक पर दबाव बढ़ा यह तो अच्छी बात है. अब तक एक एक प्रकाशक साल में 1000–1200 तक किताबें छाप रहे थे. इनमें से 250-300 प्रतियां भी बाजार में खप गईं तो उनकी पूंजी निकल जाती थी. फिर धीरे-धीरे 500-600 किताबें बेच ली, थोड़ा मुनाफा कमा लिया, प्रकाशक का काम निकल गया. ऐसी स्थिति से उबरने की जरूरत थी. प्रकाशकों ने अब इसकी तैयारी शुरू कर दी है. तमाम प्रकाशक चाहे राजकमल हों या वाणी, हार्पर कॉलिंस, हिंद युग्म, पेंग्विन सभी ने पेपर बैक संस्करण लाना शुरू कर दिया है. प्रकाशक इंटरनली बाजार में अपनी पैठ बढ़ाने का दबाव महसूस कर रहे थे. किताबों की संख्या कम हो लेकिन उसे बेहतर तरीके से बाजारों में पहुंचाया जाना ज्यादा जरूरी है.

किताबों को बेहतर तरीके से बाजार में पहुंचाना कैसे संभव हो पाएगा?

ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म जैसे कि फ्लिपकार्ट, अमेजन आदि ने मुश्किलें काफी आसान कर दी हैं. कहीं जाने की जरूरत नहीं है. आप आर्डर करें तीन से चार दिनों के अंदर किताबें आपके घरों तक पहुंचाई जा रही हैं. ये अभी शुरूआत है. चार-पांच साल के भीतर इसका चलन बढ़ा है. यह चलन भी प्रकाशक को सपोर्ट कर रहा है. अभी जो डिजिटल इंडिया और कैशलेस इकोनोमी का कैंपेन चल रहा है. लोग कंप्यूटर और इंटरनेट फ्रेंडली हो रहे हैं. नेटबैंकिंग और प्लास्टिक मनी का इस्तेमाल करने लगे हैं. यह सब भी इसमें मदद करेगा.

लेकिन पढने की प्रवृत्ति पहले जैसी नहीं है. पुरानी प्रवृत्ति को कैसे पुनर्जीवन मिल पाएगा?

सही कहा आपने. 30-40 साल पहले हमारे यहां पढ़ने की जो एक परंपरा हुआ करती थी, उसमें काफी कमी आई है. मुझे याद है, घरों में लोग तब उपन्यास अपनी पाठ्य पुस्तकों के बीच छिपाकर पढ़ा करते थे. मैं खुद भी. उपन्यास या कोई भी साहित्य पढ़ने का वह कल्चर खत्म हो गया है. सवाल है कि इसकी वापसी कौन कराएगा. पूंजी किसकी लग रही है. प्रकाशक की. किताब छापने वाले की. आखिर व्यवसाय तो उसका है. लेखक को तो उसका बस एक छोटा-सा अंश मिलता है. तो प्रकाशकों को प्लान करना होगा कि कैसे देश दुनिया में पाठक वर्ग तैयार किया जा सकता है. कैसे उनके बीच अपने किताबों की पैठ बनाई जाए.

इस प्रयास के शुरूआती रूझान से क्या कुछ उम्मीद जगती है?

बेशक जगती है. लेकिन बता दूं कि जब यह सब शुरू होता है तो एकबारगी में सब कुछ पूर्ण नहीं हो जाता है. सारे प्रकाशक इस पर कार्य कर रहे हैं. अभी राजकमल की कुछ किताबें आई हैं जिसकी 10-15 हजार प्रतियां बिकी हैं. वाणी, पेंग्विन, हार्पर कॉलिंस, तमाम प्रकाशकों की किताबें बिक रही हैं. लेकिन तब यह भी है कि तमाम प्रकाशकों की इक्का-दुक्का ही किताबें हैं जो बिकी हैं या बिक रही हैं. लेकिन अगर इक्का-दुक्का किताबें ही अगर बिकी हैं या बिक रही हैं और यह आंकड़ा बढ़ रहा है तो यह एक बहुत बड़ा सपोर्ट है और यह इंगित करता है कि हम बढ़ सकते हैं.

प्रकाशकों के इस भरोसे की वजह? कुछ आधार तो होगा?

इसकी वजह है. स्पष्ट वजह है. 65 से 70 करोड़ भारतीय हिंदी लिखते, पढ़ते और बोलते हैं और हिंदी में रोजगार करते हैं. तो क्या इनमें से 7 लाख लोगों तक भी किताबें नहीं पहुंचायी जा सकती हैं. दिल्ली के वर्ल्ड बुक फेयर में करीब 15 लाख लोग आते हैं. कोलकाता के बुक फेयर में 15-16 लाख लोग पहुंचते हैं. पटना में 5-6 लाख लोग पहुंचते हैं. यानि अलग—अलग जगहों पर लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं जो पाठक हैं. तो यह साबित करता है लोगों में पढ़ने की मानसिकता है. इतने पाठक तैयार बैठे हैं. अब बस इस रूझान को पंपअप करने की जरूरत है. थोड़ा बूस्टअप करने की जरूरत है.

क्या सिर्फ प्रकाशकों की कोशिश एवं ऐसे आयोजनों से ही पाठक वर्ग तैयार हो जाएगा?

नहीं. इतना काफी नहीं है. प्रकाशकों के साथ रचनाकारों को भी इस मुहिम में उतरना होगा. कविवर नागार्जुन जी कहा करते थे कि कविता को जन—जन तक पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटकों की जरूरत है. उन्होंने नुक्क्ड़ नाटक को कविता से जोड़ा. इसलिए कल्चर के जो अन्य आयाम हैं उसको साथ मिलकर काम करने की जरूरत है. चाहे वह पेंटिंग हों, चाहे वह नाटक हो, चाहे वह संगीत हो, यानि सृजन की तमाम विधाओं को मिल-जुलकर काम करना होगा. तब हम साहित्य को जन-जन तक वापसी करा पाएंगे.

इस बातचीत का दूसरा पार्ट अलग पोस्ट में प्रकाशित है.  दूसरे पोस्ट पर जाने एवं आगे की बातचीत पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- 

पढ़ें पार्ट – 2 :

रेखना मेरी जान का लोकार्पण 4 सितंबर को, इस उपन्यास के लिए रत्नेश्वर को मिले हैं पौने दो करोड़ रूपये! Oh MY GOD !!

 

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*