पच्चीस से तीस साल वाली उम्र कन्फ्यूजन के साथ कंप्रोमाइज की होती है. आदमी के जीवन में सब कुछ नया-नया घट रहा होता है. बदल रहा होता है. व्यक्ति कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में आता है. जहां सब कुछ नया होता है. इसलिए थोड़ा अकेला भी होता है. कॉलेज स्टूडेंट्स को दोस्तों के साथ मटरगस्ती कर देख सेंटी हो जाता है. कोसता है खुद को, पुरानी लाइफ तलाशता है. पर मन की न करना सीख जाता है.

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फॉर्मल्स में सज धज हर सुबह दफ्तर जाता है. मन न होते हुए भी काम करता है. हर रोज ऑफिस में कंप्यूटर पर ट्रैवलॉग पढ़ता है. सपने देखता है. पहाड़ों में जा बसने का ख्वाब पालता है पर जिम्मेदारियों के बोझ तले टाल जाता है. सपनों को भूलाकर फिर से की—बोर्ड बजाने लगता है. क्योंकि वह सीख रहा होता है. अंतर्आत्मा की न सुनने का. एक दिन ऐसे ही सीखते-सीखते खर्च हो जाता है. पर वह हार नहीं मानता है. लाइफ में चल रही सभी समस्याओं को भूल जाने के लिए एक ही जवाब देता है, ‘जिंदगी झंड बा.’ जब भी पूछो और क्या हाल है? तो जवाब मिलेगा, ‘ज़िंदगी झंड बा.’


यह शब्द हम बिहारियों के बीच फेमस भी बहुत है. जब भी निराशा व्यक्त करना हो, तो मुंह से ‘ज़िंदगी झंड बा’ निकल आता है. फिल्म स्टार रवि किशन ने भी ‘बिग बॉस’ में ‘जिंदगी झंड बा’ जुमले का इस्तेमाल किया था. उसके बाद तो यह बिहार के बाहर रहने वाले लोगों के द्वारा भी इस्तेमाल किया जाने लगा. ऊपर मैंने आपको कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करने वाले इंसान की मन:स्थिति से रूबरू कराया. आगे नेहा नूपुर के शब्दों में पढ़िए कि 25 से 30 साल का आम युवा कब और क्यों कहता है कि ‘जिंदगी झंड बा.’ क्या-क्या परिस्थतियां घटती है कि उसे हर बात के जवाब में बस ‘जिंदगी झंड बा.’ कहकर सुकून मिलता है.


लेकिन इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले नेहा नुपूर से आपका परिचय करवा देते हैं. नेहा कवयित्री हैं. “जीवन के नूपुर “ के नाम से एक किताब भी पब्लिश हो चुकी हैं. लोगों ने खूब पसंद भी किया. इसके अतिरिक्त नेहा, “नूपुर की पाठशाला” नाम से ब्लॉग भी चलाती हैं, जहां सामान्य घरों में रहने वाले लोगों के जीवन में, जो आसामान्य बातें चलती हैं, उस पर लिखती हैं. सोशल मीडिया में काफी एक्टिव हैं. अक्सर लाइव हो कर लोगों को गाना सुनाने लगती हैं. बाकी आप उनके द्वारा लिखी ‘जिंदगी झंड बा’ को पढ़ समझ सकते हैं. पढ़िए और पसंद आये तो शेयर कीजिए—

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बकौल नेहा नूपुर — ये 25 से 30 वाली उम्र बड़ी खतरनाक होती है. जितनी खतरनाक, उतनी उबाऊ और उतनी ही बेचैन. मतलब आपको समझ ही नहीं आता कि दुनिया में हो क्या रहा है. आप खुद नहीं समझ पाते कि आप ज्यादा तहस-नहस हो रहे हैं या आपकी दुनिया! आपको अब न्यूज़ चैनल वालों पर भरोसा कम, तरस ज्यादा आता है. आपको फ़िल्में कुछ ज्यादा ही फिल्मी लगती हैं. आपको टीवी पर आने वाले शोज के बीच में विज्ञापन देखना ही ठीक लगता है. टैलेंट दिखाते हुए बच्चों के बात-बात पर सहानुभूति बटोरने वाले स्टंट्स आप समझ चुके हैं, अब कभी भी, अचानक गुस्सा आ जाता है इनपर. आपको रेडियो पर मन की बात सुनने से भी चिढ़ है और प्रसार भारती के विज्ञापनों से भी.

आपको पता चल चुका है कि रिश्तेदारियां दूर-दर्शन की वस्तु हैं और दोस्ती सिर्फ फ्रेंडशिप डे का झोल. बिजनेस पार्टनर्स ज्यादा मासूम और सच्चे लगने लगते हैं. दोस्तों की शादी हो रही होती है और आप उनके बारात की पूड़ियां चबाकर थक चुके हैं. आपको अब नागिन डांस का शौक भी नहीं रह गया है, तस्वीरें भी मजबूरन मुस्कुराने की वजह मात्र लग रही हैं. आपको अपनी पुरानी गर्लफ्रैंड या बॉयफ्रेंड की याद भी नहीं आती, नये वाले बनाये भी नहीं जाते. कॉलेज के बच्चे ज्यादा बड़े नज़र आते हैं और स्कूल के बच्चों के सवालों से भागते फिर रहे हैं.


इसी बीच किसी खास को देखकर दिल की धड़कनों के बढ़ने का एहसास होता है, सब समझ आता है, आप इश्क़ में पड़ने वाले हैं, पर नहीं यार… अब न ही इच्छा है और न ही हिम्मत. कौन जाए दिल तुड़वाने. आस लगाए बैठे हैं कैरियर में कुछ अच्छा हो जाये. मेहनत कर रहे हैं, परिणाम नहीं मिल रहे. पढ़ाई-लिखाई का अब मन नहीं करता, लेकिन जॉब भी चाहिए, कॉम्पिटिशन भी देना है. घिस रहे हैं रेलगाड़ी और उल्टी धारा वाले गणित को, इंग्लिश ग्रामर मजबूत कर रहे हैं. पढ़ाई की उमर तो निकल ही चुकी है, जॉब की उमर भी निकलने का खतरा मंडरा रहा है.

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पढ़ते-पढ़ते किताब के बीच फंसी चींटी को देखकर अब कोई ख्याल नहीं आता. फिर भी देखते रहते हैं उन्हें बेवजह, पढ़ाई के बीच का अब यही ब्रेक है. फेसबुक खोलते हैं तो फिर दिख जाती है वही फोटो- लाइक करें, शेयर करें तो अच्छे दिन आएंगे टाइप्स; खिन्नाकर बंद कर देते हैं.
जो मिलता है, दो ऑब्जेक्टिव और फिर ढेर सारे सब्जेक्टिव सवालों के पर्चे लिए मिलता है. ऑब्जेक्टिव सवाल- जॉब लगी? शादी ठीक हुई?

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अब आपके ‘हाँ’ या ‘ना’ पर आगे के सवाल परोसे जाने को तैयार हैं. समझ तो गये ही होंगे! क्यों न समझें, ये उमर ही ऐसी है, सारे पंच-सरपंच समझ में आने लगे हैं आपको. नेताओं को बस वोट देने तक याद रखना और देश को बस झंडा फहराने तक मनन करना, आदत बन चुकी है.

दरअसल ऐसे ही कट रहे दिनों के बारे में प्रचलित है कि ज़िंदगी झंड बा! और हम हर ‘और बताओ’ के जवाब में यही कहना चाहते हैं कि ‘जिंदगी झंड बा!’