‘हर गली चौक-चौराहे पर कोचिंग सेंटर खुले हैं, लेकिन सरकारी नौकरी कितने युवाओं को मिलती है’

बिहार की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति हम में किसी से छुपी नहीं है. फर्जीवाड़ा तो जैसे शिक्षा का एक अभिन्न अंग बन गया है. ऊपर से दिन ब दिन कम होती रोजगार की उम्मीद ने स्टूडेंट्स को पलायन पर मजबूर कर दिया है. भ्रष्टाचार एक अलग व्यापक विषय बनता जा रहा है. ऐसे में अगर इससे लड़ना है तो बिहार को भी बदलाव को एक्सेप्ट करना होगा. जिस प्रकार से दूसरे राज्यों में एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा दिया जा रहा है.बिहार को भी इस ओर रुख करना होगा.

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आज लाइव सिटीज ने स्टूडेंट्स के मन को इसी बात पर टटोला कि बदलते समय में उनकी प्राथमिकता क्या है ‘सरकारी नौकरी या एंटरप्रेन्योरशिप’. ऐसे में स्टूडेंट्स से जो जबाब सरकारी नौकरी के लिए मिले वो संतोषजनक नही थे.

पटना यूनिवर्सिटी के छात्र नेता अंशुमान बिजनेस करने को ज्यादा फायदेमंद मानते हैं. उन्होंने कहा कि यहां सरकारी नौकरी को बड़ा और बिजनेस करने को छोटा काम समझा जाता है. बिजनेस का मतलब निकाला जाता है कि कोई काम नहीं मिला होगा, तो बिजनेस में लग गया, पर सच यह नहीं है. बिजनेस में क्रिएटिविटी है, नई सोच है.

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अंशुमान

वो कहते हैं – जिस तरह से आज सालों की मेहनत के बाद सरकारी नौकरी न मिलने के कारण स्टूडेंट्स डिप्रेशन में चले जाते है.अगर स्किल न हो तो स्थिति बद से बदतर हो जाएगी.

पेशे से शिक्षक रजनीश कहते है कि यहाँ प्राइवेट इंवेस्टर न के बराबर हैं.जिस कारण कहीं न कहीं यूथ सफ़र कर रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि पॉलिटिकल ट्रांसपेरेंसी और यूथ डेवलपमेंट में यूथ का बड़ा रोल है. जहां तक बिहार का सवाल है, यहां पब्लिक सेंट्रिक ग्रोथ हुआ है, पर प्राइवेट इंवेस्टर नहीं के बराबर हैं.

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रजनीश

सरकारी नौकरी के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि हर गली चौक-चौराहे पर कोचिंग सेण्टर खुले है पर जरा ये तो बताइए कितनी प्रतिशत सरकारी नौकरी पाने में युवा सफल होते है. ऐसे में यूथ को सेल्फ सेंटरड होना होगा.

यूथ के लगातार बिहार से पलायन पर बताते हुए मगध महिला की छात्रा काजल कहती हैं कि पलायन लाभकारी और हानिकारक दोनों हो सकता है. अभी जो बिहार से यूथ का पलायन हो रहा है वो “लो वैल्यू” का है. यानि यूथ प्राय: दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की ओर रुख कर छोटी- छोटी नौकरियां या सर्विस करते है, इसलिए यह स्टेट के लिए लाभकारी नहीं है. लेकिन माइग्रेशन का कारण हाई वैल्यू का होना चाहिए, तभी इसे उपयोगी कहा जा सकता है, स्टेट या इंडिविजुअल के लिए.

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काजल

दिल्ली में एक आईटी फ़र्म की मालिक पूजा सिंह कहती हैं – मेरी स्कूलिंग बिहार से हुई. लेकिन वहां की शिक्षा रोजगारपरक नही है. सरकारी नौकरी के लिए वक़्त चाहिए ऊपर से कुछ सीट में ही रश बहुत है. खुद एंटरप्रेन्योरशिप बन कर एक नए तरीके से डेवलपमेंट किया जा सकता है. आज के समय में जिस प्रकार से लोगों की जरूरतें बढ़ी हैं, उसमें समुचित कार्यो को अमली- जामा पहनाने के लिए बड़ी धन राशि खर्च करने की जरूरत है. लैंड रिफॉर्म, पब्लिक हेल्थ, एग्रिकल्चर ग्रोथ आदि कई एरियाज में इंवेस्टमेंट की जरूरत है. जब तक इन्हें समुचित रूप से महत्व नहीं मिलेगा, तब तक लोग मजबूर रहेंगे, इसलिए ऐसे तमाम क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार ध्यान दे. आखिर यूथ भी तो इसी समाज का ही हिस्सा हैं.

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पूजा

अंततः यूथ से बात करने के बाद निष्कर्ष यह निकलता है कि आज एक साथ कई चीजों पर उनका ध्यान है. जहाँ एक तरफ सरकारी नौकरी में रश और नौकरी की gaurantee न के बराबर होने के कारण यूथ पलायन पर मजबूर है. वही दूसरी तरफ वो एंटरप्रेन्योर बनने की दिशा में ज्यादा इंटरेस्टेड है. क्योंकि सबसे अधिक वर्किंग पॉपुलेशन यंग है. वो खुद को नई चुनौतियों को तैयार करने के लिए डिसिप्लीन को फॉलो करते हैं.

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