पटना के गाँधी मैदान में आने वाले 15 अगस्त की तैयारी शुरू हो गयी है. वहां से गुजरते हुए दो चीजों पर खास ध्यान चला जाता है. हालाँकि ज्ञान भवन आजकल आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया है. लेकिन इसके इतर शहीद पीर अली खान पार्क और गाँधी म्यूजियम भी इस जगह की पहचान में शुमार है. लेकिन दुख की बात है कि एक तरफ जहां शहीद पीर अली खान पार्क युवाओं की मस्ती का अड्डा बनता जा रहा है, वहीँ दूसरी तरफ पटना का गाँधी म्यूजियम युवाओं की दिन-रात राह ताक रहा है.

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हालांकि सरकार ने म्यूजियम की रख-रखाव पर अच्छा खासा खर्च किया है. फिर भी गाँधी की ये उपेक्षा युवाओं द्वारा क्यों हो रही है. इसी का जबाब जानने की इच्छा लिए मैं गाँधी म्यूजियम की ओर गई.

बता दें कि पिछले छह दशकों में सामाजिक बदलाव की जो कहानी लिखी गई है. उसका अधिकांश हिस्सा युवा पीढ़ी के नाम है. हालाँकि यूथ के बीच गाँधी जी की एक अलग पहचान हमेशा से रही है. उन के प्रति युवाओं के आकर्षण की बड़ी वजह थी कि वे विश्वसनीय थे. उन्हें यकीन था कि गांधीजी उनकी समस्या का समाधान कर सकते हैं और शासक वर्ग को पूरी तरह से समझते हैं. तब के युवा गांधी जी को बुद्धिमान व संवाद करनेवाला मानते थे. लेकिन आज भारत जिस तेजी से ग्लोबलाइजेशन की राह पर दौड़ रहा है उससे युवा वर्ग गांधी के सपनों के भारत से न केवल दूर होते जा रहे हैं बल्कि वह वेस्टर्न कल्चर की चकाचौंध को आत्मसात करने में लगे हैं.

गाँधी म्यूजियम में संविधान सभा द्वारा स्वीकृत मूल संविधान की कॉपी के साथ-साथ गाँधी द्वारा जेल में इस्तेमाल किये हुए बर्तन के अलावा भी ऐसी चीजें हैं जो आज क यूथ को देखनी चाहिए. देवघर यात्रा के दौरान गाँधी जी पर हुए हमले में वो जिस गाड़ी पर थे वो गाड़ी भी वहां रखी गयी है. गाँधी वंशावली के साथ इतिहास की एक झलक यहाँ देखने को मिल जाती है.

पिछले 20 सालों से गाँधी म्यूजियम में कार्यरत जय प्रकाश से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि पहले यहाँ पर 100-150 लोग आते थे. वो लोग गाँधी जी के विषय में जाने के लिए बहुत आतुर रहते थे. उनकी चीजों को देख कर उसको आत्मसात करते थे. हमलोगों को भी बहुत मन लगता था. पर अब 10-20 लोग ही आते हैं. जबकि सरकार ने यहाँ बहुत डेवलपमेंट किया है. स्टूडेंट्स के लिए लाईब्रेरी है, जहाँ गाँधी से जुड़ी बहुत किताबें है. साथ ही यहाँ चारों तरफ घुमने का भी अच्छा प्रबंध है. फिर भी न जाने क्यों युवा यहाँ नही आते.

उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि अगर यूथ में अब उस इतिहास को जानने की लालसा नहीं रही तो ये दुर्भाग्य है. माँ-बाप भी बच्चों को पार्क में घुमने ले कर जाते हैं. लेकिन यहाँ आना उनको बोझिल लगता है.

म्यूजियम में घूमते हुए जो कुछ यूथ यहां दिखे उनकी बात सुनकर बड़ी ही निराशा हुई. जो युवा कभी गांधी के सपनों क देश बनाने की सोचते थे उनके रोल मॉडल अब बदल चुके हैं. मैं ये नहीं कह रही कि आज का यूथ जिन्हें अपना रोल मॉडल मानता है, वो ग़लत हैं.

बात अगर पॉलिटिक्स क करें तो यूथ क रोल मॉडलों में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव भी हैं, लेकिन गाँधी इन के बीच से कहीं खोते जा रहे हैं.