आज शनिवार है, शाम में भूंजा और रात में खिचड़ी तैयार है!

हमारे खान—पान की परंपरा भी अजीब है. अब इसे ही लीजिए. क्या आपको दिन विशेष से जुड़े किसी भोजन के बारे में जानकारी है? दिमाग पर जोर डालिए. कुछ ध्यान आया? नहीं आया तो मैं आपको बता दूं. खाने की दो चीजें ऐसी हैं जो शनिवार के दिन से जुड़ी हुई हैं. नाश्ते में भूंजा और खाने में खिचड़ी के लिए शनिवार का दिन फिक्स है. इसे शनीचरा भोजन भी कहा जाता है.

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वैसे आप चाहें तो इसे किसी भी दिन खा सकते हैं लेकिन पारंपरिक रूप से मान्यता तो इसे शनिवार के दिन ही खाने की है. कहा जाता है कि इसे खाने से शनि ग्रह की शांति होती है. यानी यह शनि ग्रह निवारक आहार है. अब इस बात में कितनी सच्चाई है, नहीं मालूम. लेकिन इतना तय है कि दोनों ही फूड आयटम पेट के लिए एकदम सही माने जाते हैं. न अधिक तेल, न ज्यादा मसाला. न गले और सीने में जलन और न ही गैस की कोई समस्या.

बच्चा खाएं या बुजुर्ग, किसी को भी आसानी से डाइजेस्ट हो जाए. इसे सुपाच्य भोजन की श्रेणी में रखा जाता है. और स्वाद? इसकी तो बातें ही न की जाए तो बेहतर है. जिसने इसे चख लिया समझिए इसका मुरीद हो गया. फिर उसे दूसरा कुछ नहीं सुहाता.

भूंजा भकोसिए, गप्प मारिए

बात पहले भूंजा की. बालू में भूने चने, मकई, चावल आदि के दाने और पसंद के अनुसार नमक, तेल, प्याज, अदरख, लहसुन और कई दूसरी चीजें भी जिसे आप डालने चाहें, डालें और मस्त होकर खाएं. हालांकि इसके लिए खाना से ज्यादा फांकना शब्द इस्तेमाल किया जाता है. लंबी यात्रा भी करनी हो तो सफर को आसान करने वाला आहार है भूंजा. फांकते फांकते कट जाए रस्ते टाइप. वैसे इसे फांकने का मजा तो ग्रुप में आता है. भीषण गप्पबाजी के बीच. गप्प—सड़क्का का अंतहीन दौर हो और उसमें भूंजा शामिल हो तो गपास्टिंग का मजा कई गुना बढ़ जाता है. कभी आजमाकर तो देखिए.

खिचड़ी खाइए, मस्त रहिए

खिचड़ी तो विशुद्ध समाजवादी भोजन है. शासक को भी पसंद और शासित को भी. अमीरों को भी सुहाए और गरीब भी अपनाए. स्टूडेंट के लिए तो इसे संजीवनी ही समझिए. कुकर में चावल, दाल डाला और लगवा दी सिटी दर सिटी. चुटकियों में तैयार, सर्वसुलभ आहार. खिचड़ी के बारे में एक कहावत है. खिचड़ी के चार यार दही, पापड़, घी, अचार. वैसे इन चार यारों से ज्यादा खिचड़ी का सपोर्टिंग कंपोनेंट आलू का भरता है.

कई जगहों पर इसे चोखा, भर्ता या भुर्ता भी कहते हैं. कुछ लोगों को इसके साथ आलू की भूजिया भी अच्छी लगती है. कई लोग इसमें महीन चावल और मूंग की दाल पसंद करते हैं तो कइयों को मोटा चावल और अरहर या चने की दाल पसंद आता है. बहरहाल चावल और दाल की क्वालिटी जैसी हो मिलकर वह खिचड़ी ही कहलाती है.

और हां, जाड़े के दिनों में जब इसमें मटर, गोभी, टमाटर, धनिया पत्ता, और नयका आलू डलता है तो स्वाद स्वर्गिक आनंद देता है. जीभ को दिव्य अनुभूति होती है. और जब इसमें कड़कती देसी घी डलती है तो आप भूख से दोगुना खाने को भी तैयार रहते हैं. अचार और पापड़ तो खाने की इच्छा को बढ़ाने वाला उत्प्रेरक का काम करता है. और दही? दही का काम है चाहे जितना खा लीजिए पचाने की जिम्मेवारी दही की है.

तो फिर प्रत्येक शनिवार को नास्ते में भूंजा और भोजन में खिचड़ी का मूड बना लीजिए. हो सके तो कैलेंडर में शनिवार के दिन को गोल घेर दीजिए, ताकि सनद रहे कि आज शनिच्चर है. शनिच्चर बोले तो शनिवार यानी सटर डे.