संकट में है सोंस (डॉल्फिन), कोई तो बचाए!

आज नेशनल डॉल्फिन डे है. गंगा नदी में जो डॉल्फिन है उसे गांगेय डॉल्फिन कहते हैं. लेकिन इसका लोकप्रिय नाम ‘सोंस’ है. पानी में गुलाटी मारते इसे देखा जा सकता है. पहले आसानी से नजर आ जाता था लेकिन आपकी खुशकिस्मती जो आप इसे देख पाएं.

गंगा में प्रदूषण, जलस्तर में कमी, शिल्ट का जमाव और अवैध शिकार ने सोंस या गांगेय डॉल्फिन को दुर्लभ और विलुप्तप्राय बना दिया ​है.बिहार गांगेय डाल्फिन संकटग्रस्त जीव है जिसके संरक्षण के लिए सरकार प्रयासरत है. भारत में बस कुछ हजार की संख्या में ही गांगेय डॉल्फिन बचे हैं. उनमें से भी आधे सिर्फ बिहार के सुल्तानगंज से कहलगांव के बीच विचरण करते हैं. यह करीब 50 किलोमीटर लंबी दूरी है. गंगा नदी की इस दूरी को 1991 में ‘विक्रमशिला फ्रेशवाटर डॉल्फिन सेंक्चुरी’ घोषित किया गया है. भारत का अपनी तरह का यह इकलौता सेंक्चुरी है. यहां डॉल्फिन का शिकार कानूनन प्रतिबंधित है. यह बिहार के भागलपुर जिले में है.


5 अक्तूबर 2009 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॅरिटी (NGRBA) की बैइक हुई थी. इसी पहली बैठक में डॉल्फिन को संरक्षण प्रदान करने के लिए सरकार ने इसे राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था. डॉल्फिन को ‘गंगा की गाय’ कहकर भी प्रचारित किया जाता है ताकि आम जनता के मन इसके प्रति थोड़ी करूणा और आस्था के भाव जाग्रत हो सकें और वे इसके शिकार का विरोध कर सकें. गंगा को स्वच्छ रखने की मुहिम में अपन योगदान दे सकें ताकि इसकी संख्या में अभिवृद्धि हो सके. लेकिन अफसोस ऐसा हो न सका है. इसे हम दुर्भाग्य ही कहेंगे कि विगत कुछ सालों में गांगेय डॉल्फिन की संख्या में भारी गिरावट आई है.

पहले जहां गंगा में यह थोड़ी प्रतीक्षा के बाद ही देखने को मिल जाता था अब लंबी प्रतीक्षा के बाद भी शायद ही नजर आता है. यह स्थिति दुखद है. गौरतलब है कि डॉल्फिन को थोड़े थोड़े देर के बाद सांस लेने के लिए पानी की सतह पर आना ही पड़ता है. आपको बता दें कि समुद्री डॉल्फिन के अलावा चार जगहों पर ताजा पानी या फ्रेशवाटर डॉल्फिन का वजूद है भारत का गांगेय डॉल्फिन उनमें से एक है. भारत के अलावा फ्रेश वाटर डॉल्फिन चीन के यांग्जी नदी में, दक्षिण अमेरिका के अमेजन नदी में और पाकिस्तान के सिंधु नदी में देखे जा सकते हैं. भारतीय नस्ल का डॉल्फिन बांग्लादेश और नेपाल में भी थोड़ी संख्या में मौजूद हैं. एक वक्त था जबकि गंगा नदी में 10 हजार से भी ज्यादा संख्या में डॉल्फिन हुआ करते थे. गंगा नदी की तमाम वितरि​काओं या सहायक नदी में भी ये पाए जाते थे. अब तो दर्शन दुर्लभ है.

डॉल्फिन पर भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

गंगा में अत्यधिक प्रदूषण ने डॉल्फिन के आवासन के लिए परिस्थिति को अनुकूल नहीं रहने दिया. शिकारी मछुआरों को इसकी मौत में अपना मुनाफा नजर आने लगा. परिणाम, इस निरीह प्राणी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा. शिकारी इसकी चमड़ी और वसा के लिए इसका अवैध शिकार करने लगे. नदियों पर अनेक बांध एवं बाधाएं इसके स्वतंत्र और स्वच्छंद विचरण में बड़ी रूकावट साबित होते हैं. खेतों में कृ​त्रिम रासायनिक खाद एवं कीटनाशक के व्यापक इस्तेमाल एवं शहर के गंदे नालों औद्योगिक अवशिष्ट को बगैर ट्रीटमेंट के नदी में गिराने के कारण पूरा जलीय परितंत्र ही दूषित हो गया. जल किसी भी तरह से जलीय जीवों के जीवित रहने के लायक नहीं रह गया. गांगेय डॉल्फिन का जीवन भी इससे प्रभावित हुआ है.

बिहार सरकार ने इस विलुप्तप्राय जीव के संरक्षण के लिए टास्क फोर्स गठित करने का निर्णय लिया था. इस निर्णय के क्या परिणाम हुए और डॉल्फिन संरक्षण पर इसका क्या असर पड़ा, इसकी समीक्षा होनी चाहिए. बिहार सरकार ने Ganges dolphin research centre की भी स्थापना की है. यह देश में अपनी तरह का अकेला सेंंटर है.

सेंटर की स्थापना अच्छी बात है लेकिन तब इस बात की भी समीक्षा होनी चाहिए कि ऐसे सेंटर कहीं महज हाथी का दिखावटी दांत तो साबित नहीं हो रहा है. अगर ऐसा है तो इस सेंटर का कोई औचित्य नहीं है और अगर इसके साकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं तो इसे खूब प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है.