आपने अभी तक खाया क्या ‘खिच्चा’ और ‘टटका’ भुट्टा !!

मानसून में हर किसी का कुछ अलग खाने का मूड करता है. बारिश होने पर लोग पकौड़े खाना पसंद करते हैं. आखिर यह टेस्टी भी तो होता ही है. लेकिन डॉक्टर ने अगर आपको ऑयली आइटम अवॉयड करने को कहा है तो आप क्या करेंगे? आखिर आप हैल्थ कंशस भी तो हैं. अब ऐसे में क्या करेंगे? कैसे लेंगे रिमझिम फुहार का मजा? डोंट वरी. बेटर अल्टरनेट है न!studio11

भुट्टा के बारे में आपका क्या खयाल है? अजी, भुट्टा बोले तो आग की धीमी आंच पर मकई को सेंक कर पकाया गया अपना शुद्ध सात्विक खालिस देसी व्यंजन. वही जिसे देखते ही आप ‘जी ललचाए…रहा न जाए,’ गुनगुनाने लगें. जिसकी खुशबू मात्र से जीभ ‘लपलपाइंग’ मोड में एक्टिवेट हो जाए और मुंह में पानी रूकने का नाम ले. और जिसे खाते ही आप बोल उठें, इट्स रियली अमेजिंग यार, मजा आ गया. जी हां, यह भुट्टा कुछ चीज ही ऐसी है. तो फिर कहिए हेल्थ को न दे झटका, भुट्टा खाइये टटका. हुजूर बिहार में ‘टटका’ ताजा और फ्रेश चीजों को बोलते हैं.

बिहार में गांवों में कई इलाकों में मकई के फल को ‘बाएल’ और भुट्टा को ‘ओरहा’ भी बोला जाता है. कॉन्वेंट कल्चरर में पले-बढ़े लोग संभव है इसे ‘कॉर्न’ कहते हों लेकिन ‘भुट्टा’ नाम तो ‘यूनिवर्सली बूझनेबल’ है. सभी जगहों और सभी के लिए यह नाम कॉमन है. मानसून के दस्तक देने के पहले ही बाजार में मकई के फसल का आगमन हो जाता है. और इसके साथ ही ‘भुट्टे’ की बिक्री भी शुरू हो जाती है. अभी थोड़ी महंगाई है फिर भी 10 रूपये में एक तो आ ही जाता है. और अगर भुट्टा थोड़ा ‘मस्त’ यानी ‘किंग साइज’ का रहा तो भी 15 रूपये से ज्यादा कीमत अभी तो कहीं नहीं है.

बरसात के मौसम में भुट्टा खाने का अपना अलग ही मजा है. लकड़ी के कोयले पर धीमी आंच पर सेंक कर पकाया गया भुट्टा खाने के लिए किसी क्रॉकरी या कटलरी की जरूरत नहीं पड़ती है. मकई के पत्तेदार छिलके के दोने में भुट्टे को रखा और कहीं भी शुरू हो गए. नो झंझट. इसका आनंद लेने के लिए कोई विशेष सप्लिमेंटरी फूड की भी जरूरत नहीं होती. चुटकी भर नमक में चार बूंदें नींबू की निचोड़ी और एक हरी मिर्च ली. और बस जितनी मर्जी हो, खाते जाइए भुट्टे. तब तक, जब तक डकार न आ जाए. पेट तो भरेगा ही मन ‘गदगद’ और मूड ‘टनाटन’ हो जाने की गारंटी है.

कई जगहों पर मकई को उबाल कर नींबू मसालों के साथ खाने का भी चलन है. इसका एक अलग टेस्ट है. अलग मजा है. लेकिन असली मजा तो आग पर भूने/सिंके/पकाये भुट्टे के रसास्वादन में ही है. आग पर रखा नहीं कि पट…पट.. की आवाज शुरू. यह सिग्नल है कि बस चंद मिनटों में आपका भुट्टा आपको तृप्त करने आपकी सेवा में हाजिर होने वाला है.

भुट्टों के रेग्युलर कद्रदान दो शब्दों का इस्तेमाल अवश्य करते हैं. संभव है आप भी परिचित हों. न भी हों तो मैं इन दो शब्दों से आपका तार्रूफ करा देता हूं. पहला शब्द् है ‘खिच्चा’ या ‘खिचगर’ और दूसरा शब्द है ‘जुआया’ या ‘जुआएल.’ अब आप यह कहेंगे कि इसकी मीनिंग बता दीजिए. एक्चुिअली इन्हीं दो शब्दों से ‘भुट्टेबाज’ क्वालिटी परखते हैं भुट्टे की. ‘खिच्चा’ या ‘खिचगर’ का मतलब है दूध से भरा नर्म या सॉफ्ट दानों वाला भुट्टा. मिठास से परिपूर्ण. जिसे खाते ही आपका दिल वाह…वाह कर उठे. ज्यादातर लोग ‘खिच्चा’ या ‘खिचगर’ भुट्टे की ही फरमाइश करते हैं.

आइए अब बात करते हैं ‘जुआया’ या ‘जुआएल’ भुट्टे की. यह ‘खिच्चा’ या ‘खिचगर’ भुट्टे का जस्ट अपोजिट है. ऐसे भुट्टे के दाने बेहद सख्त होते हैं. ठीक आपकी बज्रदंती की तरह कड़ा. मिठास का तो आभास भी नहीं. यही वह भुट्टा होता है जिसका दो दाना मुंह में डालते ही आप दुकानदार से कहते हैं, ‘कोन्ची दे दिये हो जी? भुटबा कइसन दनी खाए में लग रहा है. एकदम्मे बज्जर जइसन है!’ (क्या दे दिए हो जी? भुट्टा खाने में कुछ अजीब-सा लग रहा है. बिल्कुुल पत्थर जैसा कठोर है!) अगर किसी के दांत एक्ट्रा स्ट्रांग भी हों तो इसे खाकर दिल वाह..वाह तो हरगिज नहीं करता, अलबत्ता बाप..बाप जरूर कर उठता है. तो इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखें.

आइए अब जरा गांव की ओर रूख करते हैं और अतीत की बात करते हैं. पहले गांवों में लोग खरीदकर शायद ही भुट्टा खाते थे. खाने की इच्छा हुई तो लोग या तो अपने खेतों से लाकर खुद सेंक कर खाते थे या फिर दूसरे के खेतों से चुराकर. जी हां, सही पढ़ा आपने ‘चुराकर’. दरअसल गांवों में हरा चना (झंगरी), गन्ना (ईख, उक्खी या केतारी) के साथ मक्का या मकई (बाएल) को ज्यादातर चुराकर खाने का ही चलन था. लेकिन आपको बता दें कि ज्यादातर मामलों में चोरी जैसा भाव होता नहीं था.

पहले लोग इस ‘चोरी’ को उदारतापूर्वक सह लेते थे. गांववासी के आपसी रिश्तेे तब निहायत ही अनौपचारिक हुआ करते थे. महंगाई का कोई प्रेशर भी नहीं था. लेकिन अब तो रिश्तों में फॉर्मिलिटी की एंट्री हो चुकी है. आपसी रिश्तों को परंपरागत तानाबाना बिखर चुका है. महंगाई ने रिश्तों को भी तार-तार कर दिया है. इसलिए भुट्टा खाने का अंदाज भी बदल चुका है. गांव में जिनके खेतों में मकई नहीं होते, वे भी अब खरीदकर ही खाते हैं. मांगकर भी काम चल जाता है.

भुट्टा टेस्टी तो होता है आपको बता दें कि यह सेहत के लिए भी सही माना जाता है. एक तो फाइबरयुक्त होता है. इसे खाने से डाइजेशन सही रहता है. इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. भुट्टा खाने से एनिमिया से बचा जा सकता है. इसलिए बेटियों, माताओं और बहनों के साथ-साथ सखियां, सालियां, सरहजें एवं भौजाइयां भी फ्री फील कर इसका स्वामद लें. यह एनर्जी बूस्ट अप करने के साथ बॉडी के बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है. पेंटोथेनिक एसिड का इसे अच्छा स्रोत माना जाता है जो डाइबिटिज और हाइपरटेंशन के लिए सही माना जाता है

यह कनेक्टिव टिश्यू को मजबूत बनाने में मददगार साबित होता है. साथ ही यह हार्ट, स्किन, बॉन और हेयर के हैल्थ के लिए भी सही है. इसमें एंटी अल्जाइमर और एंटी कैंसर पॉपर्टी भी उपस्थिति माना जाता है. कहने का मतलब यह है कि कॉर्न, मेज, मक्का, मकई, भुट्टा चाहे आप इसे जो कहें न सिर्फ टेस्टी है बल्कि मेडिशनल प्रॉपर्टी से भी परिपूर्ण है. तो फिर रिमझिम फुहार के बीच आप जमकर लीजिए इसका मजा. और हां, मौसम विभाग की भविष्यवाणी अगर फेल हो रही हो वर्षा की बूंदों के दर्शन न हो पा रहे हों तो भी आप इसका भरपूर मजा ले सकते हैं. इसके टेस्ट में आपको कोई कमी महसूस नहीं होगी. देन एंज्वॉय.

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