DBC में है दम, रोज खाएं हम !

पटना (आदित्य नारायण): हर व्यक्ति का अपना अनोखा व अलग टेस्ट होता है. कोई अपने इस टेस्ट से कंप्रोमाइज करना हरगिज पसंद नहीं करता. किसी को पिज्जा-बर्गर पसंद है तो कोई समोसा-कटलेट खाना पसंद करते हैं. कोई पनीर का दीवाना होता है, तो कोई चिकन-मटन के बगैर नहीं रह सकता. पर हम बिहारी तो कुछ हटकर हैं.

आॅलवेज डिफरेंट. हमको पिज़्ज़ा, बर्गर उतना नहीं भाता है जितना कि लिट्टी-चोखा. इसे हम खूब आनंद के साथ खाते हैं.  मिल्क शेक से अच्छी टी-प्वांइट की कुल्हड़ वाली चाय लगती है. आज भी हम वाडीलाल के आइसक्रीम से ज्यादा कुल्फी-फालूदा पसंद करते हैं. केक और पेस्ट्री से ज्यादा बूंदिया और जलेबी पर दिल फिदा होता है.

तभी तो बड़े-बड़े रेस्तरां के बने पास्ता—पिज्जा, हॉट डॉग और डूडल्स हमारे टेस्ट बड्स को भले तृप्त नहीं कर पाएं लेकिन डीबीसी खाकर हम लहालोट हो जाते हैं. डीबीसी के बारे में तो आपको पता ही होगा? अरे वही दाल, भात और चोखा! हम बिहारियों का आॅल टाइम फेवरिट डिश.

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लंबे-लंबे खिले हुए चावल के दाने. अरबा या उसना जो पसंद हो बनाएं और खाएं. लहसुन-जीरा और मिर्च की छौंक लगी हुई दाल. इसमें दो चम्मच देसी घी. इस अद्भुत कॉम्बिनेशन को पूरा करने के लिए आलू का भूना आलू का चोखा और साथ में नमक लगी भूनी हुई हरी मिर्च. डीबीसी खाते ही नाचे मन मोरा मगन तिक-दा-धीगी-धीगी होने लगता है. मन थै..थै हो जाता है.

आपने देश-विदेश के किसी भी फाइव स्टार में खाना क्यों न खाया हो, पर शायद ही दाल-भात, चोखा वाली संतुष्टि आपको कहीं मिल पाई होगी. पूर्वी उत्तर प्रदेश और पूरे बिहार के लोग कहीं भी चले जाएं, उनका लंच दाल-भात—चोखा के बिना अधूरा ही रहता है. दिल्ली और बैंगलोर में रहने वाले दोस्तों के लिए तो यह अगर लाइफ सेवर है तो मनी सेवर भी. प्रेशर कुकर के तीन सेपरेटर में तीनों व्यंजन तीन सीटी में बनकर तैयार.

कंप्लीट फूड. इसकी खासियत यह है कि पाककला में अकुशल व्यक्ति भी इसे कुशनता के साथ बना सकता है. इजिली. इसलिए अदर स्टेट में रहकर पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट्स इसकी टेस्ट के मुरीद हो जाते हैं. कुछ तो होते हैं और कुछ को होना पड़ता है. वह इसलिए कि जब तक पापा के भेजे पैसे से पॉकेट गरम है तो रेस्तरां के चक्कर लगाते हैं लेकिन पॉकेट जैसे ही थोड़ी ठंडी होने लगती है डीबीसी संकटमोचक की भूमिका में आ जाता है.

इसी तरह जॉब कर रहे बैचलर्स के साथ भी ऐसी स्थिति हर माह आती है. मंथ का शुक्ल पक्ष रेस्तरां में मटन और चिकन और कृष्ण पक्ष में बस डीबीसी ही एक सहारा बच जाता है. किसी बैचलर के कमरे पर अगर यार—दोस्तों की महफिल जमती है या दोस्त—यार अचानक आ धमकते हैं तो डीबीसी इज्जत का रखवाला बनकर सामने आता है.

सभी तृप्त और पॉकेट पर ज्यादा संकट भी नहीं. पॉकेट फ्रेंडली होने के कारण मंथ के उत्तरार्द्ध में डीबीसी ऐसे लोगों के किचन पर अकेला राज करता है. इतना ही नहीं, कहीं भी नॉन रेसीडेंट बिहारी रेस्टोरेंट में DBC एक आइटम न हो, सवाल ही नहीं उठता. इस महंगाई के जमाने में जब जेब पर जब अचानक उदासी छाने लगती है तो DBC ही संकट में हमें हौसला देती है.

दाल—भात—चोखा को दिल्ली–पुणे—बैंगलुरु वाली जेनेरेशन ने इसे थोड़ा छोटा कर DBC बना दिया है. यूथ के लिए किसी भी शब्द को आकर्षक बनाकर ट्रेंड में लाना इज आॅल अबाउट स्वैग ब्रो.


पर हमारे लिए तो हमारा दाल-भात—चोखा वह भोजन है जिसे रोज खाने के बाद भी हम बोर नहीं होते हैं. अब ये DBC ( दाल-भात—चोखा) हो जाए या BBC ( बुद्धिवर्द्धक चूर्ण), क्या फर्क पड़ता है! आज भी बिहार के ज्यादातर घरों में दाल-भात और चोखा प्राय: बनता है. कुछ लोगों के घर में ये लंच में परोसा जाता है तो किसी के घर डिनर में. पर दाल-भात—चोखा खाते सब हैं, वो भी उंगलिया चाट-चाट कर.

ये हमारे लिए ठीक वैसा ही है, जैसे बंगालियों के लिए मछली-भात. दक्षिण भारतीय के लिए इडली—डोसा. इतने सिंपल से डिश को पसंद किए जाने की बहुत सारी वजह है. पहला, एकदम सादा और झटपट तैयार हो जाने वाला. कोई तेल—मसाला नहीं फिर भी ‘वेरी..वेरी, टेस्टी..टेस्टी’ के पैमाने पर एकदम खरा. दूसरी बात यह कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह सही है.

चबाने में आसान और पचने में आसान. पचने में आसान तो गैस की समस्या से मुक्त. गैस तमाम बीमारियों की जड़ इसलिए कई बीमारियों से भी मुक्त. इसमें प्रोटीन और फाइबर है इसलिए यह पूरी तरह से एक हेल्दी डाइट है.


अब DBC पर इतनी बात हो ही गई है तो आपको नहीं लगता कि झटपट इसका जायका ले ही लेना चाहिए? जल्दी कीजिए. अगर घर से बाहर हैं तो किसी बिहारी रेस्टोरेंट का पता लगाकर पहुंच जाएं और अगर घर पर हैं तो फिर क्या कहना! ‘मौजा’ ही ‘मौजा’ है ! क्योंकि घर पर बने गरम-गरम दाल-भात चोखा खाने का आनंद तो अवर्णनीय है. परमानंद की अनुभूति होगी. जरा खाकर तो देखिए!