‘सड़क पर भी चलती हूं तो लोग पीछे से गालियां देते हैं’

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पटना: रेशमा प्रसाद ट्रांसजेंडर हैं. ‘दोस्ताना सफर’ संगठन के जरिए ट्रांसजेंडर समुदाय की बेहतरी के लिए काम करती हैं. इन्हीं के प्रयास से पहली बार पिछले साल बिहार सरकार ने पटना में किन्नर महोत्सव का आयोजन किया था. इस बार 23 जून को पटना के रविंद्र भवन में द्वितीय किन्नर महोत्सव का आयोजन होने जा रहा है. महोत्सव की पूर्व संध्या पर लाइव सिटीज की ओर से विमलेन्दु कुमार सिंह की रेशमा प्रसाद के साथ बातचीत हुई. प्रस्तुत है बातचीत का संपादित अंश —

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रेशमा जी, प्रथम किन्नर महोत्सव के अवसर पर पिछले साल सरकार के मंत्री ने किन्नर समुदाय के हित में सार्थक कदम उठाने का आश्वासन दिया था. एक अन्य आश्वासन यह भी था कि किन्नर महोत्सव का आयोजन हर साल होगा. इस आश्वासन को तो अमलीजामा पहनाया जा रहा है. अन्य आश्वासनों का क्या हुआ?

समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा जी ने कई वायदे किए थे. मंच से ही नहीं बल्कि उन्होंने विधान सभा में भी कई वायदे किए थे. लेकिन वह अभी तक एक कदम भी अपने वायदे पर आगे नहीं चली हैं. युवा एवं संस्कृति मंत्री माननीय शिवचंद्र राम ने जी ने जो वायदे किए थे, उसे उन्होंने निभाया है. उन्होंने बहुत सारी चीजों से हमें जोड़ा हैं. हमें यानी किन्नर समुदाय को जोड़ा है. कल ही कला और संस्कृति विभाग का जो कैंलेंडर जारी किया गया है उसमें भी हमें शामिल किया गया है.

बिहार सरकार का कला और संस्कृति विभाग हर साल किन्नर महोत्सव का आयोजन करेगी. इसके लिए अधिसूचना जारी की गई है कि इसके लिए कौन—सी एजेन्सी काम करेगी. कहने का मतलब यह है कि कला—संस्कृति एवं युवा विभाग तो अपना काम कर रही है लेकिन किन्नरों को समाज कल्याण विभाग एवं अन्य विभागों में कई मुश्किलें हैं. जैसे मंत्री जी स्वास्थ्य विभाग में किन्नरों को मौका देने की बात कही थी, शिक्षा विभाग में मौका देने की बात कही थी, लेकिन कहीं कुछ भी नहीं हुआ है ट्रांसजेंडर्स के लिए.

सरकार से ट्रांसजेंडर्स के हित में आपकी अपेक्षाएं क्या हैं?

ट्रांसजेंडर्स के लिए हमारी अपेक्षा है शिक्षा और रोजगार. अगर हमें छोटे से रोजगार जैसे कि आंगनवाड़ी से भी जोड़ दिया जाता है तो हमारे समुदाय के लिए बड़ी बात होगी. अगर हमारी आबादी के दो प्रतिशत लोगों को भी रोजगार से जोड़ दिया जाता है तो हमारे समुदाय के लिए बहुत बड़ी बात होगी. इससे हमारी जिंदगी ढर्रे पर लौट आएगी. हमें दर—दर की भीख नहीं मांगनी पड़ेगी.

बिहार में किन्नरों की मुख्य समस्या आप क्या समझती हैं?

मुख्य समस्या बेरोजबारी ही है. हमें रोजगार की जरूरत है. क्योंकि हममें भी जो प्रबुद्ध और संपन्न वर्ग है वह तो समाज में अलग जिंदगी जी लेता है लेकिन मुख्य परेशानी गरीब, दलित या अत्यंत पिछड़े समुदाय की हैं, गरीब हैं, उनका कोई सोशल एक्सेपटेंश नहीं रहता है. हमारे अस्तित्व को अपने बीच लोग स्वीकर करने तक में हिचकते हैं.

क्या ट्रांसजेंडर के प्रति सामाजिक सोच में कुछ बदलाव आया है?

कुछ बदलाव नहीं आया है. कहीं भी बदलाव नहीं आया है. दूसरों की छोड़िए मैं खुद अपनी बात कह रही हूं. सड़क पर भी चलती हूं तो लोग पीछे से गालियां देते हैं. अब मैं क्या कह सकती हूं. पता नहीं हमलोगों ने लोगों का क्या बिगाड़ा है! समाज में बदलाव तो तब होगा जब लोग अपने बीच में हमें जगह देंगे. रोजगार के मौके मिलेंगे तो समाज के बीच हमारी समाजिक अंत:क्रिया बढ़ेगी. हमारी स्वीकार्यता भी बढ़ेगी. लेकिन इस दिशा में कुछ हो तब तो!

मंत्रियों-अधिकारियों से मिलकर उनसे जब कुछ कहती हैं तो उनसे क्या आश्वासन मिलता है?

मैं म़़ंत्रियों—अधिकारियों से कहती रहती हूं कि ट्रांसजेंडर को जनशिक्षा निदेशालय से जोड़ें. कम से कम एक किन्नर शिक्षा सेवी भी जिला में हो तो स्थिति में कुछ बदलाव आए. शिक्षा से जुड़ने पर पूरे समुदाय की सोच बदलती और सोच से हमारी स्थिति भी बदलती. लोग यह समझ पाते कि हमारे पास भी मौका है. जब आप हमें किसी चीज से जोडिएगा जो उम्मीद जगती है. आसरा बंधता है. मैं तो इसी उम्मीद में भागदौड़ करती रहती हूं. आश्वासन तो मिलता है लेकिन काश जो कुछ सार्थक हो पाता! सिर्फ आश्वासन से हमारा क्या कल्याण होगा?

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