‘बोल बम’ के नारों से गूंजने लगा है देवघर, जा रहे हैं तो पहले यह पढ़ लें.

हम भारतीय बहुत ही धार्मिक होते हैं. खासकर हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों के जीवन में देवी-देवता का अत्यंत महत्व है. ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म में 330 मिलियन भगवान हैं. भगवान महादेव को तो देवाधिदेव कहा गया है. यानी सभी देवों के देव हैं हमारे ‘महादेव.’ आपको बता दें कि यह बस आस्था की बात है. ऐसी कोई कैटेगरी या क्लासिफिकेशन नहीं है देवी—देवताओं की.

ऐसा नहीं है कि दूसरे किसी भगवान की पूजा करने से आप कम पुण्य के भागी होंगे या अन्य देवों की महादेव से महत्व कम है. सभी देवी-देवता एक समान हैं. आप जिन्हें भी अराध्य मानते हों, उनकी पूजा पूरी आस्था और श्रद्धा भाव से करें. हां यह मान्यता जरूर है कि महादेव ऐसे ईश्वर हैं, जिनकी पूजा सभी देव भी करते है. इसलिए, भारत में हर साल जुलाई-अगस्त का महीना ‘सावन’ के महीने के रूप में जाना जाता है. इस माह में लोग भगवान महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं.

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झारखंड का एक प्रमुख शहर है देवघर. इसे वैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है. यहां रावणेश्वर नाथ महादेव का भव्य प्राचीन मंदिर है. मान्यता है कि भारत के द्वादश यानी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक यह भी है. जाहिर है यह जन आस्था के प्रमुख केंद्रों में एक है.

हमारे मन में विद्यमान दिव्यता ही महादेव है :

बैद्यनाथ धाम मंदिर के बारे में बड़े-बुजुर्गों और दोस्तों से बहुत कुछ सुन रखा था. इसलिए वहां जाने की इच्छा बहुत दिनों से थी. पर जाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था. लेकिन वो कहते है न कि जब महादेव चाहेंगे या जब महादेव का बुलावा आएगा तभी आप वहां जाएंगे. इस बार महादेव ने मन बना लिया था, हमें बुलाने का. दरअसल महादेव को लेकर मैं कुछ ज्यादा ही सेंसेटिव हूं. मुझे ज्यादा समझ तो नहीं है, पर जितना पढ़ा-समझा है उन्हें, वे मुझे आम इंसान की तरह ही लगते हैं. आप कहेंगे ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए क्योंकि महादेव कोई और नहीं, बल्कि हमारे मन में विद्यमान दिव्यता हैं. मैं उन्हें अपने रूप में देखता हूं. आकाश की ओर निहारते हुए. आंखें बंद कर खुद से बात करते हुए. लिखते हुए. हंसते-गाते हुए. भले ही लोग उन्हें ईश्वर, देवो के देव महादेव कहें, पर मेरे लिए मेरा महादेव, मैं खुद ही हूं. फिर भी जिस भगवान से इतना प्रभावित हूं, उनके बारे में और जानने की जिज्ञासावश समय-समय पर उनके धाम पर घूम आता हूं.

सिमुलतला के पहाड़ों पर धूंध का दिखना हिल स्टेशन की याद दिलाता है

इस बार देवघर की बारी थी. सो बिना किसी प्लान के सोमवार के दिन हमारी देवघर की यात्रा पटना जंक्शन से सुबह 5:45 में जन शताब्दी एक्सप्रेस के साथ शुरू हुई. हमें जसीडीह तक सफर करना था. पटना साहिब के आगे यह मेरे जीवन की यह पहली यात्रा थी. इस यात्रा के दौरान मैंने उत्तर बिहार के कई जगहों को देखा. खासकर झाझा के बाद ट्रेन से ही दिखने वाले पहाड़, जो सिमुलतला पहुंचकर और भी खूबसूरत हो जाते हैं.

वहां मौजूद चारो तरफ हरे-भरे पहाड़ किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं. प्राकृतिक दृश्यों को देख ऐसी अनुभुति होती है मानो वह आपको अपनी तरफ बुला रहे हों. गर्मियों भी उन पहाड़ों पर धूंध का दिखना गंगटोक और शिलांग जैसे हिल स्टेशनों की याद दिलाता है. उन रमणीय नजारों को देखते हुए हम कब जसीडीह स्टेशन पहुंच गए, पता भी नहीं चला!

मिट्टी की सौंधी खुशबू वाली कुल्हड़ चाय

जसीडीह में सड़कों पर फैले कचरों को इग्नोर कर दें तो यह सुंदर शहर है. साफ—सफाई कम है लेकिन प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोहता है. जसीडीह शहर ने हमारा स्वागत खुद में मिट्टी की सौंधी खुशबू को समटे कुल्हड़ चाय के साथ किया. चाय का स्पर्श भले जीभ से हो रहा हो लेकिन स्वाद दिल की गहराई तक उतर गया. मेरे पास समय कम था और अपनी इस देवघर यात्रा को एक दिन में ही खत्म कर पटना वापस भी लौटना था. इसलिए इस शानदार कुल्हड़ चाय के लिए जसीडीह को धन्यवाद देते हुए विदा हुआ कि अगली बार पर्याप्त समय लेकर यहां आउंगा. फिर ढ़ेर सारी बातें होंगी.

देवघर का ड्रेसकोड है केसरिया रंग का कपड़ा. 

अगले ही कुछ मिनटों में हम देवघर शहर में थे. जसीडीह से देवघर की दूरी मात्र 7 किलोमीटर है. देवघर शहर का आकार हर साल आने वाले भक्तों की तुलना में बहुत छोटा है. देवघर के टावर चौक से आपको पैदल 700 से 800 मीटर चलना होगा. आप मंदिर के पास पहुंच जाएंगे. हमने भी यही रास्ता अपनाया. जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए भक्तों की भीड़ बढ़ती चली गई. थोड़ी ही देर में मंदिर के द्वार के पास खड़े थे. हालांकि पूजा-पाठ और कर्म—कांड को लेकर ज्यादा समझ नहीं है. लोगों ने बताया कि दर्शन से पूर्व हमें शिवगंगा में स्नान कर लेना चाहिए. फिर फूल-माला, बेलपत्र, धतूरा और मंदिर प्रांगण में स्थित कुंए से ही जल लेकर लाइन में लगना चाहिए तभी दर्शन कर पाएंगे. हमने ऐसा ही किया. फूल-माला, बेलपत्र, धतूरा और जल के साथ दर्शन के लिए तैयार हो गए.

दो पहलवानों के बीच घंटों का संघर्ष

जिस कतार में मैं था वह करीब 6 से 8 किलोमीटर लंबी थी. मेरे आगे और पीछे दो पहलवान टाइप ‘इंसान’ खड़े थे. एक हाथ में ढ़ेर सारे फूल, बेलपत्र, धतूरा, भांग और दूसरे में बड़ी बालटी में दूध और जुबान पर बस बोल—बम का नारा. उन दोनों के बीच खड़ा होकर कई बार ऐसा लगा कि महादेव सारी कृपा तो इन पर ही बरसाएंगे. क्योंकि न मेरे पास उनके जितने फूल-बेलपत्र थे और न बड़ी बालटी में दूध. बोल—बम का नारा भी नहीं लगा रहा था. बल्कि मेरी नजर तो आस-पास की दुकानों पर बिक रहे पेड़े पर ज्यादी टिकी हुई थी. उन दो बॉडी बिल्डरों के बीच लाइन में खड़ा होकर ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो आज वे मेरी 206 हड्डियों का चूर्ण बनाकर अपनी महादेव भक्ति साबित करके रहेंगे.

उस लाइन में आप न बाएं घूम सकते थे और न ही दाएं. मूवमेंट के नाम पर आपको बस आगे धक्का दिया जाता था जिससे आपके गिरने की आशंका दो सौ प्रतिशत तक थी. अगर आप एक्सरसाइज न करने से परेशान हैं तो वह लाइन आपके लिए परफेक्ट थी. स्वत: ही आप शारीरिक कसरत कर लेंगे. ढ़ेर सारा पसीना भी लगातार आता रहता है. बहरहाल धक्के खा—खाकर मंदिर के प्रवेश द्वारा के करीब पहुंच ही गए.

महादेव के समीप जाना, ही है उन्हें पाना

कठिन परिश्रम और सब्र के बाद 5-6 घंटों में दर्शन भी हो गए. महादेव के तो दर्शन नहीं हुए, हां उनके ऊपर चढ़ाए गए बेलपत्र, दूध, धतूरा और अन्य पूजन सामग्रियों के दर्शन बखूबी हुए. और इन्हीं सामग्रियों के दर्शन के लिए भक्त हजारों किलोमीटर चलकर, घंटो लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं. शायद आस्था यही है. इस दौरान व्यवस्था में कुछ कमियां भी दिखीं. लेकिन कोई बात नहीं. भगवान के दरबार में सबकुछ भगवान के ही भरोसे. देवों के देव महादेव का दर्शन यहां आसान नहीं है. गिरते—पड़ते, भागते—भगाते 5 सेकेंड का सान्निध्य ही यहां असली पूजा है. वह पांच सेकेंड आपके जीवन की अमूल्य घरोहर बन आपकी आत्मा से आत्मसात हो जाएगा.

बम-बम रहा बोल—बम (देवघर) की यात्रा

भले ही मेरी यात्रा कई सवालों के जवाब न मिलने की वजह से रहस्यमयी और अधूरी रह गई हो पर उस पूरे दिन का अनुभव जीवन के हिस्से के साथ जुड़ गया है और इसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है. देवघर से वापस आते हुए एक अजीब तरह की बेचैनी अंदर से थी. शायद दर्शन न मिल पाने की वजह से. लेकिन इस ख्याल के साथ खुद को समझा लिया कि महादेव के समीप जाना ही उन्हें पाना है. महादेव होने की कामना करना ही उनकी सच्ची पूजा है. यह भक्ति ही है कि देवघर छोड़ने के बाद भी कानों में बोल-बम का संगीतमय स्वर अब तक गूंज रहा है. मेरे लिए यह यात्रा सभी रूपों में बोल बम ही था.

अगर आप भी बोल-बम की यात्रा करने की सोच रहे हैं, तो मेरे कुछ सुझाव है जिससे आपको मदद मिलेगी –

• जसीडीह से देवघर जाने के लिए टेम्पू और ट्रेन दोनों के विकल्प हैं.
• भक्तों के लिए मंदिर प्रशासन ने पास (टिकट) का भी विकल्प रखा है, जिसे 250 रुपये मूल्य चुका कर खरीदा जा सकता है.
• प्रसाद में मिलने वाले पेड़े की बहुत सारी दुकानें हैं. जिस वजह से हर दुकान की क्वालिटी और रेट भी अगल होता है. इसलिए 5-6 दुकानों पर मोल-भाव करने का बाद ही पेड़ा खरीदें.
• सुबह-सुबह कुल्हड़ चाय के साथ सखुआ के हरे पत्तों में सर्व की गई पूरी-सब्जी जरूर खाएं.
• दोपहर के लंच में भी आपको कई विकल्प मिल जाएंगे. हर शहर की तरह देवघर का मारवाड़ी बासा अपने सात्विक एवं लजीज खाने के लिए प्रसिद्ध है.

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