नवदंपतियों की सुख-समृद्धि की कामना का पर्व है कोजगरा

भारत जैसे विशाल में विविधता हर क्षेत्र में दिखाई देती है. भाषा, वेशभूषा, गीत संगीत, खानपान से लेकर उत्सव व त्योहार तक में. ऐसे कई पर्व, त्योहार और उत्सव हैं जिन्हें हम लोकपर्व की श्रेणी में रखते हैं. यह किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित होता है. इसकी व्यापकता बहुत सीमित होती है. कोजगरा बिहार का ऐसा ही एक लोकपर्व है. अश्विन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला लोकपर्व कोजगरा मिथिलांचल, कोशी क्षेत्र एवं नेपाल के तराई इलाकों में पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.

इस पर्व में मधुर (मिथिला में मिठाई को मधुर कहते हैं) और मखान का विशेष महत्व होता है. नवविवाहितों के घर पहली बार यह पूजा विशेष धूमधाम से मनाई जाती है. नवविवाहितों का जीवन सुखमय हो. मां लक्ष्मी की कृपा उनपर बनी रहे. उनका घर धन धान्य एवं सुख समृद्धि से परिपूर्ण रहे, इसी कामना के साथ कोजगरा का त्योहार मनाया जाता है. कई जगहों पर सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है. इस बार यह त्योहार 5 अक्टूबर दिन गुरूवार को आयोजित होने जा रहा है. इस त्योहार की तैयारियां शुरू हो गई होंगी. जरूरी खरीदारी भी की जा रही होगी. आइए कोजगरा के बारे में कुछ और जानते हैं.

कोजगरा नवविवाहिताओं के रागात्मक जीवन के शुभारंभ का त्योहार है. इसे हर साल आश्विन पूर्णिमा की रात मनाया जाता है. यानी दशहरा या विजयादशमी के पांचवें दिन. इसमें लक्ष्मी की पूजा की जाती है. बिहार कोशी, तराई सहित मिथिला में इस पर्व का खास महत्व है. इसे क्षेत्र के लोग जो दूसरी जगहों पर रहते हैं, और उनके घरों में किसी की उस साल शादी हुई होती है उनके घरों में यह त्योहार अवश्य मनाया जाता है. शादी के पहले साल इस तिथि का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं. जैसी की परंपरा चली आ रही है, नवविवाहिता के घर से लोग अपने दामाद जिसे मिथिला में जमाय या दूल्हा जी कहा जाता है, के घर डाला, पेटारी और भार भेजते हैं. डाला, पेटारी या भार स्थानीय शब्द हैं.

यह बांस की करची या खपच्चियों का बना होता है. आप बस यह समझ लें कि शगुन के तौर पर जो कुछ सामान भेजा जाता है उसे ही हम डाला, पेटारी या भार के नाम से जानते हैं. इन सामानों में वर सहित पूरे घर वालों के लिए कपड़े भेजे जाते हैं. वर के लिए जनेऊ एवं अन्य शुभ प्रतीक भेजे जाते हैं. संभव हुआ या सक्षम हुए तो कोई आभूषण वगैरह भी भेजा जाता है. इसके अलावा पेटारी में मखान, मिठाई, फल, ड्राय फ्रूट्स वगैरह भी रखे जाते हैं. परंपरागत रूप से जजमानी व्यवस्था के तहत गांव के कहार से वर के गांव ले जाते हैं. वर का कोई साला यानी वधू का कोई भाई है तो वही सामान ले जाने कि जिम्मेवारी को निभाता है. अन्य लोग भी साथ जाते हैं.


कोजगरा की शाम आंगन में वर को नए कपड़े पहना, आँखों में काजल लगा, सर पर पाग पहना और पैरों को अलता से रँगकर आसन पर बिठाया जाता है. महिलाएं मंगल गीत गाती हैं. वर को चुमाया जाता है. महालक्ष्मी की पूजा होती है. उपस्थित लोगों के बीच प्रसाद के साथ मिठाई और मखान का वितरण किया जाता है. वर बड़ों के पैर छूकर आशीष प्राप्त करता है. वधू पक्ष से आए लोग वर को कुछ नकदी या सामान, जो प्राय: आभूषण होता है, आशीर्वाद के तौर पर देते हैं.


मिथिलांचल में कोजगरा के अवसर पर महालक्ष्मी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है. रात में जागकर महालक्ष्मी की पूजा करने का विधान है. इस अवसर पर वर अपने साला के साथ चौपड़, कौड़ी या ताश खेलता है. यह भी परंपरा है. कई बार इसे जुए का भी रूप दे दिया जाता है. इस मौके पर वर और वधू पक्ष के लोगों के बीच जमकर हंसी मजाक, हास-परिहास का दौर चलता है. खूब ठहाके लगते हैं.

तस्वीरें वेब से

ऐसी मान्यता है कि कोजगरा पूजन से नवदंपति को महालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस दिन व्रत का भी विधान है. व्रत रखने वालों को संध्या के समय गणपति और माता लक्ष्मी की पूजा करके अन्न ग्रहण करते हैं. इससे जीवन सुखमय और घर धन धान्य से परिपूर्ण होने की मान्यता है. मिथिला में सदियों से कोजगरा पूजन की परंपरा को लोग आज भी खूब उत्साह से मनाते हैं.