Tiger के साथ ही Mona में टिकट की ब्लैक मार्केटिंग भी जिंदा हो गई

– अंजनी पांडेय –

पटना : मंगलवार शाम 5:30 बजे ऑफिस से निकला था. कोई दूसरा और काम नहीं था इसलिए मन में आया कि चलो मूवी देखी जाए. दिक्कत बस यह थी कि टिकट मिलने के चांसेस बहुत कम लग रहे थे. वैसे तो आज वीक डे था, फिर भी दिसंबर के आखिरी हफ्ते में पटना छुट्टी के मूड में ही होता है. उस पर अगर सलमान खान की ‘टाइगर जिंदा है’ जैसी कोई मूवी लगी हो तो, इससे बेस्ट फैमिली टाइमपास और कुछ हो नहीं सकता.

एक्जीबिशन रोड से निकल गांधी मैदान की ओर बढ़ने पर पता चला कि रामगुलाम चौक से सीधे रोड क्रॉस कर दूसरी तरफ नहीं जा सकते. पुलिस ने बैरिकेड लगा रास्ता रोक रखा था. अब होटल मौर्या के सामने जेपी गोलंबर के पास से घूमकर वापस आना पड़ता या फिर आगे बिस्कोमान होते हुए गांधी म्यूजियम-ज्ञान भवन की ओर से कारगिल चौक आने का रास्ता था. मैंने पहले वाला रास्ता चुना, और इस रास्ते से रोज गुजरने वाले समझ जायेंगे कि रामगुलाम चौक से होटल मौर्या के सामने से यू-टर्न लेकर वापस रामगुलाम चौक तक दूसरी लेन में आने में कम से कम 20 मिनट लगना कोई आश्चर्य नहीं था.

ये बताना जरुरी इसलिए था कि वक़्त अब 5:55 हो चला था और मैं अभी रामगुलाम चौक को गाँधी मैदान वाली साइड की लेन से क्रॉस कर रहा था. खैर 6:05 होते-होते मैं मोना मिनीप्लेक्स के सामने अपनी बाइक लगा रहा था. आगे रीजेंट में जाने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि आते वक़्त मैंने देख लिया था कि रीजेंट में घुसने के लिए रोड से ही फोर व्हीलर्स की लंबी लाइन लगी है.

तो एक हल्का सा ‘Ray of Hope’ लिए मोना में एंट्री की. लेकिन घुसते ही मेरे सामने एक लाल स्वेटर वाले बूढ़े ने टिकट लहराते हुए धीरे से 250-250 कहा. उसेignore कर जब मैं आगे बढ़ा तो पीछे से आवाज आई – न मिलतव टिकट,,,पूरा बुक हव. खैर मैं आगे बढ़ा, काउंटर पर लोग थे, लेकिन पता चला कि एडवांस बुकिंग चल रही है. आज पूरा हाउसफुल है.

काउंटर के अंदर लगे डिस्प्ले बोर्ड को देखकर disappointment हुआ. फिर पीछे मुड़ने पर उसी लाल स्वेटर वाले शख्स को वहां खड़े लड़कों के ग्रुप के आसपास घुमते देखा. हल्की आवाज में 250-250 बोलना जारी था. कुछ लड़के रुकते, मोलभाव करने की कोशिश करते, फिर आगे बढ़ जाते.

मेरा मूड अब वैसे भी फिल्म देखने का नहीं था. लेकिन जो बात दिमाग में आई, वो ये कि मोना में टिकट ब्लैक होना, कम से कम मैं पहली बार देख रहा था. वो भी काउंटर के इतने पास. इसने पहले सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल की याद दिला दी जब कोई नई मूवी के टिकट हम भीड़ भरे काउंटर के पास ही ब्लैक से 25 के 50 में लिया करते थे.

मोना भी एक मिनीप्लेक्स है, इसलिए यहां इस तरह के सीन अब नहीं दिखते. माना कि फिल्म सलमान खान की है, फिर भी पहले दिन छोड़, अब वीकेंड के बाद इस तरह से टिकट ब्लैक होना, मुझे अटपटा ही लगा. उसपर भी ज्यादा अखरने वाली बात यह कि मोना जैसे सिनेमा हॉल के अंदर सिक्यूरिटी गार्ड्स के सामने खुलेआम टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग होना.

यही सब सोचते-सोचते मुझे एक-दो लोग और दिखे, जो हाथों में टिकट लेकर इधर-उधर घूम रहे थे. कई लोगों ने उनसे टिकट भी ली. मैंने चुपके से कुछ वीडियो लिए और फोटो भी खिंची. फिर यह सोचता हुआ बाहर निकल आया कि Tiger के साथ ही Mona में टिकट की ब्लैक मार्केटिंग भी जिंदा हो गई है.

(Disclaimer : ये लेखक का अपना अनुभव है.)

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