बहुत दुर्लभ किताबें हैं यहां, डिजिटल भी हो रही सिन्हा लाइब्रेरी, बस पढ़नेवाले नहीं आते अब

पटना (शिल्पी सिंह) : दुर्लभ किताबों का जहां समंदर. प्राचीन धरोहरों में शामिल. भारतीय संविधान के प्रमुख आर्किटेक्ट रहे सच्चिदानंद बाबू को याद कराती. बिहार को गौरवान्वित करती संस्था. जी हां, हम बात कर रहे हैं सिन्हा लाइब्रेरी की. आपको दुलर्भ किताबें पढ़नी हों तो पहुंच जाइए सिन्हा लाइब्रेरी.

दरअसल पहले इस संस्था का नाम श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी था. बाद में इसका नाम सिन्हा लाइब्रेरी हो गया. और, आज इसी नाम से यह लाइब्रेरी पटना में फेमस है. बता दें कि यह लाइब्रेरी संविधान सभा के पहले अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा की एक यादगार स्मृति का खजाना है. उन्होंने इसे अपनी दिवंगत पत्नी राधिका देवी की याद में स्थापित किया था. इसकी नींव 9 फरवरी 1924 को बिहार और उड़ीसा के तत्कालीन गवर्नर सर हेनरी व्हीलर की उपस्थिति में रखी गयी थी. वर्ष 1955 में निदेशालय का गठन कर इस पुस्तकालय को राज्य सरकार ने अपने अधीन कर लिया. बाद में इसे केंद्रीय पुस्तकालय का दर्जा मिल गया, जो बिहार के लिए गौरव की बात है.

गौरतलब है कि आज़ादी के वक्त और उस के बाद के समाचार पत्रों का संकलन और प्रदर्शन यहां जिस खूबसूरती के साथ किया गया है, वह देखते ही बनता है. प्रतियोगिता दर्पण, बैंकिंग सर्विसेज क्रॉनिकल जैसी किताबें प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करनेवाले स्टूडेंट्स के लिए यहां उपलब्ध हैं. यहां की लाइब्रेरियन सिमी समर फज़ल ने बताया कि सिन्हा साहब ने 10000 किताबों से इस पुस्तकालय की शुरुआत की थी और आज यहां 1.26 लाख किताबें हैं. हर किताब की देखभाल बारीकी से होती है.

किताबों को रखरखाव के मद्देनजर बिहार सेक्शन के नाम से एक अलग व्यवस्था की गयी है. इस सेक्शन में बिहार से संबंधित हर पुस्तक से लेकर उसके इतिहास तक उपलब्ध है. इस सेक्शन की किताबें ‘नॉट टू बी इश्यूड’ है. उन्होंने बताया कि वर्ष 1903 से लेकर अब तक के न्यूज़ पेपर का संग्रह यहां आपको मिल जायेंगे. कुछ ऐसे न्यूज़ पेपर भी यहां रखे हुए हैं, जो काफी पुराना होने की वजह से फटने लगे हैं. ऐसे में अब इन दुर्लभ पुस्तकों व अखबारों को डिजिटाइजेशन करा रहे हैं. सबों को डिजिटल मोड में ला रहे हैं. इसके लिए सरकार से अनुदान भी मिल रहा है.

हालांकि सरकार की ओर से अब अनुदान में काफी कटौती कर दी गयी है. लाइब्रेरी के रखरखाव के लिए मिल रहे अनुदान में 50 परसेंट की कटौती कर दी गयी है. इस कारण से बुक बाइंडिंग, स्टाफ हाउस समेत अन्य जरूरतों के काम अब ठीक से नहीं हो पा रहे हैं. वर्ष 1970 से यहां कार्यरत रमेश प्रसाद बताते हैं कि मैं पहले यहां पढ़ने आया करता था. उसके बाद यहां मेरी नौकरी लग गयी, पर पढ़ने की लालसा उम्र के इस पड़ाव पर भी वही छात्र जीवन वाली है. उन्होंने बताया कि भारतीय जन, बिहारी, बिहार टाइम्स, मापदंड, सर्चलाइट, लीडर, आर्यावर्त, वीकली हिंदुस्तान और भारतीय राष्ट्र द्वारा प्रकाशित हरिजन जैसे समाचार पत्रों के कुछ अमूल्य अंक मौजूद हैं.

इसी तरह मनुस्मृति की पुरानी कॉपियां, धार्मिक पुस्तकें मसलन कुरान, बौद्ध सूत्तस, मूल भारतीय संविधान की एक कॉपी, आर्य समाज, बौद्ध धर्म, हिंदू संप्रदाय, पुराण, इस्लामी ग्रंथ आदि यहां आपको मिल जायेंगे. बकौल रमेश प्रसाद, आज के युवाओं को जब इस तरह यहां पुरानी पुस्तकों में इतिहास को बड़ी उत्सुकता के साथ खोजते हुए देखता हूं तो बहुत खुशी महसूस होती है.

हालांकि कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी की महत्व को कहीं न कहीं कम कर रही है. इस संबंध में वर्ष 1964 से काम कर रहे एक कर्मचारी अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा ने कहा कि लगभग 50 साल पहले हर रोज 500 से अधिक पाठक यहां आया करते थे और 300 से ज्यादा किताबें इश्यू की जाती थीं, लेकिन अब सिर्फ 300 के मुकाबले 30 पाठक भी नहीं दिखते.

इसकी वजह सरकार की नजर अंदाज़ी और उदासीनता है. जिसके कारण इसे जीवित रहने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है.