मम्मी-पापा नहीं समझते, लेकिन स्मार्टफोन प्रॉब्लम नहीं हमारी जरूरत है

बात पिछले दिनों की है. मैं अपने गांव गयी हुई थी. मौका उत्सव का था. सभी अपने अपने तरीके से एन्जॉय कर रहे थे. मैं भी अपने स्मार्ट फ़ोन पर व्यस्त थी. डिजिटल मीडिया का दौर है. मोबाइल अब चलता फिरता आफिस ही है. काफी देर मुझे देखने के बाद मेरी माँ ने मुझे टोक ही दिया. बोली, हर वक़्त मोबाइल में ही घुसे रहते हैं आज के बच्चे. न जाने क्या है इसमें?

खैर उनकी बात अपनी जगह. दरअसल बड़े बुजुर्गों की सोच अपनी जगह सही है. एक वक्त था जब नींद से आंखें खुलती थी तो लोग भगवान का नाम लेते थे. आज आंखें खुलती हैं तो लोग मोबाइल फ़ोन पर मैसेज चेक करते हैं. शायद स्मार्टफ़ोन के आने के बाद युवा पहले से ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं. फोन की लत किसी भी मायने में ड्रग्स की लत से कम नहीं होती. लती किसी भी चीज का हो अगर वो न मिले तो बेचैनी बढ़ जाती है. तभी तो, चाहे हम कितना भी थके क्यूं न हों, आराम करने से पहले एक बार जरूर चेक करते हैं. तकनीक ने हमारे लिए चीजें जितनी आसान कर दी हैं.

आखिर क्या है स्मार्ट फ़ोन के पीछे हमारे इस क्रेज का कारण? इस टॉपिक पर हमने कुछ यूथ के पेरेंट्स से बात की और कुछ ऐसे रिजल्ट्स आये……

शिवानी सिन्हा पेशे से एक टीचर हैं. कहती हैं कि सुबह से शाम तक यंगस्टर के बीच रहते रहते इतनी समझ तो आ ही गयी है कि युवाओं को आज जैसा माहौल मिलेगा वे वैसे ही होंगे. युवा घरों से ज्यादा स्कूल और कॉलेज में कूल रहते हैं. अपने पेरैंट्स एवं रिलेटिव्स से ज्यादा दोस्तों के साथ फ्रेंडली रहते हैं. स्मार्टफोन उन्हें हमेशा कनेक्ट रखता है. अगर उनके दोस्तों के पास अच्छे व महंगे स्मार्टफोन हैं तो वह उस ओर आकर्षित भी होते हैं. क्लास और फ्रेंड्स के बाद का सबसे ज्यादा वक्त वो स्मार्टफोन पर ही बिताते हैं. और हां, फ़ोन में privacy पर वो खास ध्यान देते हैं.

सोनी सिंह हाउसवाइफ हैं. वह कहती हैं कि अभी के समय में चाहे युवक हो या युवती, एक-दूसरे से जुड़ने या बात करने के लिए स्मार्टफोन चाहते हैं. यही वजह है कि आज स्मार्टफोन लड़के या लड़कियों को जाल में फंसाने का मीडियम बन गया है. प्रेम, प्यार से लेकर जालसाजी करने तक सब काम इस मीडियम पर किया जा रहा है. युवा पीढ़ी को इससे बचने की जरूरत है.

इसी सवाल के उत्तर की खोज जब युवाओं के बीच की गई तो तो कुछ कुछ यूं जवाब मिले…

पटना वीमेन्स कॉलेज की स्वाति कहती हैं – मुझे इंस्ट्राग्राम पर चैटिंग बहुत पसंद है. इस के अलावा गूगल सर्चिंग का इस्तमाल करने के लिए भी मैं स्मार्टफोन रखती हूं. मगध महिला की अंजलि कहती हैं हमारे हॉस्टल में टीवी नही है. कॉलेज से आकर थकान मिटाने के लिए स्मार्टफोन ही सहारा बनता है. जब कभी मन नहीं लगता है तो सीरियल और मूवी देखने के लिए मैं ज्यादातर फोन ही इस्तेमाल करती हूं.

कम्पटीशन की तैयारी करने आई भावना कहती हैं कि मेरा सारा वक़्त गूगलिंग में ही जाता है. गूगल एक बहुत ही अच्छा टीचर है. यह आप पर निर्भर करता है कि इसका कितनी चतुराई से आप इस्तेमाल कर पाती हैं.

होस्टल में रहने वाली लकी, रिमझिम और दिव्या कहती हैं कि ग्रुप में चैटिंग और नोट्स शेयरिंग के लिए स्मार्ट फ़ोन बहुत जरूरी है. इस के कुछ एप्स स्टूडेंट्स के लिए बहुत बेनिफिशियल हैं.

मीडिया में कार्यरत एकता वर्मा कहती हैं कि स्मार्ट फ़ोन मीडिया वालों के लिए वरदान है. अलग—अलग न्यूज़ एप्स डाउनलोड कर बहुत अपडेट रहा जा सकता है.

ई—मार्केटर डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल मार्केटिंग फर्म रिगालिक्स द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि 83 फीसदी युवा स्मार्टफोन से ऑनलाइन खुदरा खरीदारी करते हैं. इसके अलावा इनमें बहुत कम लोग ऐसे हैं जो लगातार शॉपिंग करते हों. केवल 28 फीसदी प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि वे हर सप्ताह अपने स्मार्टफोन से खरीदारी करते हैं, जबकि एक तिहाई लोग मासिक खरीदारी करते हैं और एक चौथाई लोग तिमाही आधार पर खरीदारी करते हैं.

इसके अलावा 94 फीसदी प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि वेबसाइट के मुकाबले एप्स से खरीदारी करना कहीं ज्यादा आसान है.

कहने का मतलब है यह है कि स्मार्टफोन सिर्फ फितूर नहीं है, जैसा कि ओल्ड जनेरेशन के लोग समझते हैं. इसका समझदारी भरा इस्तेमाल आपका काम आसान कर सकता है. और हॉं, ड्रॉबैक तो सभी चीजों के साथ है. स्मार्टफोन भी इससे अछूता नहीं है. विवेकपूर्ण इस्तेमाल तो जरूरी है ही.