अब चप्पा चप्पा चरखा चलता नहीं!

Courtesy- Gandhi by Vahid Sharifi www.abnoosart.ir

बच्चों को हिन्दी वर्णमाला बल्कि यूं कहें कि हिन्दी अल्फावेट से परिचित कराने के क्रम में हम आज भी ‘च’ से ‘चरखा’ ही पढ़ाते हैं. बच्चों से इसका रट्टा लगवाया जाता है. और बच्चे भी इसे सुग्गे की तरह रट लेते हैं. लेकिन क्या आज के बच्चों या नई पीढ़ी को चरखा के बारे में पता है?

क्या उन्होंने कभी चरखा देखा है? क्या उन्हें पता है कि चरखा क्या काम करता है? कभी आप भी अपने या अपने आसपास के बच्चों से पूछकर देखिए. यकीन मानिए, वे इस बारे में नहीं बता पाएंगे. इसलिए नहीं बता पाएंगे क्योंकि चरखा उनके लिए कोई वस्तु नहीं है. कोई प्रतीक नहीं है. इससे उनका कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष जुड़ाव नहीं है. नई पीढ़ी के बहुत सारे बच्चों ने इसे देखा भी नहीं है. संभव है इसे बारे में किसी से कुछ सुना या कहीं पढ़ा भी नहीं हो. तो फिर वे चरखे की अहमियत और इसके गौरवशाली अतीत के बारे में कैसे कुछ बता पाएंगे.

आज के बच्चों के लिए ‘चरखा’ सिर्फ ‘च’ से शुरू होने वाला एक शब्द मात्र है. संभव है बच्चे जब बड़े होंगे तो मॉडर्न हिस्ट्री के बुक में ‘इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल’ के किसी चेप्टर से जब उनकी नजरें किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह गुजरेंगी तो चरखा किसी छोटे से हॉल्ट की तरह उनकी आंखों के सामने से गुजर जाए और पता भी न चले. ऐसे तमाम दूसरे हजारों लाखों शब्दों की ही तरह. लेकिन ‘चरखा’ जो एक अहसास भी है उससे हमारी आज की पीढ़ी कभी परिचित नहीं हो पाएगी. दरअसल हमने उन्हें इस अहसास से परिचित कराया ही नहीं.

कई मूवी प्लेक्स में शो के आरंभ में फिल्म डिवीजन की डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती है. तीन चार मिनट की ब्लैक एंड ह्वाइट डॉक्यूमेंट्री में लोग लू से फारिग होते हैं या फिर पूरे शो के लिए पॉपकॉर्न के इंतजाम में लगे होते हैं. संभव है बच्चों ने किसी संग्रहालय में कभी चरखा देखा हो. तमाम दूसरी पुरावस्तुओं की तरह ही. लेकिन तब उन्होंने चरखा सिर्फ देखा ही होगा, उसे समझ नहीं पाए होंगे. दरअसल चरखा जो कभी जनजीवन का हिस्सा था, वह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से दसकों पहले दूर जा चुका है. अब वह पीढ़ी भी खत्म होती जा रही हैं जिनके जेहन में चरखे की यादें जुड़ी हुई हैं. अब तो कोई इसके किस्से सुनाने वाला भी नहीं है.

दोष आज की पीढ़ी का नहीं है, दोष हम सबका है जिसने इसकी अहमियत के बारे में उन्हें परिचित कराया ही नहीं है. दोष आज के दौर का है जब चरखा व्यवहारिक तौर पर अपनी प्रासंगिकता खो चुका है. ‘महात्मा बुद्ध’की प्रतिमा की तरह हम इसे अपनी ड्राइंग रूम में भी जगह कहां दे पाएं हैं. इसे शोभा सुंदरता की वस्तु भी कम से कम बना पाते. आपने देखा होगा कॉरपोरेट आॅफिस के रिसेप्शन पर, बड़े होटलों की लॉबी में ‘महात्मा बुद्ध’ की प्रतिमाएं नजर आ जाती है. दूसरी किसी डेकोरेटिव पीस की तरह ही. लेकिन ‘चरखा’ को हम इन जगहों पर भी प्लेस नहीं उपलब्ध करवा पाए हैं. काश! जो ‘चरखे’ को इतनी भी तवज्जो मिल पाती. हम इसे इतनी इज्जत भी बख्श पाते. पर अफसोस हम ऐसा नहीं कर पाए.

हम अपने बच्चों को कैसे बता पाएंगे कि महात्मा गांधी जी का ‘चरखा ‘अंग्रेजों की औद्योगिक क्रांति से लोहा लेने की हिम्मत जुटा पाया. कैसे ‘चरखा’ जो कभी स्वदेशी उद्यमिता, स्वाभिमान, स्वावलंबन और स्वाधीनता का सशक्त प्रतीक था और कैसे धीरे धीरे यह हमारी स्मृतियों से भी लुप्त होता चला गया. कभी चप्पा चप्पा चलने वाला ‘चरखा’ कैसे संग्रहालय में धूल फांक रखा है या किसी कबाड़खाने में गर्द ओ गुबार के नीचे दबा पड़ा अंतिम सांसें गिन रहा है. हम आज की पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि ‘चरखा’ केवल ‘च’ से शुरू होने वाला शब्द नहीं है. इससे कहीं ज्यादा और बहुत ज्यादा है.