वंचित समाज के आवाज बने जननायक कर्पूरी ठाकुर, बेहद सादगी भरा था इनका जीवन

लाइव सिटीज डेस्क : राजनीति से भ्रष्‍टाचार का पुराना रिश्ता है. लेकिन ऐसे कई राजनेता भी हुए हैं जो बड़ी ही ईमानदारी और सादगी से अपना जीवन बिताए हैं. बिहार में एक ऐसे मुख्‍यमंत्री भी हुए, जो झोपड़ी में रहते थे, जो गाड़ी नहीं रहने पर रिक्‍शा से चल सकते थे, जो बीच रास्‍ते में कार पंक्‍चर हो जाने पर ट्रक से लिफ्ट लेकर आगे जा सकते थे. यह कोई फिल्‍मी कहानी नहीं है.

हम बात कर रहे हैं बिहार के मुख्‍यमंत्री रहे जननायक कर्पूरी ठाकुर की. आज उनकी जयंती है. घोर गरीबी में जीने वाले कर्पूरी कर जीवन मुख्यमंत्री बनने के बाद भी सादगी भरा रहा. उन्हें जननायक की पदवी ऐसे ही नहीं मिली. इसके पीछे उनकी सोच व कार्यशैली निहित थी. उनकी कई स्मृतियां आज भी लोगों के जेहन में हैं. कर्पूरी ठाकुर के पुत्र व राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर तथा अन्‍य लोगों ने उनसे जुड़ी स्मृतियों को साझा किया.

समस्तीपुर के पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) में जन्मे कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अपनी टूटी झोपड़ी में ही रहते थे. उनके निधन के बाद उस झोपड़ी को हटाकर सरकार ने वहां एक सामुदायिक भवन का निर्माण कराया, जो अब स्मृति भवन के रूप में जाना जाता है. उनकी सादगी और भी कई कहानियां हैं. एक बार समस्तीपुर में एक कार्यक्रम में कर्पूरी ठाकुर को शामिल होना था. उस समय वे राज्य के मुख्यमंत्री थे.

हेलीकॉप्टर से वे दूधपुरा हवाई अड्ड़े पर समय पर पहुंचे तो देखा कि न तो कलेक्टर आए हैं और न ही कोई अन्य प्रशासनिक पदाधिकारी. तब वे रिक्शे पर बैठे और कार्यक्रम स्थल की ओर चल दिए. रास्ते में कलेक्टर मिले तो सिर्फ इतना ही पूछा, बहुत विलंब हो गया, क्या बात है? इस पर कलक्टर ने कहा, कार्यक्रम की तैयारी में ही व्यस्त था. उन्होंने कहा, कोई बात नहीं. फिर उनकी गाड़ी पर बैठ कर कार्यक्रम स्थल आए. इस तरह की कई घटनाएं हैं जो आज भी लोगों को कर्पूरी ठाकुर के जीवन दर्शन में झांकने को विवश करती है.

बिहार के पहले सोशल इंजीनियर थे कर्पूरी ठाकुर

977 में इमरजेंसी हटने के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हुए. जनता पार्टी को बहुमत मिला. बिहार में सत्ता के लिए तब कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के बीच शक्ति परीक्षण हुआ. कर्पूरी ठाकुर की जीत हुई और वे मुख्यमंत्री बने. कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में चूंकि बहुमत की सरकरा बनी थी इस लिए उन्हें अपनी नीतियों को लागू करने का मौका मिला. कर्पूरी ठाकुर अब तक पिछड़ों की राजनीति करते आ रहे थे लेकिन नीतियों को मूर्त रूप देने का मौका नहीं मिला था.

उन्होंने गरीबों और पिछड़ों के लिए खुल कर राजनीति की. दरअसल, कर्पूरी ठाकुर ही बिहार के पहले सोशल इंजीनियर थे जिन्होंने पिछड़ावाद को राजनीति की धुरी बनाया. शासन में आने आठ महीने बाद ही उन्होंने 9 मार्च 1978 को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू करने की घोषणा की. कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को कुछ संशोधन के साथ स्वीकार कर लिया. इस आरक्षण में कोटा के अंदर कोटा की व्यवस्था थी.

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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है

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