गरीबों के मसीहा हैं ये 67 साल के डॉक्टर, साल 1973 से सिर्फ 2 रुपए में मरीजों का कर रहे हैं इलाज

लाइव सिटीज डेस्क : आजकल स्वास्थय को लेकर लोगों में सजगता ज्यादा देखने को मिल रही है. लेकिन फिर भी कई ऐसी जगहें हमारे देश में हैं जहां लोगों के पास खाने तक के पैसे नहीं हैं तो अपने स्वास्थय को अच्छा रखने के लिए वो कैसे खर्च कर अच्छा भोजन कर सकते हैं.

आर्थिक स्थिती सही न होने के कारण अगर कोई बीमार भी पड़ता है तो वो अपनी दवा दारू का खर्च भी नहीं उठा पाता है. बीमार हुए तो दो-चार हजार रुपए का खर्च आना मामूली बात है. मगर, यदि आपको पता चले कि कोई डॉक्टर दो रुपए में इलाज कर रहा है, तो आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी. शायद आपको यकीन न हो लेकिन ये सच है. आज के दौर में जहां सस्ती सुचारू स्वास्थ्य सेवा मिलना दूर का सपना है, वहीं एक डॉक्टर ऐसा भी है जो महज दो रुपए में लोगों का इलाज कर रहा है.

दरअसल, 67 साल के टी. वीराराघवन ने फैसला किया है कि वह वंचित वर्ग के लोगों को सबसे कम कीमत में इलाज मुहैया कराएंगे. चेन्नई के रहने वाले 67 वर्ष के डॉक्टर थीरुवेंगडम वीराराघवन पिछले 44 सालों से मरीजों से केवल 2 रुपए लेकर ही इलाज कर रहे हैं. उनकी यह नि:स्वार्थ सेवा 1973 से जारी है. वीराराघवन ने गरीब और समाज के वंचित वर्ग के लोगों के लिए सस्ती सुलभ चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने हेतु अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया है.

वीराराघवन की जिंदगी की कहानी काफी संघर्ष से भरी है. साल 2015 में आई बाढ़ में उनका सबकुछ बह गया था. मगर, उन्होंने हार नहीं मानी. वह अस्पताल से अपनी सेवाएं देते रहे, जो 1973 से इसी इलाके में चल रहा है.

स्टेनले मेडीकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाले वीराराघवन ने वेश्यारपादी में अपना अधिकतर जीवन व्यतीत किया है. वह सुबह 8 बजे से इरुकांचेरी में मरीजों को देखना शुरू करते हैं और रात 10 बजे तक मरीजों को देखते हैं. वह वेश्यारपादी में भी मरीजों को देखने के लिए जाते हैं. मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रशिक्षण के बाद वह कुष्ठ रोगियों के घावों को भरने का काम भी कर लेते हैं. अधिकांश चिकित्सक पर्याप्त संसाधनों और एहतियात के अभाव में ऐसे मरीजों को छूने से भी परहेज करते हैं. वहीं, वीराराघवन इन सबके परे अपना कर्त्तव्य निभाते हुए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

अपनी इस सेवा के लिए उन्हें लोग दो रुपए वाले डॉक्टर के रूप में भी पुकारते हैं। स्थानीय लोग उन्हें पसंद करते हैं। बता दें कि अपने करियर के शुरुआत से ही मरीजों से दो रुपए फीस लेने वाले वीराराघवन ने मरीजों के कहने पर ही अपनी फीस को एक बार दो रुपए से 5 रुपए कर दिया था।

आस-पड़ोस में रहने वाले डॉक्टर उनसे कई बार मांग कर चुके हैं कि वे 100 रुपए तो फीस लें, लेकिन वीराराघवन पैसों से ज्यादा समाज सेवा को बढ़ावा दे रहे हैं. इस वजह से उन्हें कई डॉक्टरों का विरोधभी सहना पड़ा. ऐसे में नि:स्वार्थ भाव से लोगों का इलाज का प्रण लिए वीराराघवन ने इसका एक अचूक रास्ता निकाला. उन्होंने मरीजों से पैसे लेने बंद कर दिए.

अब उन्होंने मरीजों पर छोड़ दिया कि वह उन्हें जितने पैसे देंगे वह उसे स्वीकार करेंगे. अपने इस नेक कार्य को लेकर अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से अपनी बातचीत में डॉ वीराराघवन ने कहाः “मैंने डॉक्टर बनने के लिए जो पढ़ाई की उसमें मुझे पैसे नहीं खर्च करने पड़े. यह पढ़ाई उन्होंने समाज की सेवा के लिए की है. मैं पूर्व मुख्यमंत्री के कामराज की नीतियों का शुक्रगुजार हूं, जिसने मुझे मरीजों का नि:शुल्क इलाज करने के लिए प्रेरित किया. मैंने संकल्प लिया था कि मैं अपने पेशे को पैसे कमाने का जरिया नहीं बनाऊंगा.”

वीराराघवन की आय का एक मात्र स्थिर स्रोत का जरिया एक कॉर्पोरेट अस्पताल है, जहां वह बतौर औद्योगिक स्वास्थ्य में एसोसिएट फेलो (AFIH) कार्यरत हैं. उनके कई साथी सरकारी या निजी अस्पतालों में काम कर रहे हैं और विदेशों में अपने परिवार सहित बसे गए हैं, वहीं दूसरी ओर एक अलग ही सोच के साथ वीराराघवन अपने पथ पर डटे हुए हैं.