पद्मावती विवाद के बीच पढ़ें अलाउद्दीन खिलजी की शहजादी की प्रेम कहानी…

लाइव सिटीज डेस्क : रानी पद्मावती की चर्चा एक बार फिर से हो रही है और खूब हो रही है. इतना ही नहीं, इस मूवी को पहले एक दिसबंर को रिलीज होना था. लेकिन अब इसकी डेट अनिश्चितकाल के लिए बढ़ गयी है. फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली की इस मूवी में पद्मावती के सेंट्रल रोल में बॉलीवुड की फेमस अदाकारा दीपिका पदुकोण है. साथ में रणवीर सिंह और शाहिद कपूर जैसे बड़े एक्टर्स भी इस फिल्म के मुख्य कलाकारों में शामिल हैं.

लेकिन इस फिल्म के लेकर जबर्दस्त विवाद खड़ा हो गया है. दरअसल राजस्थान के एक संगठन करणी सेना का आरोप है कि फिल्म के जरिए संजय लीला भंसाली ने रानी पद्मावती को गलत तरीके से दर्शाया है. कुछ लोग तो रानी पद्मावती के अस्तिव पर भी सवाल उठा रहे हैं. वहीं पद्मावती विवाद के बीच एक नई कहानी सामने आ रही है. शायद ही इस बारे में किसी को पता होगा.

यह कहानी उस राजपूत योद्धा की है, जिस पर अलाउद्दीन खिलजी की बेटी का दिल आ गया था. अगर आप राजस्थान जाएंगे, तो आज भी इस तरह के किस्से आपको सुनने को मिलेगा. हर प्रेम कहानी की तरह इस प्रेमलीला का अंत भी अच्छा नहीं हुआ. अलाइद्दीन खिलजी की बेटी और राजपूत योद्धा के प्रेम का अंजाम बेहद ही खौफनाक था. आइए राजस्थान की इस मशहूर प्रेम कहानी से आपको रूबरू कराते हैं.

वीरमदेव की दीवानी थी शहजादी


राजस्थान के जलौर में एक राजपूत योद्धा था राजकुमार वीरमदेव. वीरमदेव की वीरता की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में थी. उसे कुश्ती में कोई हरा नहीं सकता था. जालौर के सोनगरा चौहान शासक कान्हड़ देव का पुत्र वीरमदेव उस समय दिल्ली दरबार में रहता था और इसी दौरान दिल्ली के तत्कालीन बादशाह अलाउद्दीन खिलजी की शहजादी फिरोजा को वीरम से एकतरफा प्यार हो गया.

शहजादी की सनक ऐसी थी कि उसने किसी भी कीमत पर वीरमदेव को पाने की ठान ली. और कहा, ‘वर करूं वीरमदेव, न तो रहूंगी अकन कुंवारी’ यानि मै निकाह करूंगी तो वीरमदेव से नहीं तो जीवन भर कुंवारी रहूंगी. बेटी की जिद और राजनीतिक लाभ पाने के लिए बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने भी वीरमदेव के पास शादी का प्रस्ताव भेज दिया, पर वीरम ने इस प्रस्ताव को तुरंत ठुकरा दिया.

वीरम ने कहा..
‘मामो लाजे भाटियां, कुल लाजे चौहान,
जे मैं परणु तुरकणी, तो पश्चिम उगे भान.”


यानि अगर मैं तुरकणी से शादी  करूं तो मेरे मामा (भाटी) का कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएगा और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम से उगे. वीरम के मना करने पर नाराज होकर अलाउद्दीन खिलजी ने युद्ध का एलान कर दिया. लोग कहते हैं कि एक वर्ष तक तुर्कों की सेना जालौर पर घेरा डालकर बैठी रही, फिर युद्ध हुआ और किले की हजारों राजपूतानियों ने जौहर किया. साथ ही इस युद्ध में खुद वीरमदेव ने 22 वर्ष की अल्पायु में ही वीरगति पाई.

शहजादी ने अपनी जान दे दी. 

युद्ध की समाप्ति पर तुर्की की सेना वीरमदेव का मस्तक दिल्ली ले गई और शहजादी के सामने एक स्वर्ण थाल में वीरम का मस्तक रख दिया, जिसे देखकर शाहजादी फिरोजा को बेहद दुख हुआ और उसने खुद ही उस मस्तक का अग्नि संस्कार किया. बाद में दुखी होकर शहजादी ने यमुना नदी में कूदकर अपनी जान दे दी. ऐसी भी कहा जाता है कि जैसे ही फिरोजा सामने आई तो थाल में पड़े वीरमदेव के मस्तक ने मुंह फेर लिया.

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