बिहारी मजदूर ने अपनी मेहनत से पूरी की इंजीनियरिंग, अब सिंगापुर में कमा रहा 8 लाख रु. सालाना

लाइव सिटीज डेस्क : सफलता प्राप्त करने का आधार ही मेहनत है. जिंदगी में कोई भी काम करने में मेहनत जरूर लगती है. चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक. मेहनत करने का उद्देश्य जीवन यापन से जुड़ा होता है. हां मेहनत का परिणाम कई बार देर से मिलता है. लेकिन मिलता जरूर है.

मेहनत के दिए जलाए जा
सफलता के परचम लहराए जा,
दुःख सुख तो आते रहेंगे जीवन में
तू जीवन को आगे बढाए जा।

ये पंक्तियां शायद बिहार के एक होनहार युवा दिलीप साहनी पर सटीक बैठती हैं जो पूर्णिया के रहने वाले हैं. दिलीप ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई दैनिक मजदूरी करते हुए पूरी की है. दिलीप एक मजदूर के बेटे हैं लेकिन उनकी सोच कहीं ज्यादा बड़ी है. दिलीप ने लगातार अपनी मेहनत के दम पर बीटेक की डिग्री हासिल की, जिसके बाद नौकरी के लिए उनका मलेशिया के लिए कैम्पस सेलेक्शन भी हो गया.

लेकिन उस वक्त दिलीप के पास मलेशिया जाने के लिए पैसे नहीं थे. पर आज बतौर इंजीनियर दिलीप सालाना 8 लाख रुपए कमा रहे हैं. 23 साल के दिलीप आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं उसके लिए इन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी. इन्हें ये सफलता ऐसे ही नहीं मिली इसके लिए उनको सामाजिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ा था.

 

दिलीप कहते हैं कि, “मेरे और मेरे परिवार के लिए एक इंजीनियर बनने के अपने सपने का समर्थन करना कभी आसान नहीं था.” दिलीप ने बताया कि उनका मूल घर दरभंगा जिले में है, जहां से उनका परिवार हर साल बरसात के मौसम में 6 महीने (जुलाई से जनवरी) के लिए पूर्णिया आ जाता है. यहां पूरा परिवार मखाने की कटाई और फोड़ने का काम करता है. इस काम में कई बार हाथ भी जल जाते हैं लेकिन मिलते हैं सिर्फ 200 रूपए.

इस तरह परिवार के सभी सदस्य मिलकर 800 रुपए रोज का कमा लेते हैं. दिलीप आगे बताते हैं कि बहुत मेहनत कर के मेरे पिता जी ने पैसे जमाकर मुझे इंजीनियरिंग कराई.

दिलीप के पिता लालटुन साहनी को दिलीप को पढ़ाने के लिए अपनी पुश्तैनी 11 कट्ठा जमीन को बेचना भी पड़ा. बेटे की पढ़ाई के लिए जब उन्हें पैसों की जरूरत थी तो उन्हें कहीं से भी मदद नहीं मिली। न तो कोई सरकारी मदद मिली और न ही बैंक ने लोन दिया. लालटुन साहनी ने मजदूरी से पैसे जोड़-जोड़ कर दिलीप की पढ़ाई पूरी कराई.

अपनी वर्तमान तनख्वाह के बारे में बात करते हुए दिलीप ने याद किया कि एक वक़्त था जब राजधानी पटना से उत्तर पूर्व में 360 किलोमीटर दूर पूर्णिया में स्थित हरदा में बतौर मजदूर काम करने वाले इस परिवार की महीने की आमदनी मात्र 2,000-3,000 रुपए थी.

 

दिलीप ने बताया, ‘2013 में जब मुझे भोपाल के एक प्राइवेट तकनीकी कॉलेज Millennium Group of Institutions में एक इंजीनियरिंग प्रोग्राम में एडमिशन लेने का ऑफर मिला था, तब मैंने एजुकेशन लोन के लिए कई बैंक्स के चक्कर लगाए, लेकिन मेरी सभी ऍप्लिकेशन्स को रिजेक्ट कर दिया गया था.’ जब उनको बैंक से कोई मदद नहीं मिली, तब दिलीप के छोटे भाई ने उनकी मदद करने की ठानी और अपने बड़े भाई की पढ़ाई के लिए चेन्नई में एक टाइल यूनिट में नौकरी की.

इसके अलावा मखाने फोड़ने का सीजन खत्म होने पर दिलीप के पिता लालटुन साहनी नेपाल जाकर आइसक्रीम बेचते थे ताकि दिलीप की पढ़ाई पूरी हो सके. छुट्टियों में दिलीप भी परिवार के साथ मखाना फोड़ने का काम करते हैं. उन्होंने कहा, “यदि मेरे पिता और भाई ने पैसे से मेरी सहायता नहीं की होती और इतना कठिन परिश्रम नहीं किया होता, तो मैं इंजीनियर नहीं बनता.”

इसके अलावा उनके सामने सामाजिक चुनौती भी खड़ी थी, जो बहुत बहुत बड़ी थी. दिलीप से पहले, उनके गांव अंतोर से कोई भी दसवीं की परीक्षा भी पास नहीं किया है. उन्होंने जेएनजेवी हाई स्कूल, नवादा, बेनिपुर से फर्स्ट डिवीजन में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके 2011 में ये उपलब्धि हासिल की. इसके बाद उन्होंने 2013 में दरभंगा के भरेरा कॉलेज से बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की.

उन्होंने बताया, ‘शिक्षा मेरे लिए कभी आसान नहीं थी क्योंकि हर साल मखाना कटाई के मौसम में मुझे श्रमिक के रूप में काम करने और कुछ पैसे कमाने के लिए पूर्णिया की यात्रा करनी पड़ती थी.’ गांव के बहुत से लोगों का मानना था कि दिलीप पढ़-लिख कर आगे बढ़ने के जो सपने देख रहा है, वो व्यर्थ है. पढ़ाई के प्रति उसकी सनक व्यर्थ ही है, लेकिन वो दृढ़ निश्चयी था और उसने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था.

अपने कॉलेज में पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दिलीप को 2016 में राज्य में टॉप करने पर मध्यप्रदेश के गृह मंत्री ने दिलीप को सम्मानित किया और सर्टिफिकेट प्रदान किया. आखिरकार पिछले महीने एक बड़ी इस्पात कंपनी, Sangam Group ने उनको नौकरी का प्रस्ताव दिया है, जिसमें उनकी पोस्टिंग सिंगापुर में होगी. इसके साथ ही उनको 8 लाख रुपए सालाना सैलरी ऑफर की गई है. ये सैलरी उनके परिवार की सालाना इनकम से कई गुना अधिक है, जो मखाना फोड़ कर वो कमाते हैं.

ये तो अभी शुरुआत है. दिलीप कहते हैं कि उनका सपना उन गरीब बच्चों की मदद करना है, जो पढ़ाई करने के लिए प्रवासी मखाना मजदूरों के रूप में काम करते हैं. इस काम के लिए उनके आदर्श पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक निशांत तिवारी हैं, जिन्होंने गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए ‘मेरी पाठशाला’ की शुरुआत की है. आपको बता दें कि दरभंगा और मधुबनी जिलों से 10,000 से भी अधिक प्रवासी श्रमिक पूर्णिया में मखाना कटाई और प्रसंस्करण में लगे हुए हैं. इन लोगों के लिए दिलीप प्रेरणा बन सकते हैं.