यूंही नहीं कोई दिलीप कुमार होता, 60 के दशक के सबसे सफल अभिनेता

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दिलीप कुमार और सायरा बानो

लाइव सिटीज डेस्क: बॉलीवुड के महान अभिनेता दिलीप कुमार आज अपना 95वां जन्मदिन मना रहे हैं. दिलीप कुमार का बर्थडे उनकी पत्नी सायरा बानो खास तरीके से मनाने जा रही हैं. इस मौके पर सायरा बानो ने उनकी पसंदीदा बिरयानी और वनीला आइसक्रीम बनाने का फैसला किया है. सायरा बानो ने कहा कि वह इस बार जन्मदिन का जश्न मनाने की योजना नहीं बना रहीं क्योंकि दिलीप कुमार अब भी निमोनिया के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं. सायरा बानो  कहा, ‘हम भव्य जन्मदिन की पार्टी नहीं दे रहे हैं क्योंकि उनकी सेहत थोड़ी ठीक नहीं है. निमोनिया होने के बाद से ही उनका रोग प्रतिरोधक तंत्र उतना अच्छा नहीं है.’ सायरा बानो ने दिलीप कुमार के लिए एक नई शर्ट और ट्राउजर लेने की भी योजना बनाई है.

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दिलीप कुमार  जन्म 11 दिसंबर, 1922 को हुआ था. उन्होंने 1944 में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बॉम्बे टॉकीज द्वारा निर्मित फिल्म के जरिए की थी. वे बॉलीवुड के उन स्टार्स में शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में आकर अपना बदला है. उन्हें दिलीप कुमार नाम देविका रानी ने दिया था.  दिलीप कुमार को अपने दौर का बेहतरीन अभिनेता माना जाता है, त्रासद भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हे ‘ट्रेजडी किंग’ भी कहा जाता था.

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दिलीप कुमार को भारतीय फ़िल्मों में यादगार अभिनय करने के लिए फ़िल्मों का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के अलावा पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ से से भी सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा वहवर्ष 2000 से वे राज्य सभा के सदस्य है.

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प्रष्ठ-भूमि

दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसम्बर, 1922 को वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर शहर में हुआ था. उनके बचपन का नाम ‘मोहम्मद युसूफ़ ख़ान था। उनके पिता का नाम लाला ग़ुलाम सरवर था जो फल बेचकर अपने परिवार का ख़र्च चलाते थे. विभाजन के दौरान उनका परिवार मुंबई आकर बस गया. उनका शुरुआती जीवन तंगहाली में ही गुजरा. पिता के व्यापार में घाटा होने के कारण वह पुणे की एक कैंटीन में काम करने लगे थे. यहीं देविका रानी की पहली नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने दिलीप कुमार को अभिनेता बना दिया. देविका रानी ने ही ‘युसूफ़ ख़ान’ की जगह उनका नया नाम ‘दिलीप कुमार’ रखा. पच्चीस वर्ष की उम्र में दिलीप कुमार देश के नंबर वन अभिनेता के रूप में स्थापित हो गए थे.

शादी

दिलीप कुमार की शादी अभिनेत्री सायरा बानो से वर्ष 1966 मे 11 अक्टूबर  को हुई. विवाह के समय दिलीप कुमार 44 वर्ष और सायरा बानो की 22 वर्ष की थीं. 1980 मे कुछ समय के लिए उन्होंने आसमां से दूसरी शादी भी की थी.

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दिलीप कुमार की कोई संतान नहीं है

बॉलीवुड में ट्रेजडी किंग के नाम से फेमस दिलीप कुमार की कोई संतान नहीं है. यह बात सभी जानते हैं, लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि वे पिता क्यों नहीं बन सके. इसका जवाब उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘द सबस्टांस एंड द शैडो’ में दिया था. बुक में दिलीप कुमार ने कहा है, ‘सच्चाई यह है कि 1972 में सायरा पहली बार प्रेग्नेंट हुईं. यह बेटा था (हमें बाद में पता चला). 8 महीने की प्रेग्नेंसी में सायरा को ब्लड प्रेशर की शिकायत हुई. इस दौरान पूर्ण रूप से विकसित हो चुके भ्रूण को बचाने के लिए सर्जरी करना संभव नहीं था और दम घुटने से बच्चे की मौत हो गई.’ दिलीप की मानें तो इस घटना के बाद सायरा कभी प्रेग्नेंट नहीं हो सकीं.

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करियर

दिलीप कुमार ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से की, जो वर्ष 1944 मे आई. हालांकि यह फ़िल्म सफल नहीं रही. उनकी पहली हिट फ़िल्म ‘जुगनू’ थी. 1947 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने बॉलीवुड में दिलीप कुमार को हिट फ़िल्मों के स्टार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया. 1949 में फ़िल्म ‘अंदाज़’ में दिलीप कुमार ने पहली बार राजकपूर के साथ काम किया. यह फ़िल्म एक हिट साबित हुई. दीदार (1951) और देवदास (1955) जैसी फ़िल्मों में गंभीर भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा. मुग़ले-ए-आज़म (1960) में उन्होंने मुग़ल राजकुमार जहांगीर की भूमिका निभाई. ‘राम और श्याम’ में दिलीप कुमार द्वारा निभाया गया दोहरी भूमिका (डबल रोल) आज भी लोगों को गुदगुदाने में सफल साबित होता है. 1970, 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने कम फ़िल्मों में काम किया. इस समय की उनकी प्रमुख फ़िल्में थीं: क्रांति (1981), विधाता (1982), दुनिया (1984), कर्मा (1986), इज़्ज़तदार (1990) और सौदागर(1991). 1998 में बनी फ़िल्म ‘क़िला’ उनकी आखिरी फ़िल्म थी. उन्होने रमेश सिप्पी की फिल्म शक्ति मे अमिताभ बच्चन के साथ काम किया. इस फिल्म के लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला.

अपने 5 दशक के लंबे करियर में दिलीप कुमार ने 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते. 1991 में उन्हें पद्मृ भूषण, 1994 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड और 2015 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. इसके अलावा उन्हें पाकिस्तान सरकार ने निशान-ए-इम्तियाज से साल 1998 में सम्मानित किया.