कभी स्कूटर खरीदने तक के नहीं थे पैसे, आज यह क्रिकेटर घूम रहा है 1 करोड़ की हमर गाड़ी में

लाइव सिटीज डेस्क : ‘मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है, हर पहलू जिंदगी का इम्तिहान होता है, डरने वालों को मिलता नहीं कुछ जिंदगी में, लड़ने वालों के कदमों में जहां होता है.’ जी हां, कुछ ऐसे ही हैं, इंडियन क्रिकेट टीम के फिरकी किंग हरभजन सिंह. जिनकी जिंदगी में कदम-कदम पर मुसीबतों ने दस्तक दिया. पर पाजी कभी नहीं रुके. और पिता की मौत के बाद वे अपने परिवार की बागडोर संभालते हुए World Cricket में जीत का तिरंगा फहराने में कामयाब रहे.



इंडियन क्रिकेट टीम के एक बहुत ही पॉपुलर प्लेयर

हरभजन सिंह इंडियन क्रिकेट टीम के एक बहुत ही पॉपुलर प्लेयर हैं. शायद ही कोई ऐसा इंडियन क्रिकेट प्रेमी होगा जो हरभजन सिंह का नाम ना सुना होगा. हरभजन सिंह का जन्म पंजाब के जालंधर शहर में सरदार सरदेव सिंह प्लाहा के घर हुआ था. उनके पिता का मशीन पार्ट्स का छोटा सा काम था. हरभजन की मां अवतार कौर हाउसवाइफ रही हैं. वहीं उनकी तीन बहने भी हैं.

साल 2000 में जब भज्जी केवल 20 साल के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था. कम उम्र में घर की जिम्मेदारी आ जाने से भज्जी का क्रिकेट करियर भी खतरे में पड़ गया था. लेकिन फिर भी पिता का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने कई मुश्किलों के बाद भी क्रिकेट खेलना नहीं छोड़ा.

खुद को अच्छा क्रिकेटर बनते देखना चाहते थे

हरभजन खुद को अच्छा क्रिकेटर बनते देखना चाहते थे, इसलिए कई बार बीमार होने के बाद भी कभी प्रैक्टिस सेशन नहीं छोड़ते थे. वे दिन में तीन बार दौलतपुर स्थित प्रैक्टिस ग्राउंड में क्रिकेट खेलने जाते थे. उस वक्त उनके पास स्कूटर नहीं था वे साइकिल से ही जाते थे. कई बार जब शाम को लाइट चली जाती थी तो पार्क में खड़े स्कूटर की हेडलाइट जलवाकर वे बॉलिंग प्रैक्टिस करते थे.

इंडियन स्टार स्पिनर हरभजन सिंह 2001 में घर चलाने के लिए क्रिकेट छोड़ने का मन बना चुके थे. सन् 2000 में पिता की मौत के बाद उन्होंने इतने टूट गए चुके थे कि उन्होंने फैसला किया कि वे क्रिकेट छोड़ यूएस चले जाएंगे और वहां जाकर ट्रक ड्राइवर बन जाएंगे पर सही वक्त पर उन्हें उनकी पांच बहनों का सपोर्ट मिला जिन्होंने हरभजन को संभाला और उन्हें क्रिकेट में वापसी करने को कहा, नहीं तो टीम इंडिया इस स्टार को दोबारा नहीं देख पाते.

हरभजन सिंह ने 1998 में इंटरनेशनल क्रिकेट में डेब्यू किया था. करीब 1.5 साल तक खेलने के बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया. कुंबले तब टीम इंडिया के स्टार स्पिनर थे. उनके चोटिल होने के बाद भी भज्जी की जगह दूसरे प्लेयर्स को मौका मिल रहा था. इससे वो निराश हो गए थे.

इसी बीच साल 2000 में भज्जी के पिता का निधन हो गया. अब वो ही परिवार में अकेले कमाने वाले शख्स थे. भज्जी पर मां और 5 बहनों की जिम्मेदारी थी. टीम में वापसी नहीं होने के कारण वो क्रिकेट छोड़ने का सोच चुके थे. भज्जी ने यूएस जाकर ट्रक ड्राइवर बनना तय किया, ताकि वो अपना घर चला सकें. हालांकि, उनकी बहनों के सपोर्ट की वजह से उन्होंने फिर रणजी ट्रॉफी खेली जिसमें उन्होंने 28 विकेट झटके और पंजाब को जीत दिलाई थी.

2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत की अहम घरेलू टेस्ट सीरीज से पहले कुंबले चोटिल हो गए थे. यहीं से हरभजन की किस्मत बदली. तब सौरव गांगुली के कहने पर हरभजन की टीम में वापसी हुई. ये सीरीज उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. पहले टेस्ट में उन्होंने 4 विकेट लिए. वहीं, दूसरे और तीसरे टेस्ट में ऑस्ट्रेलियाई बैट्समैन भज्जी की घूमती बॉल के आगे टिक नहीं सके. भज्जी ने दूसरे टेस्ट में 13 और तीसरे टेस्ट में 15 विकेट झटककर टीम इंडिया में अपनी जगह फिक्स कर ली थी. यहीं से उन्हें टर्बोनेटर नाम मिला था.

स्टार क्रिकेटर बनने के बाद अब हरभजन की करोड़ों रुपए की नेट वर्थ है. वे हमर जैसी लग्जरी कारों के शौकीन हैं. इसके अलावा उनके पास BMW भी है, जो उन्हें शादी में गिफ्ट के तौर पर मिली थी. हरभजन ने अक्टूबर 2015 में बॉलीवुड एक्ट्रेस गीता बसरा से शादी की थी. एक वक्त पर स्कूटर तक नहीं खरीद पाने वाले भज्जी आज करोड़ों रुपए वाली कई गाड़ियां चलाते हैं. आज करीब एक करोड़ रुपए की हमर गाड़ी में घूमने वाले हरभजन के पास एक वक्त स्कूटर खरीदने के पैसे भी नहीं थे.