‘बुनिया’ ब्यूटीफुल…कर गई चुल्ल, .सरस्वती माता…’बुंदिया’ दाता…

पटना (विमलेन्दु कुमार सिंह): बचपन की यादें हैं. बच्चों की मिठाई से यारी तो जगजाहिर है. उस जमाने में यानी आज से तीस-पैंतीस साल पहले जब पिज्जा, बर्गर, पास्ता, नूडल्स को कोई पहचानने वाला भी नहीं था. नमकीन की सल्तनत में समोसा-पकौड़ी की शान हुआ करती थी. जन-जन में जलेबी का जलवा हुआ करता था. पूरी कायनात में मूढ़ी-कचरी के कद्रदान हुआ करते थे. रसगुल्ला का सोशल स्टेटस अब भी शहंशाह-ए-स्वीट का है, तब भी था. और शायद आगे भी इस स्टेटस पर कोई खतरा नजर नहीं आ रहा. पर यहां चर्चा उस मिठाई की, जिसकी खुशबू से ही न जाने क्यों हम बच्चों का सेलिवरी ग्लैंड सुपर एक्टिवेट हो जाता था और पता नहीं क्यों हम सबका टंग (जीभ) तुरंत ही ‘लप-लपाइंग’ मोड में आ जाता था. जी हां, वह मिठाई थी बुंदिया. बरखा की बूंद—सी गोल—गोल ‘बुंदिया’ जिसे देसी बोली में हमलोग ‘बुनिया’ ही कहते थे. याद करके आज भी मुंह में लार रिसने लगता है.

बुंदिया

संकटमोचक हनुमान जी और विघ्नहर्ता गणेश जी भगवान की प्रिय मिठाई लड्डू की बुनियाद है ‘बुंदिया’. समझ लीजिए कि लड्डू नामक ऑरगेनिज्म में बुंदिया किसी सेल (कोशिका) की तरह है. कहने का मतलब यह कि बुंदिया नहीं तो लड्डू नहीं. लड्डू का मॉल्यूकुल है बुंदिया. सही मायने में अगर किसी मिठाई को ‘पॉकेट फ्रेंडली’ मिठाई का दर्जा दिया जा सकता है तो वह मिठाई है ‘बुंदिया’. तभी तो हम बच्चों के जुबां पर उन दिनों एक पंक्ति बरबस ही तैरती रहती थी- ‘लड्डू से लड्डू लड़े तो बुनिया झड़े’.

गाजर

हम बच्चों को सही मायने में अगर कभी थोड़ी-बहुत आजादी मिलती थी तो सिर्फ वसंतपंचमी यानि सरस्वुती पूजा के दौरान. गार्जियन के टोकाटोकी से थोड़ी देर के लिए ही सही हमें मुक्ति मिल जाती थी. ऐसा इसलिए भी कि परिवार के बड़े-बुजुर्गों का मानना था कि मां सरस्वती की पूजा आराधना अगर तन्मयता से करेगा तो पढाई-लिखाई के प्रति भी थोड़ी गंभीरता तो दिखाएगी ही. लेकिन उन्हें क्या पता कि उनके इस ‘यूनिवर्सल ट्रूथ’ का आगे क्या हश्र होने वाला है.

बेर

बहरहाल, ‘वीणा पुस्तकधारिणी…हंसवाहिनी…विद्यादायिनी और सोरत्ती माता….विद्यादाता और हे…हो…कि हो…सोरसत्ती माय की जै हो….’ के नारों के बीच जब हमलोग कुम्हरटोली से मां सरस्वती की प्रतिमा लेकर आ रहे होते तो रास्ते में हलवाई की दूकान पर छनौटे की छनछन आवाज के बीच छानी जा रही और चासनी में पग रही बुंदिया की ओर ध्यान बगैर किसी ध्यानाकर्षण प्रस्ताुव के ही खिंचा चला जाता.

केला

इसके स्वाद-सौंदर्य में हम बच्चे कुछ इस कदर मगन हो जाते कि पूजापाठ की प्रतिबद्धता रूटीन वर्क हो जाता और सारा फोकस बुंदिया पर ही रहता. सच कहें तो प्रसाद ग्रहण के हसीन सपनों में हम बच्चे कुछ इस कदर मुंगेरी लाल हो जाते थे कि सरस्वती माता….के बाद नारा तो लगाते विद्यादाता लेकिन मन में लड्डू फूटते ‘बुंदिया दाता’ के नाम की. प्रसाद में तो और भी चीजें होती थीं.


पौराणिक कथाओं पर अगर यकीन करें तो यही कहेंगे कि ऋषि-मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए भले ही किसी अप्सरा की जरूरत पड़ती रही हो, हम बच्चे तो बस केवड़े की खुशबू से तरबतर बुंदियों की मदहोशी में ही अपनी सुधबुध खो बैठते थे. कहने को तो प्रसाद में बैर, केला, मिश्रीकंद, गाजर, मक्को, केला, सेब, अमरूद और न जाने क्या क्या होता था. लेकिन किसमें इतनी कुव्वत जो बुंदिया की सल्तनत को डिगा सके.

मक्को

बुंदिया ही वह अप्सरा थी जिससे हमारी तपस्या भंग हो जाती थी. प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े प्रसाद की बाल्टी को कनखियों से निहारने का सुख अब कहां! हर साल अब भी जब मुहल्ले के बच्चे सरस्वती पूजा की मस्ती में डूबे होते हैं तो हम और हमारी उमर के ‘नौजवान’ अपने बचपन की यादों को ताजा कर लेते हैं, थोड़ी-सी बुंदियों से.

मिश्रीकंद,

डाइबिटीज तो अब आम बीमारी बन चुकी है. अपून भी इससे अछूते नहीं हैं. डॉक्टर की सख्त हिदायत के प्रति सम्मान भी है. पर पता नहीं क्यों, बुंदिया देखते ही मन आउट ऑफ कंट्रोल हो जाता है. ओठों को करके गोल थोड़ी-सी बुंदिया के स्वाद से स्वयं को तृप्त करने से रोक नहीं पाते हैं. बस मन को थोड़ी दिलासा दे लेते हैं कि ऑल इज वेल….ऑल इज वेल. उम्मीद करते हैं बुंदिया आपको भी बावला कर देता होगा. तो फिर एंज्वॉय बुंदिया. सरस्वती माता….बुंदिया दाता….सॉरी विद्यादाता…

बुंदिया

About Vimalendu Singh 144 Articles
आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम से पत्रकारिता का संक्रमण लगा. छात्रजीवन में स्वतंत्र रूप से लेखन. तदुपरांत नवभारत टाइम्स के 'हैलो दिल्ली' और 'शुभागमन' एवं दैनिक जागरण के 'नोयडा सिटी' 'जोश' एवं 'प्रॉपर्टी' के लिए दो वर्षों तक फीचर लेखन. 'विचार सारांश', 'मेरी संगिनी', 'द संडे इंडियन' 'चौथी दुनिया' में सब एडिटर, असिस्टेंट एडिटर, एसोसिएट एडिटर, डिप्टी एडिटर की जिम्मेवारी संभालने के बाद. ढाई वर्षों तक स्वतंत्र रूप से अनुवाद का कार्य. इंटरेस्ट का फील्ड आर्ट, कल्चर, ट्रेवल, फूड, कॅरियर वगैरह. ढाई वर्षों तक 'किलकारी', बिहार बाल भवन, मगध प्रमंडल, गया में प्रमंडल कार्यक्रम समन्वयक. संप्रति विगत एक साल से बिहार के सबसे प्रमुख वेब पोर्टल 'लाइव सिटीज' से जुड़कर कार्य. मुख्य अभिरूचि ट्रैवल, फोटोग्राफी, म्यूजिक, थियेटर

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