गणतंत्र दिवस विशेष : परेड तो आपने देखा होगा, क्या उसमें शामिल घोड़ों के बारे में जानते हैं?

लाइव​ सिटीज डेस्क : एक बार फिर शुक्रवार को पूरा देश 69वां गणतंत्र दिवस मनायेगा. 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं. इसी दिन हमारे देश के संविधान की रचना हुई थी और भारत पूर्णरूप से गणतांत्रिक देश बन गया था. गणतंत्र दिवस को लेकर बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में भी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. हर बार की तरह इस बार भी गांधी मैदान में बिहार के राज्यपाल झंडा फहराएंगे. मौके पर परेड का आयोजन होगा. वहीं दिल्ली के लाल किला पर राष्ट्रपति झंडा फहराएंगे और वहां भी परेड के साथ झांकियां भी निकलेंगी.

आपने भी गणतंत्र दिवस को लेकर कई तरह की तैयारियां की होंगी. वहीं आपके मन में भी परेड देखने की लालसा तो होगी ही. क्योंकि, 26 जनवरी के मौके पर होनेवाली परेड दुनियाभर में मशहूर है. गणतंत्र दिवस के अवसर आपको कई रोचक चीजें देखने को मिलती हैं. उन्हीं में परेड में शामिल होने वाले घोड़े भी हैं. शायद आप जानते होंगे कि 26 जनवरी के परेड के लिए किन घोड़ों को लगाया जाता है. अगर नहीं जानते हैं तो यहां आपको उन घोड़ों के बारे में बताते हैं?

गणतंत्र दिवस के मौके पर 61वें कैवेलरी घुड़सवार दस्ते का इस्तेमाल किया जाता है. भारतीय थलसेना के विभिन्न रेजिमेंट्स में शामिल 61वें कैवेलरे के घोड़ों की अनोखी विशिष्टता है. ये विश्व में एकमात्र अयांत्रिक घुड़सवार सेना है. थोड़ा इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि आधुनिक यंत्रीकृत युद्ध कला से पहले राजाओं व सम्राटों की शक्ति का अंदाज़ा उनकी घुड़सवार सेना को देखकर लगाया जाता था. मुग़ल शासन के दौरान भारत में प्रत्येक कुलीन का ओहदा उसके पास मौजूद घोड़ों की संख्या से तय होता था.

वहीं मुग़लकाल और 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय तक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी, जिस वक़्त अंग्रेज़ भारत से गये, तब सैन्य अस्तबलों में भारतीय रजवाड़ों की शाही टुकड़ियों के घोड़े ही बचे हुए थे. वहीं वर्ष 1951 में राज्यों की सेनाओं को भारतीय थलसेना से मिला दिया गया. इसके बाद करीब 4-5 घुड़सवार सेना की ईकाइयों का निर्माण हुआ.

1 अक्टूबर 1953 को ग्वालियर में न्यू हॉर्स्ड कैवेलरी रेजिमेंट के नाम से इसकी स्थापना की गई. साल 1954 जनवरी में इसका नाम बदलकर 61वीं कैवेलरी रेजिमेंट रख दिया गया. गौरतलब है कि 61वीं कैवेलरी भारत के विभिन्न सैन्य अकादमियों और घुड़सवार खेल जैसे पोलो, टेंट पेगिंग, शो-जंपिंग, ड्रेसेज और ट्रिक-सवारी में घुड़सवारी प्रशिक्षण का मुख्य आधार भी है.

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हम हैं आदित्य. फैन हैं. किसी आम इंसान के नहीं. भगवान के. वो भी ऐसे-वैसे भगवान नहीं. देवों के देव महादेव के. उनके जो इस सृष्टि के संचालक हैं. हां हम धार्मिक आदमी हैं. भगवान को मानते हैं. बम भोले-बम भोले का जाप करते हैं. कर्मठ व्यक्ति हैं. श्रम का महत्व समझते हैं. इसलिए उसे बचाकर खर्च करते हैं. देखने में ठीक-ठाक है. पर फिर भी खराब दिखते है. ये सखी कहती है. बाकी हमारी जिंदगी का एक्कै मकसद है. उस चीज को पाना, जिसे पाना मुश्किल हो. कहने को लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट है. फेसबुक पर प्रेम और फूड पर बहुत लिखते हैं. मगर जब कोई इनबॉक्स में आकर कहता है, आप अच्छा लिखते हैं. तो शर्माकर नीले हो जाते हैं. क्योंकि शिव का रंग भी, तो नीला ही है. बाकी की जानकारी मुझसे मिलकर ही पता की जा सकती है. हां मुझे समझने में आपको परेशानी हो सकती है. लेकिन ये मेरी नहीं आपकी दिक्कत है.

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