OMG! इस जगह लोग खाते हैं चींटी की चटनी, बाजार में 400 रुपए किलो तक बिकती हैं ये लाल चींटियां

लाइव सिटीज डेस्क : आप सभी ने आम की चटनी, अंचार और पता नहीं कितने तरह की चटनियों का स्वाद चखा होगा. लेकिन क्या आपने कभी चींटी की चटनी खाई है. अगर नहीं तो आज हम आपको चींटी की चटनी के बारे में बताने जा रहे हैं. झारखंड के कोल्हान में चींटी की चटनी बड़े चाव से खाई जाती है. यह आदिवासी समुदाय के खास व्यंजनों में शामिल है. यह चटनी करंज और आम के पेड़ के पत्तों पर पलने वाले लाल चींटों से बनाई जाती है.



चींटी की चटनी हाट बाजारों में 400 रुपए/किलो तक बिकती है. विशेषज्ञ अर्जुन सबर के अनुसार, लाल चींटियों से बनी यह चटनी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होती है. यह काफी खट्टा होता है. कच्ची इमली से भी 100 गुना अधिक.

विशेषज्ञों के अनुसार, फार्मिक एसिड की उपस्थिति के कारण इसमें खट्टापन आ जाता है, जिसमें औषधीय गुण समाए होते हैं. संथाल में लाल चींटों को ‘हाव’ और चाईबासा में ‘डेम्टा’ कहा जाता है. ‘डेम्टा’ का मुंदरी भाषा में अर्थ है चींटी. स्थानीय लोग ‘कुरकुट’ भी कहते हैं.

ये लाल चींटे गुड़ाबांदा और चाईबासा के जंगलों में दिसंबर से फरवरी तक पाए जाते हैं. ये ज्यादातर पत्तों पर ही अपना आशियाना बनाते हैं. अंडा भी वहीं देते हैं. इन्हें पकड़ने का तरीका पारंपरिक है. गमछे में पत्ते के साथ लाल चींटे को पकड़ा जाता है. मिर्च, धनिया और लहसुन के साथ सिलबट्टे या मिक्सर में चींटी पीस लिया और तैयार हो गई चटनी.

इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता. लाल चींटियों के लार्वा को भी लोग नमक और मिर्च के साथ चाव से खाते हैं. आदिवासियों का मानना है कि इससे कई बीमारियों में आराम मिलता है और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है.

विदेश में चींटियों पर हुए कई रिसर्च

ब्राजील, आस्ट्रेलिया, चीन, जर्मनी, वेस्ट अफ्रीका आदि देशों में शोध के बाद यह पाया गया कि इन चींटियों को फल के उद्यानों में प्राकृतिक जैविक कीटनाशक (बायोपेस्टि-साइड) के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

फलों के बगीचों में चींटियों को छोड़ा जाता है. इनके डर से फलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़े दूर रहते हैं. बारिश में बांस की झुरमुट में कोपलें खिलती हैं. आदिवासी इसे ‘बेबी बांस’, संथाल ‘हेलता’ भी कहते हैं. इससे कई तरह की सब्जी बनती है.

संथाली एलबम में अभिनय कर चुकीं करनडीह की साकरो हांसदा बताती हैं, इसे सहजन साग के साथ लहसुन मिर्च डालकर पकाया जाता है. इसमें रेशा नहीं होता. वहीं, लाल चींटों का अचार भी बनता है. साकरो को चींटी की चटनी अचार काफी पसंद है.