गठिया की वजह बन सकती है ज्यादा शराब-मांस का सेवन, लक्षण जानकर बचाएं खुदको

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प्रतीकात्मक फोटो

गठिया एक पीड़ादायक तथा जोड़ों की बीमारी है. यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है. देश में लगभग 90-95 फीसदी लोग इस बीमारी से किसी न किसी रूप में पीड़ित हैं. यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें दवा के साथ-साथ व्यायाम भी मुख्य भूमिका निभाते हैं.

गठिया जोड़ों की बीमारी है. प्रत्येक हड्डी के अंत में एक पतला तथा रबड़ की तरह लचीला पदार्थ होता है, जिसे कार्टिलेज कहते हैं. यह जोड़ों की हड्डियों को आपस मे रगड़ने से बचाती है. कार्टिलेज के अतिरिक्त पूरे जोड़ के चारों ओर पतला टिशू होता है, जिसे साइनोवियल मेम्ब्रेन कहते हैं. इस मेम्ब्रेन से एक तरल पदार्थ निकलता है, जो साइनोवियल फ्लूड कहलाता है. यह तरल पदार्थ जोड़ों को चिकना बनाये रखता है. जोड़ों की इसी विशिष्ट रचना के परिणामस्वरूप हम अपने पैरों पर चल पाते हैं. हाथ पैर को घुमा पाते हैं. यदि किसी कारणवश कार्टिलेज की चिकनाई खत्म हो जाती है तो जोड़ों की गति बाधित होने लगती है तथा रगड़ के कारण दर्द भी शुरू हो जाता है. कभी कभी झिल्ली पर सूजन भी आ जाती है.

रोग कारण : गठिया वात का सही कारण अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है. पर यह देखा गया है कि रोगी के माता-पिता में से किसी एक को यह रोग जरूर होता है. प्राइमरी गाउट एक अनुवांशिक विकार है. द्वितीयक गाउट अधिकतर हिमेटोलॉजिकल विकार के उपद्रव रूप में मिलता है. पोलिसायथिमिया, ल्यूकेमिया आदि में वह व्यक्ति जिनके परिवार में यह रोग पहले से ही होता है. अधिक शराब पीने, कोई चोट लगने या ऑपरेशन के बाद उनमें यह रोग शुरू हो जाता है.

यूरिक एसिड की टॉफी बनने के कारण – गुर्दों के द्वारा यूरिक एसिड पूर्ण रूप से शरीर में से निकल नहीं पाता, जिससे रक्त में इसकी मात्रा बढ़ती चली जाती है. इससे यूरिक एसिड के क्रिस्टल (टॉफी) बनकर कनेक्टिव टिशू में एकत्र हो जाते हैं.

अन्य सहायक कारण –

  • शीत-प्रधान प्रदेश या सीलन भरी जगह में रहना.
  • पसीना से तर शरीर में ठंढी हवा लग जाना.
  • अधिक मात्रा में मांसाहार, बहुत ज्यादा भोजन या मन्दाग्नि.
  • सीसा धातु वाली जगह पर काम करने से लेड पॉइजिनिंग के कारण.
  • यह बीमारी, ठंड, वसंत और वर्षा ऋतु में ज्यादा होती है और एक बार होकर आराम हो जाने के बाद फिर हो सकती है. पुरानी हो जाने पर हृदय औऱ गुर्दे पर असर पड़ता है.

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गठिया के सामान्य लक्षण – शुरू में पाचन संबंधी गड़बड़ी होती है. पेट फूलता है. अम्ल व गैस बनती है. भूख अच्छी तरह नहीं लगती. कब्ज रहती है. पेशाब कम मात्रा में गाढ़ा लाल होता है. नींद नहीं आती. कलेजा ज्यादा धड़कता है. इसके बाद अचानक किसी रात दर्द शुरू होता है. रोग वाली जगह गरम हो जाती है और जलन महसूस होती है.

पहले पांव की अंगूठे के अगले भाग की गांठ पर रोग का आक्रमण होता है. फिर एड़ी, गुल्फ-संधि, घुटने आदि पर फैल जाता है. रोगी की उम्र हमेशा 40 साल से ऊपर होती है. स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक पाया जाता है. यह रोग मुख्य रूप से हाथ व पैरों के छोटे जोड़ों में मिलता है. इस रोग का आक्रमण बार-बार होता है.

जोड़ों में सूजन, दर्द एवं फूलकर लाल हो जाता है. पुराने रोगियों में एक साथ बहुत-सी संधियों में तकलीफ होती है एवं वो मोटी हो जाती है. दर्द ज्यादा होने से रोगी अपने हाथ-पैरों को हिला नहीं पाता. गठिया का पहला आक्रमण अक्सर रात के समय होता है. रोगी आरामपूर्वक सोया हुआ होता है, परंतु अचानक हाथ-पैर के अंगूठे में तेज दर्द से उसकी आंखें खुल जाती है और सुबह होते-होते दर्द कम हो जाता है.

चिकित्सा –

  1. सामान्य चिकित्सा – रोगी को बिस्तर पर लिटा कर रखें. रोगी को ऐसी चीजें खाने से मना कर दें, जिनसे यूरिक एसिड बनती हो. रोज सुबह और तीसरे पहर 200 मि.ली. गरम पानी पीने से काफी राहत महसूस होती है. रोग की प्रारंभिक अवस्था में गरम दूध ही आहार के रूप में देना चाहिए. रोग की प्रबल अवस्था घटने पर पुराना चावल, रोटी, दूध, पनीर, छेना बगैरह दिया जा सकता है. फलों में अनार, अंगूर, आम, खजूर इत्यादि दे सकते हैं.
  2. इस रोग में चना, उडद, मांस, मूंग, साग, केला, दही, ठंडा पानी, पान, सुपारी, मद्यपान, अधिक परिश्रम, उपवास ऑर मैथुन इत्यादि निषेध है. रोगी को प्रोटीन वाली चीजें न दें. जैसे – पनीर, मांस-मछली.
  3. औषधीय चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सक से मिलकर प्रारम्भ करें.

इससे जुड़ी किसी भी तरह की समस्या के समाधान के लिए पटना के जाने-माने सेक्स रोग विशेषज्ञ डॉ. मधुरेन्दु पाण्डेय (बी.ए. एम.एस) से संपर्क किया जा सकता है. उनका कांटेक्ट नंबर है : 9431072749/9835081818. उनके क्लिनिक का पता है : मनोरमा मार्केट, बंगाली अखाड़ा, डी एन दास लेन, लंगर टोली, पटना-4, बिहार. आप इनकी ऑफिसियल वेबसाइट www.sexologistinpatna.com पर भी जाकर अपनी अप्वाइंटमेंट फिक्स करा सकते हैं.

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