दाऊद खां के किले में मुगलकालीन इतिहास जमींदोज

लाइव सिटीज डेस्क/औरंगाबाद (प्रियदर्शी) : मुगलकालीन इतिहास के कई ऐसे पन्ने जिसे आज भी खंगालने की जरुरत है, परन्तु मौजूदा सरकार अतीत की याद को जिन्दा रखने की जहमत उठाना नहीं चाहती है. यही कारण है कि मुगलिया इतिहास का एक स्वर्णिम काल आज जमींदोज हो रहा है और उस शख्स जिसके नाम पर आज दाउदनगर शहर की पहचान बनी है, उसी शहर में उसका किला प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बन अपनी बदहाली का किस्सा हर एक से बयां कर रहा है.
यह किस्सा मुगलिया सल्तनत के प्रसिद्द जहापनाह औरंगजेब के उस बहादुर सिपाही दाउद खां की है, जिसके द्वारा दाउदनगर में बनाया गया किला खंडहर में तब्दील हो अपनी बदहाली का दंश झेल रहा है. इतना ही नहीं विधान सभा में इस किले की बदहाली को दूर करने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियो द्वारा कई बार प्रश्न भी उठाये गए फिर भी सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की गयी.
औरंगाबाद जिले के दाउदनगर अनुमंडल के अनेक स्थानों पर मुगलकालीन इतिहास के कई अनगढ़े किस्से दफ़न हैं, परन्तु आज तक मुगलकालीन इतिहास की सभ्यता, संस्कृति एवं उसकी सामरिक महता को जानने की कोशिश न तो जिला प्रशासन ने ही की और न ही पुरातत्व विभाग एवं बिहार सरकार ने. मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के अतीत को अगर खंगालने की कोशिश की जाये तो यहाँ की मिटटी में कई पन्ने जमींदोज मिलेंगे.
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औरंगजेब के सिपहसलार  दाउद खां के नाम से बसा यह क्षेत्र अब शायद अपने अतीत को याद करने की जरुरत भी नहीं समझता यही कारण है कि इस जाबांज सिपहसलार के द्वारा निर्मित सैन्य छावनी प्रशासनिक एवं सरकारी उदासीनता के कारण खंडहर में तब्दील हो गया है.
मुग़ल शासक और औरंगजेब के शासन काल के दौरान जब रास्ट्रीय राजमार्ग संख्या -2 का वजूद नहीं था, तब कोलकत्ता से पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) जाने के रास्ते में अंक्षा परगना (वर्तमान में दाउदनगर का एक गाँव) में दबंग लूटेरो द्वारा राजस्व लूट लिए जाते थे, साथ ही साथ सटे सीमांत क्षेत्रो में मुग़ल साम्राज्य की विस्तार के लिए इमामगंज के कोठी कुंडा से लेकर पलामू तक का क्षेत्र औरंगजेब  ने दाउद खा को दिया.
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दाउद खां ने अपनी सैन्य क्षमता का परिचय देते हुए न सिर्फ कोठी कुंडा को अपने अधीन किया बल्कि पलामू फतह कर एक सर्वोच्च सेनानायक की उपाधि प्राप्त की. पलामू फतह के बाद औरंगजेब ने दाउद खां को यह क्षेत्र भेंट किया. मुग़ल काल में यह क्षेत्र अंछा परगना का सिलौटा-बखौरा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था. मुग़ल साम्राज्य की विस्तार को लेकर दाउद खां द्वारा यह क्षेत्र बसाया गया था, जो कालांतर में दाउदनगर के नाम से विख्यात हुआ.
वर्ष 1663 में दाउद खां ने इस सैन्य छावनी की नींव रखी जो 1673 में जाकर पूरी हुई. 10 एकड़ में फैली यह सैनिक छावनी उस वक्त सामरिक क्षमता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था. अपने जीवनकाल में जब तक दाउद खां यहाँ रहा और सैन्य संचालन का कार्य किया. किले में जमीन के नीचे सुरंग का निर्माण किया गया था और वह अन्दर-अन्दर काफी दूर तक फैला हुआ था.
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इन सुरंगों के माध्यम से सैनिक दुश्मनों से लड़ाइयाँ लड़ उन्हें पराजित करते थे. कालान्तर में मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद यह सैन्य छावनी स्थानीय लोगो के हाथो में चली गयी. कुछ मुस्लिम समुदाय के लोगो के द्वारा दाउद खां की याद को बरकरार रखने के उदेश्य से यहाँ नमाजे पढ़ी जाने लगी.
धीरे-धीरे यह परंपरा भी समाप्त होते गयी और लालची लोगो के द्वारा इसके आसपास की जमीने कब्जाई जाने लगी, यहाँ तक की इस किले के चहारदीवारी के ईंटों को भी चुरा लिया गया.
वक्त के थपेड़ो ने किले को अपने आगोश में ले लिया और आज यह किला पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो गया. धीरे-धीरे इसके वजूद पर संकट के बादल मडराने लगे और मुग़ल कालीन इतिहास के पन्नो को खोलने वाली यह धरोहर काल के गाल में समा रहा है.
जरुरत है इस पुरातत्व अवशेषों को बचाने और संवर्धित करने की परन्तु न तो इसके प्रति सरकार ही चिंतित है और न ही पुरातत्व विभाग.
किले की बदहाली एवं इसके अस्तित्व पर आये संकट को देखकर जनप्रतिनिधियों की नींद खुली ऐसे में इस धरोहर को बचाने की कवायदे शुरू हो गयी और इसकी चर्चा राजनीतिक गलियारे में भी गूंज उठी स्थानीय निर्दलीय विधायक सोमप्रकाश सिंह ने सदन के पटल पर किले की उपेक्षा से सम्बंधित सवाल भी उठाये और राज्य सरकार से पर्यटन के मानचित्र पर शामिल करने की मांग की.
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कुछ वर्ष पूर्व इसके सौन्दर्यीकरण को लेकर उत्सुकता दिखी और खंडहर हो चुके चहारदीवारी के लिए पर्यटन विभाग द्वारा 8 लाख रुपए मुहैया कराये गए, परन्तु ये रुपये स्थानीय प्रशासन ने चहारदीवारी निर्माण के लिए बिल्डिंग विभाग को सौंप अपने कर्तव्यों से इति श्री कर ली और कार्य हुए या नहीं इसको देखना मुनासिब भी नहीं समझा.
प्रशासन की उदासीनता का हश्र क्या हुआ यह उसकी बदहाली को देखकर समझा जा सकता है. यदि खंडहर में तब्दील हुए इस किले के जीर्णोधार को लेकर स्थानीय प्रशासन, पुरातत्व विभाग और सरकार अगर कृत संकल्पित होती है तो निसंदेह आने वाले दिनों में इसकी ख्याति फैलेगी और पर्यटक इसके अतीत से दो चार होंगे.