पुण्यतिथि : डाॅ. भीमराव आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन के वाहक

लाइव सिटीज डेस्क : संविधान निर्मात्री समिति के अध्यक्ष भारत रत्न डाॅ. भीमराव आंबेडकर की आज 61वीं पुण्यतिथि है. आज का दिन ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. भारतीय संविधान के जन्मदाता के साथ-साथ एक दलित नेता और समाज पुनरूत्थावादी और साथ ही एक विश्व स्तरीय विधिवेत्ता के रूप में पहचाने जाने वाले डाॅ. भीमराव अम्बेडकर को कौन नहीं जानता.



इनका जन्म 14 अप्रैल 1891 के दिन ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रान्त मध्यप्रदेश में स्थानीय नगर व सैन्य छावनी महू में हुआ था. अम्बेडकर जी रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14 वीं व अंतिम संतान थी. यह एक मराठी परिवार से थे. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपना सारा जीवन सदियों से उपेक्षित दबे कुचले मजलूम, कमजोर, गरीबों, दलितों और शोषितों के उत्थान के लिए लगा दिया. वह दलितों के मसीहा थे.

अम्बेडकर जी हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो उस समय एक अछूत जाति कही जाती थी और इसलिए सामाजिक और आर्थिक रूप से इनसे गहरा भेदभाव किया जाता था. डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे. उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी. उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया था.

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संविधान का निर्माण
अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी, जिसके कारण जब 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.

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29 अगस्त 1947 को अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया. अपने काम को पूरा करने के बाद अम्बेडकर ने कहा-मैं महसूस करता हूं कि संविधान साध्य (काम करने लायक) है यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके. वास्तव में मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अक्षम था.

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बौध्द धर्म की और आकर्षित
सन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये. पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे.

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1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया, दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये. 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की. उन्होंने अपने अंतिम लेख द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया. यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ.

महापरिनिर्वाण
1948 से अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे. जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे, इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे. राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई. 7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया.