विश्व एड्स दिवस: सतर्क रहें, सुरक्षित रहें

लाइव सिटीज डेस्क/समस्तीपुर : हर वर्ष 1 दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है. एड्स एक ख़तरनाक रोग है, मूलतः असुरक्षित यौन संबंध बनाने से एड्स के जीवाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. इस बीमारी का काफ़ी देर बाद पता चलता है और मरीज भी एचआईवी टेस्ट के प्रति सजग नहीं रहते, इसलिए अन्य बीमारी का भ्रम बना रहता है.



सरकार एवं स्वंयसेवी संस्थानो द्वारा लोगो में लगातार जागरूकता लाने के बावजूद भी एड्स जैसे जानलेवा बीमारी से पीड़ितो की संख्या में लगातार बढोतरी होती ही जा रही है. समस्तीपुर जिला भी इससे अछूता नहीं है. इस जिले को अब हाई रिस्क डेंजर जोन के रूप में घोषित कर दिया गया है. मरीजो की संख्या में लगातार बढोतरी होती जा रही है. स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक इस वर्ष ढाई सौ से अधिक मरीजो की संख्या में बढोतरी हुयी है.

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इस चालू वर्ष के पिछले महीने यानी अक्टूबर माह तक लगभग 20 हजार से अधिक लोगो की जांच-पड़ताल की गयी. इसमें 145 पुरूष 85 महिला एवं 20 से अधिक गर्भवती महिला एचआईवी ग्रसित पायी गयी है. यह एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है. इसको लेकर समस्तीपुर में एआरटी सेंटर की भी स्थापना की गयी है. जहां डेढ़ हजार से अधिक मरीजो का इलाज हो रहा है. यह सरकारी रिकार्ड है. लेकिन वस्तु स्थिति इससे भी कुछ अलग है.

एचाआईवी पीडित बहुत सारे ऐसे मरीज है जो समाज में लोक लज्जा के डर से अपना इलाज निजी क्लिनिको में करा रहे है. इनकी भी संख्या काफी अधिक बतायी गयी है. इसमें सबसे सोचनीय बात यह है कि एड्स पीडित मां-बाप के बच्चे भी जन्म लेने के समय से ही इस बीमारी से ग्रसित हो रहे है. इसके लिए जिला प्रशासन के स्वास्थ्य विभाग के अलावा स्वंयसेवी संस्थाओ द्वारा भी शहर से लेकर गांवो तक लोगो के बीच जागरूकता अभियान चला कर इस बीमारी से बचने के उपाय बताए जाते है. लेकिन मरीजो की संख्या में हो रही बढोतरी एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है.

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विश्व एड्स दिवस की शुरूआत 1 दिसम्बर 1988 को हुई थी. जिसका उद्देश्य, एचआईवी एड्स से ग्रसित लोगों की मदद करने के लिए धन जुटाना, लोगों में एड्स को रोकने के लिए जागरूकता फैलाना और एड्स से जुड़े मिथ को दूर करते हुए लोगों को शिक्षित करना था. दरअसल, विश्‍व एड्स दिवस आपको याद कराता है कि ये बीमारी अभी भी हमारे-आपके बीच है और इसे लगातार खत्म की कोशिशों में आपको भी आगे आना होगा.

भारत में एड्स
भारत में आज भी जिन्हें एड्स है वे यह बात स्वीकारने से कतराते हैं. इसकी वजह है घर में, समाज में होने वाला भेदभाव. कहीं न कहीं आज भी एचआईवी पॉजीटिव व्यक्तियों के प्रति भेदभाव की भावना रखी जाती है. यदि उनके प्रति समानता का व्यवहार किया जाए तो स्थिति और भी सुधर सकती है.

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बात अगर जागरूकता की करें तो लोग जागरूक जरूर हुए हैं, इसलिए आज इसके प्रति काउंसलिंग करवाने वालों की संख्या बढ़ी है. पर यह संख्या शहरी क्षेत्र के और मध्यम व उच्च आय वर्ग के लोगों तक ही सीमित है. निम्न वर्ग के लोगों में अभी भी जानकारी का अभाव है. इसलिए भी इस वर्ग में एचआईवी पॉजीटिव लोगों की संख्या अधिक है.

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जबकि बहुत सी संस्थाएँ निम्न आय वर्ग के लोगों में इस बात के प्रति जागरूकता अभियान चला रही हैं. लोग कारण को जानने के बाद भी सावधानियाँ नहीं बरतते. जिन कारणों से एड्स होता है उससे बचने के बजाए अनदेखा कर जाते हैं. इसमें अधिकांश लोग असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित रक्त के कारण एड्स की चपेट में आते हैं.

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सरकारी संस्थाएँ
एड्स के ख़िलाफ़ आज हर शहर में अनेक समाज सेवी और सरकारी संस्थाएँ कार्य कर रही हैं. इनका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना, एड्स के साथ जी रहे लोगों को समाज में उचित स्थान दिलाना, उनका उपचार कराना आदि है. इन संस्थाओं में से कुछ हैं फेमेली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया, विश्वास, भारतीय ग्रामीण महिला संघ, ज़िला स्तरीय नेटवर्क, वर्ल्ड विजन आदि शाखा सेक्सुअलिटी एजुकेशन, काउंसलिंग, रिसर्च, ट्रेनिंग/थैरेपी (एसईसीआरटी) परियोजना के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रही है.

संस्था किशोर बालक-बालिकाओं एवं युवाओं को किशोरावस्था, एड्स आदि के बारे में जानकारी देकर जागरूक बनाने का कार्य करती हैं. जागरूकता अभियान के तहत स्कूल-कॉलेज तो चुने ही जाते हैं पर जो लोग स्कूल-कॉलेज नहीं जाते उनके लिए कम्युनिटी प्रोग्राम या नुक्कड़ नाटक कर समझाया जाता है.