सेहत का राज : रमा सिन्हा 85 साल की उम्र में भी चबा लेती हैं चना

लाइव सिटीज डेस्क/बेगूसराय (विनोद कर्ण): जिसने जन्म लिया, उसकी मौत निश्चित है. हर कोई चाहता है कि मौत के समय बिस्तर न पकड़ना पड़े, स्वस्थ रह कर बीमारी का दंश झेलना नहीं पड़े. लेकिन, ऐसा हो नहीं पाता है. इसके लिए हम खुद भी जिम्मेदार हैं. सेहत के राज को लेकर बातचीत में बेगूसराय की रिटायर सिविल सर्जन डाॅ. रमा सिन्हा ने कई टिप्स दिये. 85 वर्ष पूरा करने के बाद भी डाॅ. सिन्हा घर में आराम से घूम लेती हैं. हालांकि अब उन्हें भी स्टिक की जरूरत पड़ गई है, लेकिन एक भी दांत टूटने की बात तो दूर हिला भी नहीं है. वे आराम से चना व मक्का का भूंजा खा लेती हैं.

begu1



क्या कहती हैं डाॅ. सिन्हा
उनका कहना है कि शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय सब अनुशासन से चलता है. लोग इसका पालन भी करते हैं, लेकिन खानपान व व्यायाम के पालन का अनुशासन भूल जाते हैं] जो बीमारी को आमंत्रित करता है. व्यायाम से शरीर के जितने जोड़ हैं, फ्री हो जाते हैं. सुबह में टहलना अच्छे व्यायाम की श्रेणी में आता है. सूर्योदय से पहले जगकर नित्यकर्म से निवृत होकर थोड़ा टहल लेने से शरीर व मन की ताजगी महसूस कर सकते हैं. इसे रूटीन में लाने की जरूरत. समय पर भोजन शरीर की जरूरत है. भोजन में समय का पालन निहायत जरूरी है.

डाॅ. सिन्हा की दिनचर्या है प्रेरणादायक
सबेरे जगती हैं. नित्यकर्म के बाद थोड़ा टहलना. स्कूल के समय ड्रील में सिखाया गया व्यायाम कुछ देर करने के बाद कुछ मिनटों का आराम. सात-साढ़े सात बजे तक तैयार होकर घंटे भर पेपर-मैग्जिन पढ़ना, 8 बजे एक सेब, 10 बजे नाश्ता, एक बजे भोजन, 6 बजे हल्का नाश्ता फिर रात के 9.30 बजे भोजन निर्धारित समय पर, 6.00 घंटे का शयन. यह रूटीन अपने सेवाकाल में भी रही.

साकारात्मक सोच से मिलती है उर्जा
उनका मानना है कि साकारात्मक सोच से उर्जा मिलती है. संतुलित भोजन के साथ आपकी सक्रियता रोग को दूर भगाती है. फैट व अधिक मसाला के भोजन से दूर रहे तो बेहतर. जीवन में जो मिला उससे संतोष करने से चिंता दूर रहती है. 6-8 घंटे की नींद जरूरी है.

23 वर्षों से ले रही पेंशन
1957 में डीएमसीएच, दरभंगा से एमबीबीएस करने के बाद सरकारी सेवा में आयीं. आम डाक्टर की तरह कभी निजी क्लीनिक नहीं खोला. समस्तीपुर, पूर्णिया, नालंदा, बेगूसराय आदि जगहों पर रहीं पदस्थापित. 1993 के फरवरी में सिविल सर्जन पद से सेवानिवृत हुई. अस्पताल में डीएस या सिविल सर्जन रहते किसी चिकित्सक की अनुपस्थिति में खुद मरीज को देखने पहुंचने को लेकर अलग पहचान बनायी.

सिलाई-कढ़ाई से आज भी है लगाव
तीन पुत्र व एक पुत्री की माता के पास आज नाती-पोता-पोती से घर भरा है. आर्थिक स्मृध्दि के बावजूद बच्चों के लिए स्वेटर या कपड़े की सिलाई- कटाई करने से परहेज नहीं करती. कहती हैं कि अपने को सक्रिय बनाये रखना जरूरी है.

यह भी पढ़ें- सेज की पत्तियों में है सेहत का राज़
मूंगफली खाएं, सेहत बनाएं