सत्तर वर्ष की उम्र में मुफ्त शिक्षा देकर बच्चों में जगा रहे शिक्षा की अलख

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गोपालगंज/बैकुंठपुर (हितेश कुमार वर्मा) : सच ही कहा गया है कि अच्छे कामों के लिए उम्र की कोई सीमा नही होती. इतिहास भी इसका गवाह है. वीर कुंवर सिंह और दशरथ मांझी ने उम्र की अधिकता के बाद भी अपनी कर्मठता के बल पर जो कर दिया वह दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया. ऐसी ही कुछ कर्मठता पंद्रह वर्षों से देखने को मिल रही है. बैकुंठपुर प्रखंड के उत्क्रमित उच्च विद्यालय लड़ौली में सत्तर वर्षीय मंसूर आलम नि:स्वार्थ भाव से शिक्षा का अलख जगा रहे है.

पन्द्रह साल से एक हजार से अधिक छात्र-छात्राओं के बीच मुफ्त शिक्षा दान कर उनका भविष्य बनाने में अपना प्रसंशनीय योगदान शिक्षित समाज के निर्माण में भरपूर दे रहे हैं. साथ ही सरकार की शैक्षणिक कमजोरियों को भी ढ़कने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. लडौली उच्चतर हाई स्कूल के पड़ोसी सीवान जिला के मुसेहरी गांव मे जन्में सत्तर वर्षीय मंसूर आलम की योग्यता आईएससी उस जमाने की है. फिर भी उन्हें टेन प्लस टू तक पढ़ाने में कही हिचकिचाहट नही होती है.

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अपग्रेड हाईस्कूल लड़ौली मे शिक्षकों के बहुतेरे पद रिक्त रहने के कारण मंसूर आलम विज्ञान के साथ हिन्दी, उर्दू  विषय भी पढाते हैं. इन्हे जरा भी हिचक नही होती, न बुढापा की वजह से कोई परेशानी हुई है. तनख्वाह और पैसो के लोभ से ऊपर उठकर शिक्षा दान इनका मुख्य उद्देश्य रहा है. उक्त विद्यालय मे कक्षा नौ से कक्षा बारहवीं तक एक हजार दो सौ छात्र छात्राएं नामांकित हैं. पर नियुक्त या नियोजित शिक्षकों की संख्या महज सात है.

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कक्षा नौ और दस के लिए पांच शिक्षक और कक्षा ग्यारहवीं बारहवीं के लिए महज दो शिक्षक नियोजित हैं. यानी एक कक्षा के लिए एक शिक्षक विषयवार शिक्षकों का घोर आभाव है. ग्यारहवीं और बारहवीं के लिए कोई विज्ञान का शिक्षक नही है. लेकिन वर्ष 2013 से हाई स्कूल का फार्म भी भरा जाता है, छात्र-छात्राएं पास भी होती हैं. राष्ट्रभाषा और संस्कृत की पढ़ाई तो होती ही नहीं, क्योंकि इस विषय मे शिक्षक ही नहीं है. बस सत्तर वर्षीय मंसूर आलम इस अनमोल शिक्षा की सरहद की रक्षा कर रहे हैं.