Birthday Special : 69 के लालू… नहीं होते तो क्या होता !

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लाइव सिटीज डेस्क (रुद्र प्रताप सिंह) : यह नहीं होता तो क्या होता? यह सवाल है तो सीधा—साधा, आसान सा जवाब हो सकता है कि कुछ न कुछ तो जरूर होता ही सही. अब सवाल को थोड़ा पलट दीजिए कि अगर लालू प्रसाद नहीं होते तो बिहार और देश की राजनीति का क्या होता? जवाब निश्चित रूप से अलग-अलग होंगे. विरोधी कहेंगे कि चारा घोटाला नहीं होता, एक घरेलू और कम पढ़ी—लिखी महिला सीएम नहीं बनती. दो-दो भाई एक साथ मिनिस्टर नहीं बनते. मीसा भारती सांसद नहीं बनतीं. इस तरह के जवाब की फेहरिस्त लंबी हो सकती है. लेकिन, यही सवाल अगर समाज के सबसे कमजोर तबके के लोगों से पूछा जाए तो उनका सीधा और सधा हुआ जवाब एक लाइन में मिल जाएगा कि अगर लालू नहीं होते तो आदमी होने के बावजूद उन्हें आदमी होने का अहसास नहीं होता.

सचमुच, यही एक लाइन वाला जवाब लालू प्रसाद को अपने समकालीन राजनेताओं से अलग करता है. यह बताता है कि कई मुद्दों पर बेहद नकारात्मक छवि के बावजूद वह देश के सबसे बड़े सोशल इंजीनियर हैं. समाज के अंतिम आदमी के उत्थान की बातें सिद्धांत के तौर पर लंबे समय से हो रही हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने का श्रेय लालू प्रसाद को जाता है.

वोट की ताकत

ऐसा नहीं है कि लालू प्रसाद के अभ्युदय से पहले लोगों को वोट की ताकत का अंदाजा नहीं था. था, खूब था. पर वोट हरण करने वाली ताकतें अधिक मजबूत थीं. लिहाजा, ताकतवर लोग बूथों पर कब्जा कर लेते थे. 1990 के बाद से इस पर रोक लगी. अब तो यह प्रवृत्ति खत्म ही हो गई है.

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आज के कई माननीय जो सांसद, विधायक और मंत्री बने हैं, उनके पुरखों ने लालू से पहले बैलेट की शक्ल नहीं देखी होगी. ये वही लोग हैं जिन्होंने 1995 के विधानसभा चुनाव में पहली बार मर्जी से वोट गिराया तो देश भर के लोग हैरत में पड़ गए. लालू ने मजाकिया लहजे में कहा-यह मेरा जिन्न है. बोतल से निकल गया है. अब कोई इसे बंद नहीं कर सकता है. विश्लेषकों ने इस जिन्न को अति पिछड़ी बिरादरी का नाम दिया. यह बिरादरी आज हाशिए से निकलकर मुख्यधारा में शामिल हो चुकी है. तभी तो महाबली पीएम नरेंद्र मोदी भी बड़ी शान से खुद को अति पिछड़ा बताते हैं.

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बराबरी का दर्जा

जीने के लिए पैसों की जरूरत होती है. लेकिन, कभी-कभी पैसे से अधिक जरूरी है कि जिन्दगी सम्मान और गरिमा से भरपूर हो. उस दौर को याद कीजिए, जब धन और ज्ञान के बावजूद लोगों को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता था. लालू जब सभाओं में डीएम को मंच पर बुलाकर जनता को अभिवादन करने का निर्देश देते थे. उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी. इस प्रक्रिया के तहत वे जनता के मन से हीन भाव निकालना चाहते थे. लालू बता रहे थे कि डेमोक्रेसी में मालिक का दर्जा डीएम को नहीं, जनता को हासिल है. लालू चाहते तो डीएम और जनता को संदेश देने के लिए कुछ अधिक परिमार्जित तरीका अपना सकते थे. लेकिन, उन्हें पता था कि संदेश देने के लिए यही तरीका श्रेष्ठ है. आलोचना की परवाह किए बिना वे अपने ढंग से जनता से संवाद करते रहे.

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बेमिसाल जीवट

कल्पना कीजिए कि कोई आदमी आज शीर्ष पर है. कल जेल जा रहा है. चेहरे पर शिकन नहीं है. कुछ साल बाद राजनीतिक हैसियत भी लगभग शून्य पर चली जाती है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ऐसा भी समय आया जब लालू परिवार का कोई भी सदस्य किसी सदन में नहीं था. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. साल भर बाद ही वे किंग मेकर की भूमिका में आ गए. भाजपा को परास्त करने का बिहार माॅडल पूरे देश में चर्चा का विषय है. बड़े-बड़े रणनीतिकार मान रहे हैं कि पूरे देश में बिहार माॅडल मतलब भाजपा के एक के मुकाबले विपक्ष का एक उम्मीदवार के फार्मूले से ही नरेंद्र मोदी को रोका जा सकता है. ये बताता है कि लालू सचमुच क्या हैं? वह नहीं होते तो क्या होता. वे हैं तो क्या कुछ हुआ?

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