जेल में जन्मे और 26 साल जेल में ही बिताए डॉ. यूपी सिंह ने, सबसे ज्यादा सर्जरी करने का है रिकॉर्ड

लाइव सिटीज डेस्क (राज विमल) : डॉक्टर यू.पी. सिंह… एक ऐसे प्रख्यात सर्जन सह प्रोफेसर जिनका जेल से गहरा रिश्ता रहा. न सिर्फ उनका जन्म जेल में हुआ बल्कि उनकी परवरिश भी जेल में ही हुई. इसलिए नहीं कि उनके माता-पिता कैदी थे, बल्कि इसलिए कि उनके पिता खुद जेलर थे. और तो और साल 1996 में एक केस के सिलसिले में उन्हें खुद भी जेल जाना पड़ा था.

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बिहार के इस सर्जन के नाम सबसे अधिक सर्जरी करने का रिकॉर्ड भी है. उन्हें न सिर्फ बिहार में सर्जरी करने का अनुभव है, बल्कि इन्होंने अपने काम से दुनिया भर में नाम कमाया है. उनके नाम देशभर में सबसे ज्यादा सर्जरी करने का रिकॉर्ड भी है.

डॉ. सिंह ने अपने जीवन के 26 साल जेल परिसर में ही बिताये, जब तक 1971 में वह दरभंगा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर नही बन गये. जेलर होने की वजह से उनके पिता का ट्रांसफर होता रहता था, तो उन्होंने कई जेल भी देखे. डॉ. सिंह बताते हैं कि जेल परिसर में आम कैदियों के बीच वो खुद को राजा जैसा समझते थे.

अपने बचपन के बारे में बात करते हुए डॉक्टर सिंह कहते हैं कि उनका जन्म 1945 में छपरा जेल में हुआ था. हालांकि उन्हें वहां का ज्यादा कुछ याद नहीं है. उन्होंने जब होश संभाला तबतक उनके पिता का ट्रांसफर हजारीबाग जेल में हो चुका था.

अपनी मां से सुने एक किस्से के बारे में वो बताते हैं – साल 1947 में भारत की आज़ादी के वक़्त देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे चल रहे थे. मेरे पिता उस समय छपरा जेल में जेलर थे. उन्होंने उस समय तीन मुस्लिम परिवारों को अपने घर में शरण दिया था.

वो कहते हैं – अपने घर में शरण दिए जाने के बाद उस खास दिन वो लोग हर साल मेरे घर आते रहे. यह सिलसिला मेरे 11 साल के होने तक जारी रहा.

अपनी मां से सुने एक और किस्से के बारे में वो कहते हैं – मेरे एक कजिन जिनका नाम कृष्णा था, वह बहुत ही शरारती थे. उस समय शांति बहाल करने के लिए अंग्रेजों की सेना फ्लैग मार्च कर रही थी. सेना के छपरा जेल से गुजरने के दौरान कृष्णा भैया जेल की चारदीवारी पर चढ़ गए और उन्हें देखकर पेशाब करने लगे. सेना के कप्तान ने इसे अपना अपमान माना और उन्हें पकड़ने आ गई.

‘ये देख कृष्णा भैया जल्दी से घर के अंदर घुस गए. ब्रिटिश सेना ने हमारे घर को चारों और से घेर लिया. उन्होंने हमारे पिताजी को उनके कार्यालय से बुलवाया, ताकि उनके सामने ही उनकी घर की तलाशी ले सकें. इसी बीच हमारे घर के कामों में हेल्प करने वाले जेल के एक कैदी ने भैया को गंदे कपड़ों के ढेर में घुसा लिया और उसे लेकर अंग्रेजी सेना के सामने से निकल गए.

अंग्रेजों ने हमारे घर की तलाशी ली और कुछ न मिलने के बाद माफी मांगते हुए चले गए. बाद में पिताजी ने उस कैदी को इस काम के लिए ईनाम भी दिया.

डॉ. सिंह कहते हैं कि बाद में मेरी मां और कृष्णा भैया मजाक में कहते थे कि उस कैदी को ‘अंग्रेजों के जमाने के जेलर’ ने ईनाम दिया.

आज 71 वर्ष के होने के बाद भी वह मरीजों का इलाज कर रहे है. डॉक्टर सिंह विगत 10 वर्षों से 4 अस्पतालों में सर्जरी कर रहे हैं.