जयप्रकाश नारायण जयंती : क्रांतिकारी व्यक्तित्व, जिन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता हिला दी

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लाइव सिटीज डेस्क : आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती है. जयप्रकाश नारायण को देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के लिए जाना जाता है और कहा जाता है कि उनके आंदोलन की वजह से इंदिरा गांधी के हाथ से सत्ता तक छिन गई थी. बिना किसी शासकीय पद पर आसीन हुए ह्रदय से क्रांतिकारी इस व्यक्तित्व का सार्वजनिक जीवन में उच्च स्थान था.

समाजवाद और सर्वोदय के प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ उनकी संसदीय प्रजातंत्र में पूरी निष्ठा थी. प्रभुसत्ता वाद के विरुद्ध लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनके संपूर्ण क्रांति के आह्वान ने भारतीय राजनीत में एक नये युग का सूत्रपात किया. आजादी की लड़ाई से 1977 तक आन्दोलन की मशाल थामने वाले जय प्रकाश नारायण का नाम देश के एक ऐसे शख्स के रूप में उभरता है, जिन्होंने अपने विचारो, दर्शन और व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की.

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सारण जिले के रिविलगंज प्रखंड मुख्यालय से दक्षिण दियरा क्षेत्र के सिताब दियारा के लाला टोला में हुई थी. बचपन में ही उनके गांव में प्लेग फैलने और नदी में हुए कटाव के कारण वे उत्तरप्रदेश के क्षेत्र में जा बसे जो आज जयप्रकाश नगर के नाम से जाना जाता है.

ऐसे शुरू हुई इंदिरा गांधी के खिलाफ क्रांति

इंदिरा गांधी के शासन के दौरान देश मंहगाई से लेकर कई बुनियादी आवश्यकतों की पूर्ति नहीं होने वाली दिक्कत से जूझ रहा था और लोग सत्ता के मद में खोई इंदिरा गांधी की सरकार से परेशान थे. उस वक्त जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखा और देश के बिगड़ते हालात के बारे में बताया. उसके बाद देश के अन्य सासंदों को भी पत्र लिखा और इंदिरा गांधी के कई फैसलों को लोकतांत्रिक खतरा बताया.

गुजरात से हुई शुरुआत

वहीं इंदिरा गांधी ने राज्यों की कांग्रेस सरकारों से चंदा लेने की मांग की. इस दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चीमन भाई से भी 10 लाख रुपये की मांग की थी और कोष बढ़ाने के लिए कई चीजों के दाम बढ़ा दिए गए. जिसके बाद प्रदेश में आंदोलन हुए और पुलिस की बर्बरता से कई आंदोलनकारी मारे गए. इस दौरान 24 जनवरी 1974 मुख्यमंत्री के इस्तीफे की तारीख तय कर दी गई. लेकिन चीमन भाई के रवैये से आंदोलन और भड़क गया. उसके बाद जयनारायण प्रकाश ने आंदोलन का समर्थन किया, जिसके बाद उन्हें गुजरात बुलाया गया.

बिहार में आंदोलन का प्रभाव

बिहार में भी गुजरात की तरह छात्रों ने आंदोलन किया और विधानसभा की ओर कूच किया. उसके बाद छात्रों के खिलाफ एक्शन लिया गया, गोलियां चलाई गई, जिसमें कई छात्र मारे गए और जेपी को आंदोलन की कमान संभालने की मांग की गई. हालांकि जेपी ने आंदोलन की कमान संभालने से पहले कहा कि इस आंदोलन में कोई भी व्यक्ति किसी भी पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए.

उसके बाद लोगों ने उनकी सभी मांग ली और राजनीतिक पार्टियो से जुड़े हुए छात्रों ने भी इस्तीफा देकर जेपी के साथ जाने का फैसला किया. इसमें कांग्रेस के भी कई छात्र शामिल थे और सभी छात्र बिहार छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले आंदोलन में कूद गए. इसके बाद जेपी ने अपने हाथ में आंदोलन की कमान ले ली और बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर से इस्तीफे की मांग की.

इस आंदोलन ने हिला दी सत्ता

8 अप्रैल 1974 को जयप्रकाश नारायण ने विरोध के लिए जुलूस निकाला, जिसमें सत्ता के खिलाफ आक्रोशित जनता ने हिस्सा लिया. इसमें हजारों ही नहीं लाखों लोगों ने भाग लिया और खुद जयप्रकाश नारायण ने इसकी अगुवाई की थी. जयप्रकाश नारायण के इस आंदोलन से इंदिरा गांधी के नीचे से सत्ता की जमीन खिसकने लगी और बाद में इंदिरा गांधी को विरोध का इतना सामना करना पड़ा कि उनके हाथ में सत्ता ज्यादा वक्त नहीं बची रही. जयप्रकाश नारायण ने आजादी के बाद ही नहीं, उससे पहले भी गांधी के साथ भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों को सफल बनाया था.

उनकी मृत्यु 8 अक्टूबर 1979 को पटना में हुआ. उनकी मृत्यु के बाद उनकी राजनीतिक विचारधारा आज भी हमें यानि हम भारत के लोगों को प्रेरित करती है. ये अलग बात है कि उनके नाम पर राजनीत करने वाले आज कहां से कहां पहुंच गए लेकिन आज भी उनका गांव जितना विकसित होना चाहिये, नहीं हो पाया है.

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