देश की आजादी के लिए लड़े पूर्वज, पुत्र-पौत्र लड़ रहे रोटी की जंग 

gopalganj

गोपालगंज/बैकुंठपुर (हितेश कुमार वर्मा) : जंग-ए-आजादी की लड़ाई लड़ कर जिन सेनानियों ने अंग्रेजों को नाको चना चबवाने पर मजबूर कर दिया था, हमारे उन्हीं वीर सपूतों के परिजन आज भी रोटी की जंग लड़ रहे. इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के भय से जहां अंग्रेजों का रूह कापंता था वहीं आज इस आजाद भारत में उनके पुत्र एवं पौत्र रोटी की जंग लड़ रहे है. इस गांव के कोई एक सेनानी नही बल्कि पूरे गांव से ही कई वीर सपूतो ने आजादी में अपना स्वर्णिम योगदान दिया था.

यह ऐतिहासिक गांव है जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर बैकुंठपुर के जगदीश पुर पंचायत का बसंहा गांव. यह गांव आज की जंग-ए-आजादी की दास्तान सुनाती है. जिस गांव में बाबुराम शर्मा, काली चरण शर्मा, बुनिलाल शर्मा, एवं सुदामा ठाकुर वीर सपूतों ने मिलकर 1942 में अंग्रेजों से ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. हथौड़ा अभियान चला कर बसंहा-झंझरी रेल पुल को उखाड़ फेंका तथा सड़क   मार्ग अवरुद्ध कर दिया था. आजादी के इन दीवानों ने अंग्रेजो के नाक में दम कर दिया. यातायात बंद होने से अंग्रेजो पर शामत आ गई. अंग्रेज अफसर बौखला कर जंगे आजादी के उन वीर सपूतों के कुनबे पर हमला कर दिया.

gopalganj

स्वतंत्रता सेनानियों के घरो में आग लगा दिए गये. पूरे गांव में त्राहिमाम होने लगा और अंततः आजादी के इन चारो दीवानों को जेल जाना पड़ा. तब जाकर अग्रेजो ने गांव के लोगों को चैन की साँस लेने दी. इनका जंग अंत तक जारी, रहा देश आजाद हो गया. लेकिन इनके परिजन आज भी रोटी की जंग लड़ रहे हैं. बुन्नीलाल शर्मा को तो एक अदद घर तक नहीं है, जहां वह अपना गुजारा कर सके. यहीं तक नहीं, स्वतंत्रता सेनानियों के इस गांव में कोई बुनयादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है. बहरहाल जो भी हो लेकिन जंग अभी भी जारी है. फर्क सिर्फ इतना है कि वह देश की आजादी के लिए था और यह रोटी के लिये है.

यह भी पढ़ें – सत्तर वर्ष की उम्र में मुफ्त शिक्षा देकर बच्चों में जगा रहे शिक्षा की अलख
तीन साल का नजीब करता है योग, घर में पैरेंट्स दे रहें शिक्षा