मैट्रिक परीक्षा में थर्ड रैंकर हर्षिता बनना चाहती हैं IAS, पिता को मानती हैं आइडियल

अरवल (राकेश कुमार) :  मैट्रिक की परीक्षा में बिहार में तीसरा स्थान लाने वाली हर्षिता कुमारी आईएएस बनकर देश और समाज की सेवा करना चाहती हैं. पेशे से नागपुर में टेक्सटाइल इंजीनियर के पद पर कार्यरत दिनेश सिंह की पुत्री हर्षिता सिमुलतला विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा देकर टॉपर बनी हैं. अरवल जिले के करपी प्रखंड क्षेत्र के बालाबीघा गांव के निवासी दिनेश सिंह अपनी बेटी की सफलता पर खुशी से फूले नहीं समा रहे. पूरे परिवार में खुशियों की लहर है. टॉपर हर्षिता ने इस सफलता से प्रेरणा लेकर आईएएस बनने का इच्छा पाल रखी है.

बचपन से ही पढ़ने में तेज हर्षिता ने बताया कि लगातार कोशिश और कड़ी मेहनत ही उसकी सफलता का राज है. अपने पिता को आदर्श मानने वाली हर्षिता ने बताया कि उनके पिता का संघर्ष उसके लिए हमेशा प्रेरणा बना रहा. जिस तरह से उनके पिता छोटे से गांव में पढ़ाई और मेहनत के बलबूते इंजीनियर के पद पर पहुंचे वो हमेशा प्रेरणादाई रहेगा. जब कभी भी माता-पिता के साथ घर में बैठते थे पिताजी अपने संघर्षों की कहानियां सुनाकर हम लोगों को प्रेरित करते रहते थे. उसी का प्रतिफल है कि हमें आईएएस बनने की इच्छा जागृत हुई. जिसके कारण मन लगाकर पढ़ाई करना शुरू किया. परिणाम स्वरुप सफलताएं अपने आप मिलती रहे. लेकिन यहां सफलता महज एक आंशिक सफलता है मूल उद्देश्य UPSC एग्जाम में सफलता हासिल करना है. जिसके लिए अनवरत प्रयास करती रहूंगी.

अपनी पुत्री की सफलता से अभिभूत दिनेश सिंह ने बताया कि उनकी बेटी पढ़ने के प्रति काफी ध्यान देती थी. हम एक साधारण परिवार से संबंध रखते हैं. अरवल जिले के एक छोटे से गांव में बहुत संघर्षों के बाद पढ़ाई कर इंजीनियर का पद हासिल किया. ऐसे में हमारी इच्छा थी कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें. हमारे पढ़ने के समय घर की आर्थिक स्थिति काफी बदहाल था. ऐसे में हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सके, यह हमें हमेशा सताता रहता है. इसी टीस की वजह से मैं अपने बच्चों को वह सारी सुविधाएं प्रदान करना चाहा जिससे उसके पढ़ने लिखने में कोई दिक्कत न हो. पढ़ लिखकर अपने-सपने के अनुरूप पद हासिल कर सकें.

उन्होंने कहा कि आज जब हर्षिता मैट्रिक के परीक्षा में थर्ड टॉपर बनी तो इस बात की खुशी जरूर हुई कि अपने सपने तो पूरे नहीं हो सके लेकिन कम से कम अपनी औलाद के सपनों को पूरा करने का मेरा प्रयास कुछ हद तक सार्थक हुआ है. हर्षिता की सफलता से एक और जहां परिवार में खुशियां हैं वहीं उसके गांव बालाविघा मे भी लोग खुशियां मना रहे है.

ग्रामीणों ने बताया कि उस समय जब इस गांव में पढ़ाई लिखाई का कोई माहौल नहीं था ऐसे में इसके पिता इंजीनियर बने थे. जो गांव के लिए गर्व की बात थी. वहीं आज उसकी बेटी ने बिहार में तीसरा स्थान हासिल कर एक बार फिर से ग्रामीणों को फक्र का एहसास कराया है. हालांकि इधर कुछ वर्षों से गांव आना जाना इस परिवार के लिए बहुत कम होता है फिर भी गांव की मीट्टी से आज तक जुड़े हैं.

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