बापू के सपनों को साकार कर रही बुचेया की आधी आबादी

गोपालगंज (त्रिभुवन नाथ मिश्रा) : देश की आजादी से लेकर स्वदेशी वस्त्र पहनाने तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अविस्मरणीय योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. बापू के गांव के उत्थान के लिए जो सपने सजाये थे. लेकिन इस  हाईटेक युग में जहाँ लोग स्वदेशी छोड़ विदेशी वस्त्र संस्कृति एवं संस्कार को अपनाने में लगे है, वहीं गोपालगंज के सिधवलिया प्रखण्ड के बुचेया गांव की आधी आबादी बापू के आदर्श सपनों को साकार करने में अपना स्वर्णिम योगदान दे रही है.

ये हुनरमंद महिलायें हथकरघा चला कर स्वदेशी वस्त्रों का निर्माण करती है तथा उसे खादी ग्रामोद्योग संस्थान को बेचती है. बुचेया गांव की लगभग 50 से ज्यादा महिलाएं इस पुनीत कार्य में लगी हुई है. जो एक तरफ चरखा चलाकर अपने परिवार का भरणपोषण कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ अपने बच्चों को बेहतर तालीम दिलवाने के लिए अच्छे स्कूलों में पढ़ा रही है. बुचेया गाँव की शीला देवी कहती है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चिंतन और उनके स्वदेशी निर्माण को इस युग के हाइटेक सिस्टम ने पीछे छोड़ दिया है. पर आज भी उनके स्वदेशी निर्माण का सपना हमलोगों को यानि आधी आबादी को ही साकार करना है.

सूत काटने के काम में मशगूल द्रौपदी देवी से जब बात की तो उन्होंने कहा कि देश के हर क्षेत्र में आज महिलाएं आगे निकल रही है. वह शिक्षा का हो, चाहे सेवा या फिर तकनीकी का हो, हर परिदृश्य में महिलाएं इस समय में आगे है. इसीलिए हमलोगों ने बुचेया गाँव की महिलाओं को सामाजिक लोक-लाज और पर्दा से दूर होकर स्वदेशी वस्त्र के सपने को साकार करने में अपना सर्वस्व लगा रखा है. पर गांधी के सपनों को साकार बनाने की हिम्मत रखनेवाली इन महिलाओं के सामने आर्थिक विपन्नता की समस्या थोड़ी बहुत आती ही रहती है.

हालांकि गांधी के सपने को साकार करने वाली इन महिलाओं को जरूरत है सरकारी सहयोग, प्रोत्साहन एवं संसाधनों की. जिसके जरिए ये देश के कोने-कोने तक गाँधी जी के स्वदेशी अभियान को एक दिशा दे सके तथा वैसी महिलाओं को एक संदेश दे सके जो महिला होने की रोना रो कर अपने आपको कोसती है. आज बुचेया गांव की महिलायें अपने दम पर हथकरघा चलाकर स्वदेशी वस्त्र निर्माण का जो हुनर दिखाया है. वह पूरे समाज के लिए काबिले तारीफ़ ही नहीं अनुसरण करने का विषय है.

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