पटना में शुरू हो रहा है ‘रोटी बैंक,’ गरीब अब भूखे नहीं सोएंगे !

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लाइव सिटीज डेस्क :  हम अपने घरों में सुख-सुविधाओं के बीच भी अक्सर परेशान रहते हैं. क्या आपने कभी उनकी परेशानियों के बारे में सोचा है जो बेघर हैं, बजुर्ग हैं, अपंग हैं, लाचार हैं, बीमार हैं? कभी उनके कष्टों की कल्पना की जिनका कोई अपना नहीं है. जिनकी कोई आमदनी नहीं है और जिनके पास खानेपीने का कोई साधन नहीं है? ऐसे लोग जिन्हें परिस्थिति ने खुले आसमान के नीचे जीवन व्यतीत करने को विवश कर दिया है.

किसी भी शहर में आप रात में सड़कों से होकर गुजरिए, आपको हजारों लोग सड़कों के किनारे, फुटपाथ पर, रोड के डिवाइडर पर, कूड़े-कचरों के ढेर के बीच रात गुजारते नजर आ जाएंगे. क्या आपके मन में कभी यह खयाल आया है कि इनकी जरूरतें कैसे पूरी हो पाती होंगी या इनका पेट कैसे भर पाता होगा? इनके पेट भरने की बात छोड़ि़ए, हकीकत यह है कि अनाज का दो दाना भी इन्हें दूसरों की दया से ही नसीब हो पाता है.

कुछ मिला तो मिला वरना बस फाकाकशी. सिर्फ पटना में ही ऐसे हजारों लोग होंगे जिनके पेट में तभी कुछ जा पाता है जब दूसरे इन्हें कुछ देते हैं. इन्हीं बदनसीबों को भी दो रोटी नसीब कराने के उद्देश्य से ही ऋषिकेश नारायण सिंह ने ‘रोटी बैंक’ आरंभ करने की मुहिम शुरू की है. 15 जून से इसकी औपचारिक शुरूआत की जा रही है.

बिहारवासियों के लिए ऋषिकेश जाना-पहचाना नाम है. अपने करीबी लोगों के बीच ऋषि के नाम से पुकारे जाने वाले ऋषिकेश ‘बिहार यूथ फोर्स’ के नाम से एक स्वैच्छिक संगठन चलाते हैं.  यह विशुद्ध रूप से एक गैर राजनीतिक मंच है और पूरी तरह से सामाजिक कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध है. ऋषि के बारे में अगर आप नहीं जानते हैं तो आपको बता दें कि वह पटना में बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा केंद्र ‘ज्ञानशाला’ संचालित करते हैं जहां फुटपाथ पर रहने वाले गरीब मेहनतकश लोगों, कूड़ा—कचरा बीनने वालों के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है.

कर्इ् बच्चे जो स्वयं भी कूड़ा बीना करते थे और जिन्हें नशे की लत थी, यहां आकर न केवल नशा छोड़ चुके हैं बल्कि पठन—पाठन से रिश्ता जोड़ चुके हैं. ‘ज्ञानशाला’ के केंद्र अभी दो जगहों पर संचालित किए जा रहे हैं. एक अदालतगंज में और दूसरा, अशोक राजपथ पर खुदाबख्श ओरियंटल पब्लिक लाइब्रेरी के पीछे. इसके अलावा ऋषि दान दी गई पुस्तकों से ज्ञानशाला बुक बैंक भी संचालित कर रहे हैं. जरूरतमंद शिक्षण संस्थानों को यहां से नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं ?

आखिर रोटी बैंक आरंभ की बात दिमाग में कैसे आई? ऋषिकेश कहते हैं. देश के कई शहरों में रोटी बैंक संचालित किए जा रहे हैं. 2015 में मुंबई में डब्बावालों ने इसे शुरू किया था. इस बीच, मैंने कुछ लघु फिल्मों और वृत्तचित्रों में देखा कि कैसे उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के लोगों को भूखे—प्यासे रहना पड़ रहा है. मैंने यूट्यूब पर भी देखा कि कैसे डब्बा वालों ने जरूरतमंदों के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित किकी. मैं अक्सर पटना में देखता हूं कि कितने लोगों को हर दिन भूखे रह जाना पड़ता है. लेकिन एक वाकया ने मुझे बेचैन और इस बारे में मुझे सोचने को मजबूर कर दिया.

वाकया प्रकाश पर्व के समय का है. मेरी नजर एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो कचरों में से जूठन निकाल कर खा रहा था. कहते हैं न ‘बुभुक्षित: किं न करोति पापम!’   मेरे मन में आया कि यह भूख ही है जो व्यक्ति को ऐसा करने को मजबूर कर रहा है. तभी मेरे मन में जरूरतमंदों के लिए ‘रोटी बैंक’ आरंभ करने का विचार मन में आया और इसके बाद ही मैंने इसके लिए कोशिशें शुरू कर दीं.

आखिर कहां से जुटाएंगे रोटी और किसे बांटेंगे? ऋषि कहते हैं, ‘हमने विभिन्न अपार्टमेंट / सोसाइटी में रहने वाले परिवारों से संपर्क किया है. कुछ ने असमर्थता जताई तो कुछ सहर्ष इस अभियान का हिस्सा बनने को तैयार हो गए. कुछ तो अब स्वयं फोनकर के इस अभियान से जुड़ने की पहल कर रहे हैं. हमने एक ह्वाट्सएप नंबर 7050209999 सार्वजनिक किया है जिस पर लोग संपर्क करते हैं और लगातार कर रहे हैं. जो लोग इस अभियान से जुड़ना चाहते हैं बेहिचक हमें कॉल कर सकते हैं. ‘रोटी बैंक’ टीम के सदस्य उनसे संपर्क करेंगे. उन्हें एक फॉर्म भरना होगा इसके बाद वे इस अभियान से जुड़ जाएंगे. टीम के कार्यकर्ताओं उनसे संपर्क कर रोटी इकट्टी करेंगे और फिर उसे जरूरतमंदों के बीच वितरित कर दिया जाएगा.

अनुरोध बस इतना है कि लोग जो भी दें, वह फ्रेश हो. कोई भी रोटी, सब्जी या अचार कुछ भी उपलब्ध करा सकते हैं. इस अभियान से केवल पंजीकृत व्यक्ति ही जुड़ सकते हैं. यह बाध्यता है. हम किसी का भी दिया कुछ भी नहीं स्वीकार करने जा रहे हैं. पंजीकरण से यह पता चल पाएगा कि दान का भोजन कहां से आ रहा है. ऐसा दान दिए गए भोजन की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है. खराब खाना फूड प्वॉयजनिंग का कारण हो सकता है और इसे खाने वाले परेशानी में पड़ सकते हैं. हम ऐसा न चाहेंगे. हम सीमित स्तर पर ही यह अभियान चलाएंगे लेकिन सब कुछ मुकम्मल हो, यह अवश्य सुनिश्चित करेंगे.’

ऋषि आरंभ में सिर्फ बोरिंग रोड और गांधी मैदान इलाके से ही फूड कलेक्ट कर रहे हैं. और भोजन का वितरण भी पीएमसीएच, गांधी मैदान और स्टेशन के इलाकों में ही करने जा रहे हैं. आरंभ में कम से कम 100 लोगों को भोजन उपलब्ध करा पाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन धीरे—धीरे इसे और भी व्यापक और विस्तत्रत किया जाएगा. ऋषि कहते हैं, ‘कई लोग हमसे संपर्क कर कहते हैं कि हमारे यहां पार्टी थी. अब कोई खाने वाला नहीं है और खाना बच गया है.

आप आकर ले जाइए या मंगवा लीजिए. हम ऐसे खाना नहीं ले सकते हैं. आपके लोकप्रिय पोर्टल #LIVE_CITIES के माध्यम से हम ऐसे लोगों से गुजारिश करते हैं कि आप हमें पहले से इसकी सूचना दे दीजिए कि हमारे यहां पार्टी है और यहां से खाना आप ले जा सकते हैं. फिर हम खाना संग्रह करने की व्यवस्था कर लेंगे. लेकिन खाना बच जाने के बाद अगर आप सूचित करेंगे तो उसे मंगवा पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा.

ऐसे लोगों से मेरी विनती है कि कोई जरूरी नहीं कि आप खाना ‘रोटी बैंक’ को ही उपलब्ध करवाएं. आप अपने आसपास ही जरूरतमंदों के बीच खाना वितरित करवा दें. मकसद भूखों को भोजन उपलब्ध कराना है. इस काम को कहीं भी और कोई भी अंजाम दे सकता है. बस खाना खाने के योग्य  होना चाहिए. बासी और खराब हो चुका खाना किसी को खाने मत दीजिए. जो खाना कोई स्वयं नहीं खा सकता वह दूसरों को खाने के लिए देना बिल्कुल सही नहीं है.

ऋषि कहते हैं कि कई उत्सव हॉल, बैंक्वेट हॉल के संचालकों ने भी हमसे संपर्क किया है और इस पवित्र अभियान से स्वयं को जोड़ने की इच्छा व्यक्त की है. कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा है कि हम इस बात की भी निगरानी करेंगे कि भोज या पार्टी में लोग खाना बर्बाद न करें. थाली में कोई जूठन न छोड़े. आप जितना खा सकते हैं, अवश्य लें लेकिन खाना लेकर जूठन छोड़ना ठीक नहीं, क्योंकि यह खाना किसी भूखे को त़ृप्ति दे सकता है. लोग ऐसा करके देखें, यकीन मानिए उन्हें भी इससे खुशी मिलेगी.

रोटी बैंक की योजना शुरू करना तो अच्छी बात है लेकिन क्या यह अपरोक्ष रूप से भिक्षावृत्ति और बेगारी को बढावा नहीं देगा? इस आशंका को ऋषि सिरे से खारिज करते हैं. वह कहते हैं,  ‘हमारी कोशिश यह होगी कि केवल वास्तविक / जरूरतमंद लोगों को ही हम भोजन उपलब्ध  करा सकें. भिक्षाटन को प्रोत्साहित करने का इरादा जरा भी नहीं है. फुटपाथ पर रहने वाले ऐसे लोगों को इससे दूर रखने की कोशिश की जाएगी जो नशेड़ी और निहायत ही निठल्ले हैं.

शारीरिक रूप से सक्षम होने के बावजूद कामचोरी करने वाले और मांग—चांगकर गुजारा करने वालों के लिए हमारा अभियान बिल्कुल ही नहीं है. हम उनके लिए काम करने जा रहे हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम, बुजुर्ग, लाचार और बीमार हैं. जिन्हें अगर रोटी न उपलब्ध कराई जाए तो उन्हें भूखे पेट ही रहना पड़ता है. हमारी कोशिश होगी कि हम उन तक हम दो रोटियां पहुंचा सकें. अभी हम पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास अशोक राजपथ से इस अभियान की शुरूआत करेंगे और पटना जंक्शन तक कवर करेंगे.

आगे इसको विस्तार देने की योजना पर ऋषि कहते हैं, ‘इस अभियान से स्कूली बच्चों को भी जोड़ने की कोशिश में हूं. कुछ स्कूल ने पॉजिटिव रेस्पांस दिया है. हम स्कूल से अनुरोध करते हैं कि वे बच्चों को जूठन न छोड़ने और खाना बर्बाद न करने को प्रोत्साहित करें. बचा खाना दान कर देना ठीक बात है. स्कूल उन्हें भोजन की बर्बादी रोकने और अन्न किसी को देने के लिए प्रेरित कर सकता है. बच्चे दान में खाना न भी दें लेकिन अगर उनमें अन्न की बर्बादी रोकने और भूखों के प्रति मन में संवेदनशीलता जगती है तो यह बड़ी बात होगी.

इस अभियान से जुड़ने की खातिर लोगों की पहल पर ऋषि कहते हैं कि कई लोग उत्साह में हमसे संपर्क करते हैं. मेरी उनसे विनती है कि आप ऐसा अगर नियमित तौर पर कर सकते हैं तो इससे अच्छी बात कुछ हो ही नहीं सकती है. संकल्प ऐसा करें जिसे आप पूरा कर पाएं. अगर आप प्रतिदिन रोटी बैंक को दो रोटी दे पाने में सक्षम न हों तो भी कोई बात नहीं है. आप अपने स्तर से ही किसी भूखे को खाना दे दें. इतना ही काफी है. व्यक्तिगत प्रयास भी सामूहिक प्रयास का ही लघु रूप है. वाकई़ ऋषि ने जो मुहिम छेड़ी है उसके व्यापक निहितार्थ हैं.

इस मुहिम को कामयाबी मिले और भूखों को निवाला मिल सके, यही कामना है.