अमेरिका में भारतीय संस्कृति का परचम लहरायेंगे चम्पारण के लाल संजीव

बेतिया (प्रशांत सौरभ): भारत ने सभ्यता और संस्कृति के दम पर विश्व को हमेशा ही नई राह प्रदान की है. संपूर्ण विश्व में भारत को विश्वगुरु यूं ही नहीं माना जाता रहा है. बात चाहें इतिहास की हो या वर्तमान की, सभ्यता और संस्कृति के मामले में भारत विश्व में हमेशा अग्रणी रहा है. यूं तो भारत का चप्पा-चप्पा अपनी संस्कृति और अपनी विरासत के लिए जाना जाता रहा है लेकिन भारत की इस सांस्कृतिक विरासत में चंपारण का स्थान काफी महत्वपूर्ण है.

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चंपारण के बिना भारत के सांस्कृतिक विरासत की कल्पना अधूरी प्रतीत होती है. सत्याग्रह आंदोलन हो या इतिहास के कई विभिन्न घटनाक्रम, कई ऐसे मौके आए हैं जब चंपारण के निवासियों ने अपने परिश्रम और प्रतिभा के दम पर पूरे विश्व में भारत का नाम ऊंचा किया है. भारतीय संस्कृति का नाम पूरे विश्व में ऊंचा करने के मामले में इन दिनों चंपारण के एक ऐसे ही लाल संजीव कुमार राय का नाम सामने आया है जो अमेरिका के हजारों नागरिकों के आग्रह पर संस्कृत पढ़ाने अमेरिका जा रहे हैं. बता दें कि संजीव संस्कृत के लिये काम करने वाली संघ की संस्था संस्कृत भारती के लिये काम करते हैं और अभी अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य हैं. साथ ही उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय संगठन मंत्री का दायित्व भी चंपारण के इस लाल के कंधों पर है.

अभी अमेरिका में संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों के लिये जाह्नवी और वितस्ता नाम के दो वर्ग लगाए जा रहे हैं. इन शिविरों में वे लोग आते हैं जो अमेरिका में संस्कृत शिविर चलाते हैं. इनके प्रशिक्षण हेतु संजीव अमेरिका जाएंगे, इसके अतिरिक्त न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, सिएटल, न्यू जर्सी और बोस्टन समेत कई जगहों पर सांख्य दर्शन का विशेष प्रशिक्षण और प्रबोधन हेतु संजीव को अमेरिकी लोगों ने आमंत्रित किया है. अभी पिछले वर्ष ही संस्कृत पढ़ाने संजीव दुबई गये थे, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने संस्कृत शिविर में हिस्सा लिया था.

बता दें कि मझौलिया प्रखंड स्थित दुधा मठिया के संजीव राय ने 1988 में बेतिया के ही राज स्कूल से मैट्रिक ,फिर एमजेके कॉलेज से इंटर और वहीं से 1993 में स्नातक किया. फिर शिक्षाशास्त्री की पढ़ाई करने लखनऊ चले गए, इसी दौरान संघ के संपर्क में आए और 1996 में संघ के संगठन संस्कृत भारती के प्रचारक बनकर जुड़ गए. 2000 तक कई दायित्वों की जिम्मेवारी इनके ऊपर आ गई.

फिर संघ की प्रेरणा से ही सन् 2000 में आगे की पढ़ाई के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में नामांकन कराया. बीएचयू से आचार्य की पढ़ाई की, इस दौरान आचार्य की कक्षा में तीन गोल्ड मेडल प्राप्त किए. संजीव की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस वर्ष इन्होंने आचार्य की परीक्षा पास की उस वर्ष बीएचयू में सर्वाधिक अंकों का प्रतिशत इन्हीं का रहा था ,जिस चलते इन्हें बीएचयू गोल्ड मेडल भी मिला था. इसके बाद वहीं से इन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी भी की.

संजीव ने बताया कि इन दिनों अमेरिका में संस्कृत का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है लिहाजा वहां बहुत अधिक संख्या में संस्कृत शिविर चल रहे हैं. अमेरिका में लोगों की रुचि आध्यात्मिक क्षेत्र में इन दिनों तेजी से बढ़ी है, लिहाजा संस्कृत का महत्व वहां तेजी से बढ़ा है, लोग संस्कृत पढ़ना चाहते हैं इसलिए भारत की ओर उनका रुझान बढ़ा है.

वहां के भौतिकवादी विचार वाले लोगों को धीरे-धीरे अब यह लगने लगा है कि अध्यात्म का मार्ग ही सर्वोत्तम है,इसलिए भारतीय संस्कृति की ओर उनका रुझान बढ़ रहा है और संस्कृत की मांग इन दिनों पश्चिम के देशों में तेजी से बढ़ी है. इसके अतिरिक्त संजीव ने बताया कि छठे पीढ़ी के कंप्यूटर में संस्कृत का प्रयोग हो, इस पर इन दिनों वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं क्योंकि छठी पीढ़ी के कंप्यूटर वॉइस कमांड पर ही ऑपरेट होंगे, चूंकि संस्कृत में व्याकरण और शब्दों की जितनी स्पष्टता है किसी अन्य भाषा में नहीं है. लिहाजा संस्कृत का प्रयोग वैज्ञानिकों की आवश्यकता बनती जा रही है.

संस्कृत की बढ़ते मांग को देखते हुए संस्कृत भारती के द्वारा वहां संस्कृत सिखाने की व्यवस्था की गई है. इस बार के शिविर में हजारों लोग संस्कृत और सांख्यदर्शन सीखेंगे. जिसका प्रशिक्षण देने के लिए 9 अगस्त को संजीव अमेरिका के सिएटल पहुंचेंगे. इसके बाद अमेरिका के अन्य कई राज्यों में आयोजित शिविरों में भी संजीव का संबोधन होगा. बता दें कि करीब 1 महीने के अमेरिका प्रवास में संजीव हजारों संस्कृत पिपासुओं की जिज्ञासा को शांत करेंगे.

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