दोनों हाथ हादसे में गंवाए, पर आज अपने हौसले के दम पर बन चुकी है दुनिया के लिए मिसाल

लाइव सिटीज डेस्क : हमारे समाज में एक लड़की के लिए उसकी शारीरिक सुंदरता बेहद मायने रखती है.. उसकी पहचान उसके गुणों से ज्यादा उसके चेहरे और शारीरिक बनावट से होती है. ऐसे में शारीरिक अक्षमता के साथ जीना तो किसी लड़की के लिए अभिशाप के जैसा है पर आज हम आपको एक ऐसी लड़की से मिलवाने जा रहे हैं जिसने अपने दोनो हाथ बचपन में एक हादसे में खो दिए, वैस शायद इतना होने के बाद कोई लड़की क्या कोई भी व्यक्ति जीवन जीने की उम्मीद छोड़ दे पर इस लड़की ने अपने हौसले के दम पर ना सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि आज ये पूरी दुनिया के लिए जीवटता का एक नायाब मिसाल पेश कर रही है.



जिस अवस्था में लोग दूसरे के सहानुभूति के पात्र बन जाते हैं उस शारीरिक स्थिति में होते हुए भी आज वो लड़की करोड़ो लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है. तो चलिए मिलते हैं मोटिवेशनल स्पीकर मालिवका अय्यर से…जीवन में सबके साथ कुछ ना कुछ अनहोनी होती है कुछ लोग इनसे से हार जाते है तो वहीं कुछ लोग इनसे सबक सीख दूसरों के लिए मिसाल बन जाते हैं.

मालविका ने भी अपने जीवन के सबसे बड़े हादसे के बाद जीवन जीने का उम्मीद ना छोड़ी और अपने जीवन का रूख ही बदल दिया. उस घटना को याद करते हुए मालविका बताती हैं कि वो मई, 2002 की 26 तारीख थी और रविवार का दिन था जब सबकी छुट्टी थी, मैं उस वक्त 9वीं कक्षा में थी. मेरे घर में कुछ मेहमान उनसे मिलने आए थे. मम्पी-पापा मेहमानों के साथ ड्रॉइंग रूम बैठे थे. मेरी सिस्टर उनके लिए किचन में चाय बना रही थी. तभी मेरी नजर अपनी जींस की फटी जेब पर गई.

मैंने इसे फेवीकॉल से चिपकाने की सोची और ये सोचकर मैं गैराज में किसी भारी वस्तु की तलाश में गई, ताकि चिपकाने के बाद जींस पर कोई भार रखा जा सके. दरअसल मेरे घर के पास ही सरकारी गोला-बारूद डिपो था पर मुझे नहीं पता था कि कुछ दिनों पहले ही उस डिपो में आग लगी है, जिससे उसमें रखे कई विस्फोटक पदार्थ आसपास के इलाके में बिखर गए थें और ऐसे में मै गैराज से भारी वस्तु समझकर एक ग्रेनेड बम उठा लाई. पर जब तक उसका प्रयोग करती कि वो ग्रेनेड फट गया. कुछ देरे के लिए मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

तुरंत मुझे अस्पताल पहुंचाया गया वहां युद्धस्तर पर इलाज चला. हालांकि मेरी जान तो बच गई, पर उस हादसे में मैंने अपने दोनों हाथ गंवा दिए और इसके साथ ही मेरे दोनों पैर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए.

मालविका बताती हैं कि उस हादसे के बाद दो साल तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान कई स्तर की सर्जरी से गुजरना पड़ा, वे महीनों तक चल भी न सकी. इस तरह वो एक झटके में दुनिया की नजर में सामान्य से दिव्यांग बन चुकी थी. हालांकि उस हादसे के बाद मालविका ने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ना जारी रखा. दो साल बाद मालविका ने चेन्नई माध्यमिक स्कूल परीक्षा में बतौर प्राइवेट अभ्यर्थी हिस्सा लिया और सहायक की मदद से परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की. इसके बाद तो उनका हौसला बढ़ गया और आगे की पढ़ाई के लिए वो दिल्ली आ गई. यहां के सेंट स्टीफन कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री ली.

इस बीच सामाजिक कामों में मालविका की रुचि बढ़ने लगी थी. यही वजह रही कि इन्होनें दिल्ली स्कूल से एमएसडब्ल्यू और मद्रास स्कूल से एम. फिल की पढ़ाई पूरी की. बिना हाथों के ही पढ़ाई का ये ज़ज्बा और सामाजिक सरोकारों में रूचि को देखते हुए मालविका को उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन की ओर से आमंत्रण भी मिला था. साथ ही कई विदेशी संस्थाओं से उन्हें अपने यहां मोटिवेशनल स्पीच देने के लिए बुलाया जाने लगा. इस तरह मालविका अपने सबसे बड़ी त्रासदी से उभरते हुए दूसरों के लिए प्रेरणा बन गई.

मालविका का कहना है कि, गलत मनोभाव ही जीवन की एकमात्र विकलांगता है. मेरे मन में एक अलग प्रकार की उम्मीद जिंदा थी. मुझे पक्का भरोसा था कि मेरा शरीर भले ही अधूरा हो गया हो, पर इससे मेरी जिंदगी की पूर्णता पर कोई असर नहीं पड़ेगा.