प्‍योर सिल्‍क पाटन पटोला साड़ी की कीमत है 4 लाख रुपए, ऑर्डर करने पर 3 साल बाद आता है नंबर

लाइव सिटीज डेस्क : भारत में महिलाओं पर साड़ियां वाकई बहुत खूबसूरत लगती हैं. साड़ियां भी हमारे देश में एक से बढ़कर एक मिलती हैं जिनकी कीमत भी बहुत ही दमदार होती है. आज हम आपको पाटन पटोला साड़ी के बारे में बताने जा रहे हैं जो सिर्फ पाटन (गुजरात) में ही बनती है. यब साड़ी हाथ से बनाई जाती है और इसे बनाने में तकरीबन 4 से 6 माह लग जाते हैं. इस साड़ी के बिजनेस की भी हर बात बाकी बिजनेस से काफी अलग है. इसकी कीमत की बात की जाए तो ये 4 लाख रुपए तक मिलती है. यह पूरी तरह से प्‍योर सिल्‍क से बनती है.

ये साड़ी 900 साल पुरानी आर्ट है जिसे खरीदने वाले देश के साथ विदेशों में भी मौजूद हैं. पाटन पटोला साड़ी की कोई इंडस्‍ट्री नहीं है. यह बिजनेस केवल ऑर्डर पर ही चलता है और पूरे देश में केवल 3 परिवार ही हैं, जो इस बिजनेस से जुड़े हैं. ये तीनों परिवार पाटन से ही हैं.

ऑर्डर पाने के लिए कम से कम 2 से 3 साल का इंतजार

इस साड़ी की खास बात है कि इसे ऑर्डर देने के बाद ऑर्डर पाने के लिए कम से कम 2 से 3 साल का इंतजार करना पड़ता है. इसकी वजह है कि एक पटोला साड़ी को बनाने में कम से कम चार आदमी और 4 से 6 महीने लगते हैं और 1 लूम से हर साल एवरेज 4 से 5 पटोला साड़ी ही बन पाती हैं.

एक पटोला साड़ी की कीमत 4 लाख रुपए

एक पटोला साड़ी की कीमत मिनिमम डेढ लाख रुपए से 4 लाख रुपए तक होती है. पटोला आर्ट इतनी ज्यादा अनमोल है कि 1934 में भी एक पटोला साड़ी की कीमत 100 रुपए थी.

पाटन पटोला की परंपरा 12वीं शताब्दी में शुरू हुई

12वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के राजा कुमरपाल ने महाराष्ट्र के जलना से बाहर बसे 700 पटोला वीवर्स को पाटन में बसने के लिए बुलाया और इस तरह पाटन पटोला की परंपरा शुरू हुई. राजा अक्‍सर विशेष अवसरों पर पटोला सिल्‍क का पट्टा ही पहनते थे. पाटन में केवल तीन ऐसे परिवार हैं, जो ओरिजनल पाटन पटोला साड़ी के कारोबार को कर रहे हैं और इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इस विरासत को जीआई टैग भी मिला हुआ है.

इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है

पटोला साड़ी को टाइंग, डाइंग और वीविंग टेक्नीक से बनाया जाता है. पटोला साड़ी की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है. इसे ‘डबल इकत’ आर्ट कहते हैं. डबल इकत में धागे को लंबाई और चौड़ाई दोनों तरह से आपस में क्रॉस करते हुए फंसाकर बुनाई की जाती है. डबल इकत को मदर ऑफ ऑल इकत भी कहा जाता है. इसके चलते साड़ी में ये अंतर करना मुश्किल है कि कौन सी साइड सीधी है और कौन सी उल्टी. इस जटिल बुनाई के चलते ही यह आर्ट अभी भी देश-विदेश में फेमस है और काफी महंगी भी. पटोला साड़ी की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका रंग कभी फेड नहीं होता और साड़ी 100 साल तक चलती है.

कहां का सिल्‍क होता है इस्‍तेमाल

पटोला साड़ी में इस्‍तेमाल होने वाला सिल्‍क धागा बेंगलुरू और चीन का होता है. चीन का धागा अच्‍छा होने की वजह से उसका इस्‍तेमाल ज्‍यादा है. पटोला साड़ी की डिजाइन में आम तौर पर फूल, हाथी, तोता जैसे पक्षी और ह्यूमन फिगर्स रहते हैं. बोहरा मुस्लिम कम्‍युनिटी की पटोला साड़ी पर केवल जियोमेट्रिकल डिजाइन होती हैं. इसके टाइप की बात करें तो इसमें नारीकुंजर, रतनचौक, नवरत्‍न, वोरागाजी, चोखटा भट, फूल भट आदि नाम शामिल हैं. पटोला आर्ट में साड़ी के अलावा स्‍कार्फ भी बनाए जाते हैं.