युद्ध में दुश्‍मन देश के छक्‍के छुड़ा देते हैं ये भारतीय हथियार,पूरी दुनिया मानती है इनका लोहा

लाइव सिटीज डेस्क : एक के बाद एक रक्षा के क्षेत्र में नई-नई इबारतें भारतीय वैज्ञानिक सेना को मजबूत करने के लिए लिख रहे हैं. ऐसा करने के पीछे भारत केवल एक ही तर्क देता है कि ऐसी खतरनाक मिसाइलों का प्रयोग हिन्दुस्तान केवल और केवल आत्मरक्षा के लिए कर रहा है. भारत की तीनों सेनाएं एक से बढ़कर एक अपने खेमें में जंगी हथियार जोड़ रहीं है. फिर चाहे वो एयर फोर्स के लड़ाकू विमान और मिसाइले हों या फिर नेवी के जंगी जलपोत वही थल सेना के लिए तोपों को भी जंगी बेड़े में शामिल किया जा रहा है. इससे साफ जाहिर होता है कि हमारी सेनाएं युद्ध कौशल के साथ-साथ युद्ध में फतह हासिल करने के लिए खुद को तैयार कर रही है.

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत ने दुनिया को अपनी ताकत दिखाई जिसमें कला संस्कृति के साथ शक्ति का प्रदर्शन भी किया गया. ये झाकियां दिल्ली के राजपथ पर प्रदर्शित की गई जिसमें ऐसे हथियार प्रदर्शन किए गए हैं जो भारत ने खुद डेवलप किए हैं. ये ऐसे हथियार हैं, जो युद्ध में दुश्‍मन देशों के छक्‍के छुडा सकते हैं. दुश्‍मन देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया इन हथियारों को लोहा मानती है. आइए एक नजर डालते हैं इन मिसाइलों पर…

1. नाग मिसाइल, डेवलपमेंट कॉस्‍ट: 300 करोड़ रुपए

भारत की ओर से डेवलप यह एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल कई मायनों में बेहद खास है. यह मिसाइल हमले के बाद खुद को छुपा लेती है. डीआरडीओ की ओर से विकसित इस मिसाइल को बीडीएल की ओर से प्रोड्यूज किया जाता है. यह हवा और जमीन से दुश्‍मन के टैंक को तबाह करने में सक्षम है. इस मिसाइल को विकसित करने में करीब 3 अरब रुपए की कॉस्‍ट आई है. इसे कंधे से भी लॉन्‍च किया जा सकता है. यह 4 किमी तक मार कर सकती है.

2. धनुष तोप, कॉस्‍ट: 14 करोड़ रुपए

भारत की ओर से विकसित की गई यह तोप भी वर्ल्‍ड क्‍लास मानी जाती है. बोफोर्स तोप के आधार पर इस तोप को विकसित किया गया था. हालांकि बाद में इसकी क्षमता को बढाया गया. 45 कैलिबर गन वाली यह तोप करीब 38 किलोमीटर दूर तक मार कर सकती है. यह 15 सेकेंड में 3 राउंड की फायरिंग कर सकती है. इसकी एक तोप की लागत करीब 14 करोड़ रुपए आती है.

3. पिनाक रॉकेट लॉन्‍चर, कॉस्‍ट: 5.8 लाख रुपए

भारत की ओर से बनाया गया यह रॉकेट लॉन्‍चर बेहद घातक है. इंडियन आर्मी के लिए इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है. इसके फर्स्‍ट वर्जन की मारक क्षमता करीब 45 किमी और दूसरे वर्जन की क्षमता 65 किमी है. इसकी मदद से 44 सेकेंड में 12 रॉकेट दागे जा सकते हैं. यह एक समय में करीब 4 किमी के दायरे में हमले कर सकती है. इसकी एक यूनिट की कास्‍ट 5.8 लाख रुपए पड़ती है. साथ ही सरकार इसके 120 किमी वर्जन को भी विकसित करने में लगी है. इसका प्रोडक्‍शन 1998 से किया जा रहा है.

4. ध्रुव हेलीकॉप्‍टर, कॉस्‍ट: 40 करोड़ रुपए

भारत की ओर से विकसित यह एक आधुनिक मल्‍टीपर्पज हेलीकॉप्‍टर है. इसे हिंदुस्‍तान एयरोनॉटिक्‍स लिमिटेड (HAL) ने विकसित किया है. मौजूदा समय में इसका इस्‍तेमाल तीनों सेनाओं के अलावा बीएसएफ की ओर से किया जाता है. इसे कई देशों में निर्यात भी किया जाता है. 20 हजार फीट की ऊंचाई के साथ यह एक बार में यह 800 किमी का सफर तय कर सकता है. सियाचिन से लेकर थार तक में इसका यूज किया जा रहा है. साथ ही इसे नई टेक्‍नोलॉजी के साथ अपडेट भी किया जा रहा है. इसे मिसाइल, मशीनगन और रॉकेट दागने लायक भी बनाय जा रहा है. इसकी एक यूनिट की कीमत करीब 40 करोड़ रुपए पड़ती है.

5. आकाश मिसाइल सिस्‍टम, डेवलपमेंट कॉस्‍ट: 1 हजार करोड़

जमीन से हवा में मार करने वाली मिडिल रेंज की इस मिसाइल ने भारतीय सेना के डिफेंस सिस्‍टम को मजबूत करने का रास्‍ता साफ किया है. यह मिसाइल सिस्‍टम किसी एयरक्रॉफ्ट पर 30 किमी दूर से ही निशाना साध सकता है. साथ ही यह फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल के हमले को नाकाम करने में भी सक्षम है. यह मिसाइल भारतीय राजेंद्र PESA रडार की मदद से मार करती है. यह रडार एक बार में 64 टारगेट को ट्रैक कर सकता है. साथ ही यह मिसाइल आवाज से दोगुनी रफ्तार से मार करने में सक्षम है. इस मिसाइल को विकसित करने में एक हजार करोड़ रुपए की लागत आई.

6. अर्जुन टैंक, कॉस्‍ट: 55 करोड़ रुपए

DRDO की ओर से विकसित इस टैंक को भी दुनिया के कई देशों के टैंक के मुकाबले काफी मजबूत माना जाता है. मौजूदा समय में सेना की ओर से इसका प्रोडक्‍शन किया जाता है. इसकी दूसरा वर्जन भी लॉन्‍च किया जा चुका है. इसमें 120 एमएम की राफइल लगी है. 14000 एचपी के इंजन के साथ यह टैंक किसी भी भारतीय परिस्थिति में मूव करने में सक्षम है. इसकी एक यूनिट की कॉस्‍ट 55 करोड़ रुपए आती है. यह टैंक 1974 से भारतीय सेना में अपनी सेवा दे रहा है.

7. रिसैट रडार सिस्‍टम, कॉस्‍ट: 500 करोड़ रुपए

रिसैट (रडार इमैजिंग सैटेलाइट्स) भारतीय रडार सैटेलाइट है. इसे इसरो की ओर से डेवलप किया गया है. सिंथेटिक अपार्चर रडार की मदद से यह हर मौसम में काम करने में सक्षम है. इसके चलते कोई भी विदेशी लड़ाकू विमान और मिसाइल भारत की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता है. इसे विकसित करने में 500 करोड़ रुपए की लागत आई है.

8. अग्नि- 5, डेवलपमेंट कॉस्‍ट: 2500 करोड़ रुपए

भारत की यह सबसे आधुनिक मिसाइल है. यह 5500 किमी तक मार कर सकती है. इसके चलते भारत दूसरे महाद्वीप में मार करने वाली मिसाइल रखने वाले विशेष देशों के क्‍लब में शामिल हुआ. साथ ही यह पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम है. यह इंटरनल नेविगेशन सिस्‍टम और रिंग लेजर गिरोस्‍को के साथ गाइडेड होती है. साथ ही यह जीपीएस के जरिए भी गाइडेड होती है. यही कारण है कि इसकी मारक क्षमता काफी असरदार है. साथ ही इसे सड़क और रेल के जरिए कहीं भी ले जाया जा सकता है. इसे विकसित करने में करीब 2500 करोड़ रुपए की कास्‍ट आई.

9. इंडियन बैलेस्टिक मिसाइल डिप्‍फेंस सिस्‍टम

भारत की ओर से डेवलप यह सबसे आधुनिक हथियार है. जो देश की सीमाओं को विदेशी हमले से महफूज रखता है. इसमें मुख्‍य तौर पर दो मिसाइल सिस्‍टम PAD और AAD शामिल हैं. इसमें PAD एक एंटी बैलेस्टिक मिसाइल सिस्‍टम है. इसकी मदद से देश के बाहर से आने वाली किसी भी बैलेस्टिक मिसाइल को पता लगाया जाता है. यह करीब 80 किमी की ऊंचाई से आने वाली मिसाइल का पता लगाकर उन्‍हें मार गिराने में सक्षम है. जबकि AAD वायुमंडल के भीतर 30 किमी की ऊंचाई पर मिसाइल का पता लगाने में सक्षम है. इसके लिए एक और मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम PDV को भी डेवलप किया जा रहा है, जो 150 किमी की ऊंचाई पर मिसाइला का पता लगा सकती है.

10. तेजस फाइटर जेट, कॉस्‍ट: 160 करोड़ रुपए

भारत की ओर से डेवलप यह एक मात्र जेट फाइटर है. यह चौथी पीढ़ी का हल्‍का मल्‍टीरोल एयरक्राफ्ट है. यह भारतीय वायुसेना में जल्‍द ही मिग-21 और मिग-27 की जगह लेगा. यह हवा से हवा और हवा से जमीन पर मिसाइल दागने में भी सक्षम है. साथ ही इसमें बेहद आधुनिक रडार सिस्‍टम में भी लगा है. इस फाइटर जेट के सेना में शामिल होने के बाद भारत उन देशों के एलीट क्‍लब में शामिल हो जाएगा, जिनके पास अपना जेट विमान है. इसे विकसित करने में करीब 4800 करोड़ रुपए की लागत आई है. वहीं एक तेजस फाइटर प्‍लेन की कीमत करीब 160 करोड़ रुपए आती है.

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