मांझी की तर्ज पर इस जांबाज फौजी ने अकेले बना डाली 2 km लंबी सड़क, पहाड़ को काटने में 3 साल लग गए

लाइव सिटीज डेस्क : आपको दशरथ मांझी के बारे में तो पता ही होगा. इनके जीवन के ऊपर एक फिल्म मांझी द माउंटेन मैन भी बन चुकी है. इन्होंने अपनी पत्नी के मौत के बाद पहाड़ काटकर सड़क बनाने जैसा असंभव काम किया था. इसी पहाड़ की वजह से उनकी पत्नी को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका था, जिससे उसकी मौत हो गयी थी. केवल यही नहीं इन्होंने बिहार से दिल्ली तक की यात्रा पैदल ही की थी. जब आप किसी चीज को करने के पक्का इरादा बना लेते हैं तो कोई भी मुश्किल आपके रास्ते में टिक नहीं पाती है.



मांझी ने जो काम किया, उसके लिए सदियों तक दुनिया उन्हें याद करेगी. मांझी की तरह ही चम्पावत के बृजेश भट्ट ने भी कुछ कर दिखाया है, जिससे आपको हैरानी होगी. जब उनके गांव जाने के लिए सरकार सड़क बनवाने में नाकामयाब हुई तो इस जांबाज फौजी ने खुद ही यह काम करने का मन बना लिया. यह अद्भुत कहानी उत्तराखंड चम्पावत जिले के मझोड़ा ग्राम पंचायत के पुष्पनगर गांव की है. गांव मुख्य सड़क से कटा हुआ था और गांव जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था. बीच में एक पहाड़ था. जब भी वह ड्यूटी से आते अकेले ही कुदाल, हथौड़ा और छेनी लेकर चल पड़ते पहाड़ को चीरने के लिए.

3 कुमाऊं रेजीमेंट में थे और पिथौरागढ़ में पोस्टिंग थी

वह 3 कुमाऊं रेजीमेंट में थे और पिथौरागढ़ में पोस्टिंग थी. उन्हें पहाड़ को काटने में पुरे तीन साल लग गए. इस काम को करने के लिए उन्होंने ना ही कोई मजदुर रखा और ना ही किसी से इसके लिए मदद मांगी. 39 साल के इस फौजी ने दिन-रात मेहनत करके सड़क बना दी. हालांकि सड़क अभी कच्ची है लेकिन गांव तक हल्के वाहन आसानी से पहुंच जाते हैं. आज बृजेश की वजह से ही मुख्य मार्ग से गांव तक वाहन तेजी से चलने लगे हैं. बृजेश सिंह के इस काम ने ना केवल सिस्टम को आईना दिखाया है बल्कि पुरे राज्य में एक मिसाल पेश की है.

2014 में ही पहाड़ काटने का काम शुरू कर दिया

एनएच 125 से जुड़ने वाली खूनामलक सड़क से पुष्पनगर की दूरी करीब दो किलोमीटर पड़ती है, लेकिन कोई रास्ता ना होने की वजह से इलाके के लोगों को जंगलों से होकर अपने गाँव जाना पड़ता था. गांव के लोगों ने सड़क बनवाने के लिए स्थानीय नेताओं से गुहार लगायी और अधिकारीयों से भी मिले, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. बृजेश ने सरकार की अनदेखी का जवाब देने के लिए 2014 में ही पहाड़ काटने का काम शुरू कर दिया. बच्चे जमीन और नालों को फांदकर स्कूल जाते थे. बाजार से सामान लाने में भी काफी दिक्कत होती थी इन्ही सबसे व्यथित होकर बृजेश ने सड़क बनाने की ठानी.