इन्फोसिस के फाउंडर्स बेच सकते हैं इसके सभी शेयर

लाइव सिटीज डेस्क : इंडियन कॉर्पोरेट हिस्ट्री का एक युग खत्म होने के कगार पर है. इन्फोसिस के प्रतिष्ठित को-फाउंडर्स 28,000 करोड़ रुपये कीमत के कंपनी के सभी 12.75% शेयर बेचने पर विचार कर रहे हैं. मामले से वाकिफ कुछ लोगों ने इसकी जानकारी दी. कहा जा रहा है कि तीन साल पहले प्रमोटरों के इन्फोसिस छोड़ने के बाद से कंपनी चलाने के तौर-तरीकों से नाराजगी पैदा हुई. इसी वजह से वो यह बड़ा कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं.

फाउंडर्स इंफोसिस के पिछले 3 साल के प्रदर्शन से नाखुश हैं. फाउंडर्स, मैनेजमेंट और बोर्ड के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं. फरवरी में सीईओ विशाल सिक्का और नारायण मूर्ति में विवाद सामने आया था. नारायण मूर्ति ने कॉरपोरेट गवर्नेंस पर सवाल उठाए थे. नारायण मूर्ति ने सीनियर एक्जिक्यूटिव की ऊंची सैलरी पर सवाल उठाए थे.

ऐसा जान पड़ता है कि इन्फोसिस के बोर्ड और मैनेजमेंट के साथ जारी संघर्ष के मद्देनजर प्रमोटर्स इस कंपनी से पूरी तरह हट जाना ही बेहतर मान रहे हैं जिसे उन्होंने साल 1981 में स्थापित की और साल 1993 में आम लोगों के लिए कंपनी में हिस्सेदारी का रास्ता खोल दिया. इन्फोसिस के सह-संस्थापकों मूर्ति, निलेकणी, क्रिस गोपालकृष्णन, एसडी शिबूलाल और के दिनेश के पास कंपनी की न तो कार्यकारी और न ही कोई गैर-कार्यकारी जिम्मेदारी है. फिर भी आईटी सेक्टर के लिए कारोबारी अनिश्चितताओं के दौर में उनका इन्फोसिस से अपना वास्ता पूरी तरह खत्म कर लेने से कंपनी के शेयर कमजोर हो सकते हैं.

यह भी पढ़ें – सस्ते कर्ज की उम्मीदें अधूरी, रिजर्व बैंक ने नहीं बदली ब्याज दरें
अब हवाई सफर का सपना होगा पूरा, ट्रेन से भी सस्ता हुआ किराया

एन आर नारायणमूर्ति और नंदन निलेकणी की अगुवाई वाले प्रमोटर ग्रुप को इंजिनियर-आंट्रप्रन्योर्स की उस नई नस्ल को रास्ता दिखाने वाला माना जाता है, जो पैदा तो हुए मध्यवर्गीय परिवारों में, लेकिन अच्छी सैलरी की नौकरी करने की परंपरा तोड़ते हुए बिजनस शुरू करने का फैसला किया. दरअसल, 90 के दशक में देश में आर्थिक उदारीकरण आने से पहले मध्यवर्गीय परिवारों के लड़के-लड़कियां मोटी तनख्वाह वाली नौकरी पाकर ही धन्य हो जाते थे, लेकिन इन्फोसिस प्रमोटरों की अगुवाई में यह रवायत टूटी जिसकी बदौलत इंडियन सॉफ्टवेयर की गाथा पूरी दुनिया में फैली.